छोटी दीदी

छोटी दीदी की कहानी एक ऐसी लड़की की कहानी है जिसकी आँखों में सपने थे और पैरों में बेड़ियाँ | कितनी बार वो समाज के तानों का शिकार हुई | कितनी बार लड़खड़ाई , गिरी उठी और फिर … |कुछ समय के लिए उनकी कहानी कई दूसरी कहानियों से  टकराई और रेशा- रेशा बिखर गया | वक्त के साथ उन रेशों को चुनने की कोशिश है | कोशिश है उस दर्द को शब्द देने की एक मुक्कमल कहानी की जो हमारी आपकी कहानियों की तरह वक्त के किसी मोड़ पर अधूरी ही  छूट जाती है | स्मृतियों के पन्ने पलती हूँ तो कभी कुछ याद आता है तो कभी कुछ | ये सफ़र इन स्मृतियों के पन्नों का ही है | पता नहीं कब कौन सा पन्ना ओझल हो जाएगा और कौन सा उड़ कर सामने आ जाएगा | जिसे आप सब के साथ हर शनिवार और सोमवार को बाटूंगी | आज ऐसा ही एक पन्ना …
 
 
 

छोटी दीदी 

 
वक्त को कौन जान पाया है ? ये वक्त कब कौन सी पैरहन पहन कर आ जाए जे भी नहीं कहा जा सकता | वो ऐसा ही अच्छा वक्त था जिसने अचानक से सफ़ेद पैरहन पहन ली | एक फोन कॉल ने भविष्य के सपनों को अतीत की अँधेरी सुरंग में धकेल दिया | उसके बाद एक तेज चक्कर आया और मैं अस्पताल में थी |
” देखिये मैं आपको जाने की इजाजत नहीं दे सकती | आठवाँ महीना है और आप का ब्लड प्रेशर इतना बढ़ा हुआ है | फिर आप आप की मर्जी | जिस घर में भविष्य जन्म लेने वाला था वहां का वर्तमान अतीत में जा चुका था | जन्म और मृत्यु की ये अजीब सी मिलन की घडी थी | मैं अस्पताल के बिस्तर पर खूब दवाब और आँसुओं  के दवाब के कम हो जाने की प्रतीक्षा करने को विवश थी | स्मृतियों का रेला हवा के झोंके के मानिंद मन में उथल पुथल मचाने लगा |
मैं आँगन में बैठी ढेर सारे बरतन मॉल कर रही थी और कमरे से अम्मा जी के चिल्लाने की आवाज आ रही थी, ” कहाँ से आ गयी है ये हमारे घर | खाना एक रोटी और काम घर भर का | ये सब इस घर में नहीं चलेगा काम करना है तो ठीक से खाओं |
छोटी दीदी की बक्सा साफ़ करने का जिम्मा मुझे दिया गया | उसमें सिर्फ किताबें भरीं थीं | कितना पढना चाहतीं थी वो , पर… , कुछ किताबें पलटने के बाद मेरे हाथ में वो  थी, जिसके बारे में छोटी दीदी ने कई बार मुझे बताया था | ये कोई साधारण गीता नहीं थी | छोटी दीदी को आठवीं कक्षा में वाद्द –विवाद प्रतियोगिता में प्रथम आने पर मिली थी | आँखों के वेग को रोकते हुए मैंने पन्ना पलटा | बड़े –बड़े शब्दों  में लिखा था , “हम आपके उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं | “ नीचे प्रधानाचार्या के हस्ताक्षर थे | कुछ पन्ने और पलटने के बाद एक मुड़ा-तुड़ा कागज़ मिला | मैंने खोल कर देखा | ये छोटी दीदी ने ही लिखा था | साफ़ –साफ़ मोती जैसे अक्षर | 
 
