कहानी -हम्मिंग बर्ड्ज़
मेरे दफ्तर से लौटते ही पत्नी ने मुझे घेर लिया, “माँजी ने आज एक नया फरमान जारी
किया है, जीजी की चिड़ियाँ हमें यहाँ लौटा लानी चाहिए|”
दिन पहले हुई थी| उधर अपने पति के घर पर| जिससे उसने पाँच महीने पहले कचहरी में
जाकर अपनी मर्ज़ी की शादी रचाई थी| मेरे खिलाफ जाकर|
फरमाइशें मेरे सामने मत दोहराया करो,” मैं झल्लाया, “कितनी बार मैंने तुम्हें
बताया है, मेरा मूड बिगड़ जाता है|”
पत्नी मुकाबले पर उतर आई, “दिन-भर वह कोहराम मचाएँ, मेरा जी हलकान करें और आपके
आने पर आपके साथ मैं अपना जी हलका भी न करूँ?”
झल्लाहट बढ़ ली, “अभी पूछता हूँ माँ से|”
रामायण पढ़ रही थीं|
कैसे होगी, माँ?” मैं बरस लिया, “तुमने कहा, काठ-कफ़न मायके का होता है, सो काठ-कफ़न
हमने कर दिया, फिर रसम-किरिया पर जो भी देना-पावना तुमने बताया, सो वह भी हमने
निपटा दिया| अब उन चिड़ियों का यह टंटाल कैसा?”
की मृत्यु के बाद से माँ अपने ढक्कन के नीचे नहीं रह पातीं, “वे चिड़ियाँ वहाँ मर गईंतो
प्रभा की आत्मा को कष्ट न होगा?”
वर्षा अब विश्शूकी परवरिश छोड़ दे और उन चिड़ियों के दाने-दुनके पर जुट जाए?”
रखूँगी, वर्षा नहीं|”
चिल्लाया, “मगर कैसे?”
फालिज़ का हमला हुआ था और उनके शरीर का बायाँ भाग काम से जाता रहा था|”
लगीं|
कीजिए|” पत्नी ने पैंतरा बदल लिया| उसे डर था, माँके प्रति मेरी खीझ कहीं
सहानुभूति का रूप न धर ले|
“उधर विश्शू के पास आकर टी.वी. देखिए| जब तक मैं आपका चाय-नाश्ता तैयार करती हूँ|”
आई| एक ऊँची इमारत में बहन मेरे साथ विचर रही है…..|
आगे बहन ठिठक जाती है…..|
बाँह खींचता हूँ…..|”
पूछती है, “घुप्प अँधेरा…..?”
अंदाज़ में जब वह अपनी जादुई ड्राइंग बुक के कोरे पन्नों पर पानी से भरा पेंटिंग
ब्रश फेरने से पहले पूछती, “जादू देखोगे?” और पानी फेरते ही वे कोरे पन्ने अपने
अंदर छिपी रंग-बिरंगी तस्वीरें ज़ाहिर करने लगते…..|
हूँ, “चलो…..”
एक दरवाज़े की ओर हम बढ़ लेते हैं…..
जमा है…..
है…..
उसका पीछा करता हूँ…..
रहा है|” वह कहती है…..
पूछता हूँ…..
सतीश उसके पति का नाम है…..
दरवाज़े पर नज़र दौड़ाता हूँ…..
जमघट अब अस्तव्यस्त फैला नहीं रहा…..
कतारों में जा सजा है…..
रही हैं…..
बहन की रसम-किरिया के दिन सतीश ने अपने मेहमानों के लिए कुल एक घंटे के लिए किराए
पर लिया था…..
हूँ…..
लपकता हूँ…..
