होड़
बार-बार मेरे सामने आ खड़ा होता है|
हासिल करना क्यों गलत था?
अपने को मनफ़ी कर दूँ? घटा लूँ? उससे कमतर रहने की चेष्टा करूँ?
मामूली चिल्हड़ के लिए बेगानों के कपड़े इस्तरी किया करते हैं? क्योंकि मेहरिन मेरी
माँ मामूली रुपल्ली के पीछे बेगानों के फ़र्श और बरतन चमकाया करती हैं?
बन्दे नहीं? एक ही पृथ्वी के बाशिन्दे?
कौतुहल ने!
प्रिंसीपल बाबू अपने बेटे, किशोर को
था उसकी एक खिड़की हमारे क्वार्टर की तरफ़ खुलती थी| स्पोर्ट्स कॉलेजके प्रिंसीपल बाबू
के बंगले के पिछवाड़े बने पाँच क्वार्टरों में से एक में हम रहते थे- बप्पा, माँ और
मैं| बप्पा कपड़े की प्रेस चलाते थे, माँ बंगले में काम करती थी और मुझे स्कूल में
पढ़ाया जा रहा था| सातवीं जमात तक पहुँचते पहुँचते मैं उन तीनों लातिनी शब्दों के
अर्थ जान चुका था, जिन्हें ओलम्पिक खेलों में लोग एक मोटो, एक आदर्श-वाक्य की तरह
मानते और बोलते रहे हैं : ‘सिटियस’ माने‘और तेज़’, ‘औलटियस’ माने‘और ऊँचा’, ‘फौर्टियस’ माने‘और ज़ोरदार’|
है,” तीन माह पूर्व किशोर ने मुझे अपने कमरे की खिड़की के बाहर से अन्दर झाँकते हुए
पकड़ लिया था|
ने मुझे खिड़की से अन्दर बुलाया था|
मैंने उन्हें सलाम ठोंका था|
कसरत एक मेज़ जैसे ढाँचे पर करता था जिसकी दोनों टाँगें फ़र्श से चिपकी रहतीं और जिसके
ऊपरी तल पर दो फ़िक्स हत्थे खड़े रहते| ढाँचे पर किशोर हाथ के बल सवार होता और एक
हत्थे पर दोनों हाथ टिका कर अपना धड़ और दोनों पैर हवा ले जाता और फिर अपने पैर जोड़कर
गोल छल्ले बनाता हुआ घूमता| कभी दायीं दिशा में| तो कभी बाँयी दिशा में| फिर एक
हाथ छोड़ते समय पैरों की कैंची बनाता और दूसरे हत्थे पर पुनः दोनों हाथ जा टिकाता
और दोनों पैर फिर से जोड़ता और गोलाई में चक्कर काटने लगता : दायीं दिशा में| बाँयी
दिशा में|
जी,” मैंने कहा|
किशोर हँसा|
प्रिंसीपल साहब ने मुझ से पूछा|
राज़ी हो गया| ढाँचे की ऊँचाई बप्पा की प्रेस की मेज़ से बहुत ज़्यादा थी और उसकी
चौड़ाई बहुत कम| यहाँ यह बता दूँ, किशोर की कसरत मैं अकसर मौका पाते ही अपने बप्पा
की मेज़ पर दोहराने का प्रयास करता रहा था| शुरू में बेशक वह बहुत मुश्किल रहा था|
लेकिन धीरे धीरे हाथों के बल मैं इकहरा चक्कर तो काट ही ले जाता| हाँ, किशोर की
तरह दोहरा चक्कर काटते समय मिले हुए मेरे पैरों का जोड़ ज़रूर टूट-टूट जाता|
ली और बाँए हत्थे पर अपने हाथ जा टिकाए| उस हत्थे की टेक मुझे क्या मिली मेरे पैर
और धड़ पंखों की मानिन्द हल्के हो कर बाँयी दिशा में घूम लिए, दायीं दिशा में घूम
लिए मानो उस हत्थे में कोई लहर थी जो हवा में मुझे यों लहराती चली गयी|
लचक है,” प्रिंसीपल बाबू गम्भीर हो चले, “लेकिन तुम्हारे पैर अभी अनाड़ी हैं| सही
दिशा नहीं जानते| सही नियम नहीं जानते| सही लय नहीं जानते| अभी उन्हें बहुत सीखना
बाकी है…..”
जी,” मैं प्रिंसीपल बाबू के चरणों पर गिर गया, “मुझे यह कसरत बहुत अच्छी लगती है, सर
जी…..”
उठना-गिरना| हाथ की टेक| हत्थों की टेक| हवा की टेक| पैर की टेक| धड़ की टेक| नयी
छलाँगें| नयी कलाबाज़ियाँ| नयी युक्तियाँ| उनके नए-नए नाम : स्विंगिंग, टम्बलिंग,
हैंड प्लेसमेंट्स, बॉडी प्लेसमेंट्स…..