 
मैं खत खोलकर पढने लगी | खत में कुछ स्मृतियाँ दर्ज थी | ये तब की बात है जब छोटी दीदी ७ -८ की साल की थीं | उम्र छोटी थी पर लड़कियों को घर के बाहर जाने की इजाज़त नहीं थी | घर में माँ का हाथ बटायें या गुड्डी गुडिया से खेले दिन में थोड़ी बहुत आज़ादी थी पर जैसे ही सूरज अस्ताचल की ओर जाता लड़कियों ,
औरतों की दुनिया घर के भीतर ही सिमिट जाती | बड़ी दीदी को सब स्वीकार था | उनके सर
को केवल उर्ध्व
दिशा में हिलाने की आदत थी | न कभी कोई तर्क किया ना, ना कहना सीखा, पर छोटी दीदी ऐसी नहीं थीं | उनके पास ढेरों रंग थे , जिससे वो दुनिया को रंगना चाहती थीं , कभी तितली बन कर उड़ना चाहती थीं, तो कभी बादल बन कर सारी धरती पर बरसना चाहती थीं | उनकी राह मेंरोड़ा मुख्य द्वार पर जड़ा वो बड़ा सा लोहे का दरवाजा था , जिसकी सिर्फ सांकल ही नहीं बंद होती, बाहर और अंदर की दुनिया को पूरी
तरह से अलग करने के लिए एक बड़ा सा क्षैतिज लकड़ी का लट्ठा लगा दिया जाता | वहीँ पास तख़्त में बाबा सुपारी खा कर उंघते रहते , मजाल है कि कोई निकल जाए | 
 
 
 
पर छोटी दीदी कहाँ मानने वालीं थी, वोकुर्सी लगा कर उस क्षैतिज लट्ठे पर चढ़ जातीं और बाहर की दुनिया को नन्हीं आँखों से परखने की कोशिश करतीं कि आखिर क्या है इस बाहर की दुनिया में जो सांझ होते ही लड़कियों के लिए निषिद्ध हो जाता है | छोटी दीदी की लाख चतुराई के बाद भी अक्सर बाबा उन्हें पकड़ लेते और जोर से चिल्लाने लगते , “ ई ससुरी नहीं मानिहै , टाँगे काट दे ईकी तब ना चढ़ पहीये , अपनी बड़ी बहन की सरीकत भी नाही करत है कि अम्माँ का हाथ बटावे , कुल का नास करे है | बाबा देर तक बडबडाते और
छोटी दीदी चुपचाप दरवाजे से उतर कर चूल्हे पर रोटियाँ सेंकती अम्मा से चिपक जातीं
 
 
बाबा चूल्हे की ही रोटी खाते थे | गैस की रोटी में छूत लग जाती ,उनका तर्क होता ई गैस के कारण ही आज् कल मानुष बड़े बुजर्गन से जवाब –तलब करने लाग है, हमारे घर में ई ना चलिहैं | छोटी दीदी देर
तक अम्मा से चिपक कर सुबकतीं
पर अम्मा जरा भी ना हिलतीं , ना पक्ष में ना विपक्ष में ,वो आंच में पूरी तरह पक चुकी थीं , बड़ी दीदी ने तय कर लिया था जब पकना ही है तो चिल्लाना बेकार है , छोटी दीदी आंच में डाले जाने की शुरुआत से ही विद्रोह
पर उतारू थीं | 
 
 
 
ऐसी ही किसी एक शाम को बाबा से डांट खाने के बाद छोटी दीदी सुबक कर
अम्मा से चिपकी नहीं , बल्कि अम्माँ को झकझोर कर कहा, “ अम्मा देखना एक दिन मैं
दरवाजे को लड़कियों के लिए शाम को बंद हो जाने की प्रथा को खत्म कर दूँगी, हमारी अध्यापिका कहतीं हैं , खूब पढने –लिखने से से औरतें अपने मन का जीवन जी सकतीं हैं | देखना अम्मा मैं खूब पढूंगी , भैया से भी ज्यादा , बहुत ज्यादा | उस
समय अम्माँ ये किसी मशीन की तरह होरसे
परचलते हाथ रुक गए उन्होंने पलट कर कुछ कहना चाहा पर तब तक छोटी दीदी अपनी किताब ले कर जा चुकी
थीं | ये पहला विद्रोह का स्वर था जो हमारे घर में उठा था |



छोटी दीदी भाग -1
 
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