गहरी नींद में सो रहे थे|
बिस्तर से उठ खड़ा हुआ|
बाहर गेट वाले दालान में आ गया|
गमलों को उनकी छायाओं के साथ अलग-अलग वियुक्ति देकर उन्हें पैना रही थी|
रही होगी, लेकिन निश्चित रूप से आठ बरस से छोटी ही, क्योंकि बाबूजी की मृत्यु पर
मैं केवल आठ का रहा, जबकि बहन अपने पंद्रहवें वर्ष में दाखिलहो चुकी थी….. और उस
रात हम भाई-बहन बाबूजी की देख-रेख में लुका-छिपी खेल रहे थे और ढूँढने की अपनी
बारी आने पर बहन जब मुझे घर के अंदर कहीं नहीं दिखाई दी थी, तो मैं रोने लगा था|
गला फाड़-फाड़कर| मेरा रोना बहन से बर्दाश्त नहीं हुआ था और वह फ़ौरन मेरे पास चली आई
थी|
पूछा था|
हँसी थी|
मैंने पूछा था|
जवाब बाबूजी ने दिया था, “अँधेरा तो हमारा विश्वसनीय बंधु है| वह हमें पूरी ओट
देता है|”
टिकाकर मैं रो पड़ा|
जलाई|
कमरे में दाखिल हुआ|
“मालूम नहीं यह मेरा वहम है या मेरा भरम, लेकिन प्रभा मुझे जब भी नज़र आती है, अपनी
चिड़ियों को ढूँढती हुई नज़र आती है…..|
बाबूजी से लिया था और उनकी मृत्यु के उन्नीस साल बाद भी उनके इस शौक को ज़िंदा रखा था|
हैं, माँ?” मैं माँ के पास बैठ लिया|
फिर दिखाई दी थी…..|”
आप अब सुबह हो लेने दें, फिर मैं सतीश के घर जाऊँगा और जीजी की चिड़ियाँ यहाँ लिवा
लाऊँगा…..|”
मैं दोबारा सोने अपने कमरे में लौटा नहीं|
इंतज़ार करने लगा|
ही उस नए दिन के चेहरे और पहनावे के साथ तैयार भी हो लिया|
गोल्फ खेलने के लिए निकल पड़ता है और मैं उसे सात से पहले पकड़ लेना चाहता था…..|
सात के करीब मैंने सतीश के घर की घंटी जा बजाई|
नाते सुबह सुरमई थी|
नौकर ने बताया|
में अपने जूते पहन रहा था|
हुआ था, तिस पर वह तीन बेटियों का बाप भी था, जिनमें से सबसे बड़ी सतरह साल की थी,
लेकिन बाँकुरा उसका दिखाव-बनाव अभी भी किसी छैल-छबीले से कम न था|
पहुँचा|
रहे उसके हाथ रुक गए और उसका मुँह खुला का खुला रह गया|
से मुझ पर झपटी|
पीछे-पीछे पाँच-छः साल की एक लड़की बरामदे में चली आई| लंबाई में बहुत छोटी उसकी शमीज़नुमा
नाइटी उसी रंग के नाइट गाउन से बाहर झाँक रही थी| उस रंग को जीजी ‘बेबी पिंक’ कहा
करती थीं|
सतीश की किसी भी बेटी से बात करने का मेरे लिए वह पहला अवसर था, वरना उनसे मेरा
परिचय केवल देखने-भर का रहा था| कुछेक बार जब जीजी उन्हें हमारे घर पर सतीश के साथ
खाने पर लाई भी थीं तो अपने रोष के कारण मैं उनके संग न बैठक में बैठा था न ही
खाने की मेज़ पर|
बिल्ली को अपनी गोदी में ले लिया| छोटी टाँगें और गहरी छाती लिए वह बिल्ली लंबे
बालों वाली थी और उन बालों के सलेटी आभा-भेद उसकी बगलों, चेहरे और पूँछ तक पहुँच
रहे थे; पीठ में अस्फुट और ठुड्डी, छाती, पेट और पूँछ के नीचे सफ़ेद| उसकी आँखें
हरी थीं और आँखों के किनारे उसके होंठों और उसकी नाक की तरह काली बहिर्रेखारखे थे|
नाक के बीच लाल रंग भी था|
मैं चौंका|
मैंने पूछा| मैंने सुन रखा था, बिल्लियाँ अपने जीवनकाल के सातवें और बारहवें महीने
के बीच कभी भी प्रजनन कर सकती हैं|
लड़की लगभग चीख
सतीश ने लड़की को अंदर जाने का आदेश दिया|
से विदा लो, मौसी)|” लड़की फिर हँसी और हवा में ‘चीरियो’ शब्द दोबारा उछालकर लोप हो गई|
सतीश मेरी तरफ मुड़ लिया|
बिना उसके इशारे के मैं उसके सामने वाली कुर्सी पर जा बैठा|
रही|
हैरानी जतलाई|
कहा|
हँसने लगा, “वे तो यहाँ आते ही दो-एक महीने में ख़त्म हुई रहीं…..| गलती से उनके
दानों में कोई ज़हरीले किनके-दुनके मिल गए थे…..|”
फीतों पर लौट लिए, “प्रभा ने आपको बताया नहीं…..?”