ली…..
कस्बापुर में एक जिमनैस्टिक्स प्रतियोगिता आयोजित हो रही है,”
जभी एक दिन प्रिंसीपलबाबू ने किशोर को व मुझे सूचना दी, “लखनऊ उन्हें एक ही पामेलहॉर्स जिमनेस्ट
भेजना है और मैं चाहता हूँ किशोर ही उसमें चुना जाए|
चिरंजी को इसलि ए साथ ले जाना चाहता हूँ ताकि पामेलहॉर्स प्रतियोगिता में प्रतिभागी की गिनती भी पूरी हो जाए और यह किशोर को विजय दिलाने के लिएअपने तीन पूरे नहींले…..”
मेरा जी खट्टा हुआ मगर मैं अपने जी की हालत छिपा ले गया|
है,” प्रिंसीपल बाबू ने मुझे ललचाना चाहा|
दिखाए न बना|
लिए बंगले के अन्दर बुलाया गया तो बहुत कोशिश के बावजूद मेरे माप के मोज़े व
स्लीपर्ज़ न मिल सके|
हर्ज नहीं,” प्रिंसीपल बाबू ने कहा|
झुका लिया|
किशोर हँस कर पिता की ओर देखने लगा|
बैठ गया| एक नया डर, एक नयी फ़िकर मेरे मन में आन बैठी, “प्रिंसीपल बाबू ने
गुरु-दक्षिणा में मेरी उँगली मुझ से छीन ली तो?”
मेरे पैर और मेरा धड़ ज़मीन से छूट कर हवा में लहराया, मेरा शरीर एक दूसरी
आज्ञाकारिता के हवाले हो गया| सभी चेहरे धुँधले पड़ गए| सभी निर्देश, सभी आग्रह
पीछे छूट गए| एक दु:साहस ने मुझे अपनी मूठ में ले लिया|
गयी और वह अजनबी दुनिया मेरी| मुझे लगा मैं वहीं का निवासी था और इन्हीं कलाबाज़ियों के लिए मैंने जन्म
लिया था| मेरा ज़ोर भाग्य पर न था न सही| दुनिया की ऊँच-नीच पर न था, न सही|
निहित था और इन्हीं को मुझे प्राण देने थे, लय देनीथी, लाइन देनी थी, आत्मा देनी
थी|
को खिलाड़ी से बात करने नहीं दी जाती है और इसी वजह से प्रिंसीपल बाबू मेरे दृष्टि
क्षेत्र में नहीं रहे थे और मैं ‘परफ़ेक्ट स्कोर’ पा ले गया था|
बाबू ने : हमारे स्पोर्ट्स कॉलेज के प्रिंसीपल बाबू ने आज दोबारा इतिहास बनाया है|
एक इतिहास उन्होंने सन् १९७६में रचा था जब ओलम्पिक खेलों की पौमेल हॉर्स प्रतियोगिता में इन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व
किया था और एक इतिहास उन्होंने आज रचा है- एकलव्य की कहानी पलटकर| धोबी के उस
पुत्र को उन्होंने न केवल प्रशिक्षण दिया बल्कि उसकी ट्रेनिंग का पूरा खर्चा भी
उठाया| उनके पुत्र का आज द्वितीय स्थान मिला है और उसे प्रथम| आप समझ सकते हैं दोनों
लड़कों को साम्यभाव से कोचिंग देना उनके लिए कितनी बड़ी चुनौती रही होगी| कितनी बड़ी परीक्षा
रही होगी और यह उनकी कितनी बड़ी उपलब्धि है जो इस कसौटी पर वह यों खरे उतरे…..”
सबके सामने मेरी पीठ थपथपायी तो मेरी निगाह किशोर के चेहरे परजा ठहरी|
वैर झलक रहा था|
प्रिंसीपल बाबू ने मेरे बप्पा को क्वार्टर खाली करने का आदेश दे दिया, “तुम तीनों
में से कोई एक भी अगर मुझे इस कॉलेज के आसपास भी दिखाई दिया तो मैं पुलिस बुलवा
भेजूँगा…..”
आदेश ग्रहण किया और हम तीनों वहाँ से इधर इस नयी आबादी में चले आए|
में रखे सभी अखबारों के खेल-समाचार मैं नियमित रूप से पढ़ता हूँ और उस दिनकी
प्रतीक्षा करता हूँ जब मुझे लखनऊ की पामेल हॉर्स एक्सरसाइज़ का न्यौताआएगा|
लिए कुछ न कुछ ज़रूर करेगा|
है न!
अंतिम इच्छा
घूरो , चाहे जितना घूरना है
किट्टी पार्टी
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