में भी कभी नहीं बताया| खैर, क्या मैं वह जगह देख सकता हूँ, जहाँ वे चिड़ियाँ रहती
थीं, अपने चिड़ियाखाने में?” किसी भी बहाने मैं जीजी के घर का पूरा नज़ारा देखना
चाहता था|
हँसने लगा, “बेकार उस ढाँचे को कहाँ तक खड़ा रखते? वह भी कब का ढह-गिर गया…..|”
“जहाँ वे रहती थीं?”
“प्रभा?”
मेरी ज़ुबान रुक ली, “उनकी चिड़ियाँ…..|”
का इलाका है…..| उन चिड़ियों का तो अब कहीं नामोनिशान तक बाकी नहीं…..|” नौकर
बोला|
से उठ खड़ा हुआ, “एनीथिंग एल्स (कुछ और)?”
लिया|
मुझसे हाथ मिलाने के लिए अपना दाहिना हाथ आगे कर दिया|
जोड़े| हैंड शेक से नमस्कार की मुद्रा मुझे ज़्यादा पसंद है|
असंभव था सो अपने स्कूटर को सतीश के घर से मैं चिड़िया बाज़ार की ओर बढ़ा ले गया|
बर्ड्स (मरमर पंछी) और लालमुनियाँ के तीन-तीन जोड़े मैंने फट से खरीदे और उन्हें
उनके चिड़ियाखाने समेत रिक्शे में रखकर घर के लिए रवाना हो लिया|
देखते ही वर्षा मुझ पर बरसी, “जीजीकी ज़िम्मेदारियों की आपको खूब ख़बर है!”
वर्षीय वैवाहिक काल में वर्षा पर मैं पहली बार बिगड़ा, “बाबूजीकी मृत्यु के बाद
बाबूजी के दफ्तर में अपने अठारहवें साल में जीजी ने जो वह नौकरी पकड़ी, सो उस पर वह
कितने साल डटी रहीं? किसकी खातिर?”
खातिर?” वर्षा ने मुँह फुला लिया, “मुझे तो यही मालूम है, ये जो चिड़ियाँ आई हैं,
इन्हें दाना मुझी को चुगाना है, इनके अंडे मुझी को सहेजने हैं, इनके चूज़े मुझी को
सँभालने हैं…..|”
हैं|” चिड़ियों को परखते ही माँ बोल पड़ीं|
ने यही चिड़ियाँ तो मुझे थमाई हैं|”
ही नहीं,” माँ ने दोहराया, “ये लाल हैं क्या? और ये उनकी मुनियाँ? कतई नहीं|
टिटहरी पर लाल रंग थोप दिया गया है| …..और ये? मरमरपंछी? ऐसे कमज़ोर पैरों वाली?
जिन्हें मैंने नीचे बैठाला तो वे बैठी की बैठी रह गईं? आगे की उड़ान तक नहीं ले पा
रहीं?जबकि ये मरमर पंछी तो आगे तो एक तरफ, तिरछी और उलटी उड़ान भी भर लेती हैं? और
चोंच तो देखो इनकी! कितनी छोटी हैं! बतासी हैं ये| मरमर पंछी नहीं| मरमर पंछी की
तो चोंच ही आधी लंबाई के बराबर रहती है…..|”
कर आते?” माँ के गुमान पर वर्षा ने पहली बार लगाम चढ़ाई, “जीजाजी पर ज़ाहिर तो होना
ही चाहिए कि हम जानते हैं ये चिड़िया नकली हैं|”
की तरफ देखा|
माँ की उत्तेजना बढ़ ली, “और सतीश से पूछना भी चाहिए, हमारी प्रभा की चिड़ियाँ गईं
कहाँ?”


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