सिस्टर्ज़ मैचिन्ग सेन्टर
मैचिग सेन्टर’ बाबूजी का
है|
पास हमीं दो बहनें हैं : जीजी और मैं|
बड़ीहैं और मुझे उन्हीं ने बड़ा किया है| हमारी माँ मेरेजन्मके साथ ही स्वर्ग सिधार
ली थीं| हमारे मैचिन्ग सेन्टर व बाबूजी को भी जीजी ही सँभालती हैं| बाबूजी की एक आँख की ज्योति तो
उनके पैंतीसवें साल ही में उन से विदा ले ली थी|
के चलते|
न किए थे कि उनकेबढ़ रहे अंधेपन के कारण उस कताई के कारखाने सेउनकी छंटनी कर दी गयी
थी जिस के ब्रेकर पर बाबूजीपूनी की कार्डिंग व कोम्बिंग से धागा बनाने का काम करते
रहे थे| पिछले बाइस वर्षों से|
पर लगा कर बाबूजी ने जो दुकान जा खोली तो जीजी ही आगे बढ़ीं| पढ़ाई छोड़ कर|
और घर हमारा गली में है| बाबूजीको घर से बाज़ार तक पहुँचाना जीजी के ज़िम्मे है| छड़ी
थामकर बाबूजी जीजी के साथ साथ चलते हैं| जहाँ उन्हें ज़रुरत महसूस होती है जीजी
उनकी छड़ी पकड़ लेती हैं या फिर उनका हाथ|
फ़र्श पर झाड़ू व वाइपर खुद ही फेरती हैंव मेज़ तथा कपड़ों के थानों पर झाड़न भी| जब तक
बाबूजी बाहर चहलकदमी करते करते पास-पड़ोस केदुकानदारोंकी चहल-पहल व बत-रस का आनन्द
ले लेते हैं|
निकलती हूँ|
टिफ़िन मेरे पहुँचने पर ही खोला जाता है| जीजी पहले बाबूजी को परोसती हैं, फिर
मुझे| हमारे साथ नहीं खातीं| नहीं चाहतीं कोई ग्राहक आए और दुकान का कोई कपड़ा-लत्ता
बिकने से वंचित रह जाए|
हमारी गाहकतायी पच्चीस-तीस प्रतिशत तक बढ़ आयी है|
सेल्ज़मैन आ जुड़ा है| बेशक हम दोनों की दुकानें कुल जमा चार गज़ की दूरीपर एक ही सड़क
का पता रखती रही हैं, लेकिनयह मानी हुई बात है कि किशोर नाम के इस सेल्ज़मैन के आने
से पहले हमारे बीचकोईहेल-मेल न रहा था| पिछले पूरे सभीतीन सालों में|
हैं|
संगति में|
अपनी साड़ी हमें दिखाती हैं औरविशेष कपड़े की मांग हमारे सामने रखती हैं: “शिफ़ॉन
की इस साड़ी के साथ मुझे साटन का या क्रेप ही का पेटीकोट लेना हैऔर ब्लाउज़ भीडैकरोन या कोडेल का…..”
सविस्तार कपड़े के बारे में लम्बे व्यौरे भी दे बैठता है, “देखिए सिस्टर, इसऔरगैन्ज़ा के साथ तो आप डाएनेल का
पेटीकोट और पोलिस्टर का ब्लाउज़ या फिर प्लेन वीवटेबी का पेटीकोट और ट्विलका ब्लाउज़ लीजिए, जिस के ताने की
भरनी में एक सूत है और बाने की भरनी में दो सूत…..”
शोभा उसके रंग और डिज़ाइन से मेल खाते सहायक कपड़े पहनने से दुगुना-चौगुना प्रभाव
ग्रहण कर लेती है|
के बटुओं की अच्छी खासी रकम हमारे हाथों में पहुँचनेलगी है|
रकम पकड़ाते समय मैं तो कई बार पूछ भी लेती हूँ, “फैन्सी वाला यह सेल्ज़मैन क्या
सब सही सही बोलता है या फिर भोली भाली उन ग्राहिकाओं को बहका लिवा लाता है?”
दिया करते हैं, “नहीं जानकार तो वह है| बताया करता है यहाँ आने से पहले वह एक ड्राइक्लीनिंग
की दुकान पर ब्लीचिंग का काम करता था औरलगभग सभी तरह के कपड़ों के ट्रेडमार्क और
ब्रैन्ड पहचान लेता है…..”
भी खूब है| दुकान के लिए सारा कपड़ा वही खरीदते हैं| हाथ में लेते हैं और जान जाते
हैं, ‘यह मर्सिराइज़्ड कॉटन है| इसे कास्टिक सोडा सेट्रीट किया गयाहै| इसका रंग फेड होने वाला
नहीं…..”
इसमें सिन्थेटिकमिला है, नायलोन या टेरिलीन…..’
जल्दी सिकुड़ जाता है या फिर ताने से पसर जाता है…..’
किशोर को इसी सम्बोधन से पुकारते हैं, “तुम यहाँ बैठना चाहोगे? हमारे साथ?”
स्वरुप खरीदी गयी एक ग्राहिका कीसात साड़ियों के पेटीकोट और ब्लाउज़ एक साथ हमारे
मैचिन्ग सेन्टर से बिकवाए
हैं और बाबूजी खूब प्रसन्न एवं उत्साहित हैं|
अन्तिम सिरे पर स्टॉक रजिस्टर की कॉस्ट प्राइस और लिस्ट प्राइस में उलझे होने के
बावजूद बोल उठी हैं, “हमारीहैसियत अभी नौकर रखने की नहीं…..”
बाबूजी ने जीजी कोडाँट दियाहै, “हमआपसमेंबातकर रहे हैं…..”
जीजी से दूरी हासिल करने हेतु बाबूजी किशोर को मेरे पास खिसकालाए हैं, “उषा की बात का बुरा न मानना|
वह शील-संकोच कुछ जानती ही नहीं| माँ इनकी इन बच्चियों की जल्दी ही गुज़र गयी रही…..”
किशोर को मैं ढाँढस बँधाना चाहती हूँ|
पसन्द है ही, साथ ही उसकी तीव्र बुद्धि व भद्र सौजन्य भी मुझे लुभाता है|
अपना स्वर धीमा कर लिए हैं, “उसे जब ब्याह दूँगा तो ज़रूर समझदारी से बोलना सीख
जाएगी| उसकी बात का तुम बुरा मत मानना….. कहो तो उस काहाथ तुम्हारे हाथ में…..”
हुलस कर किशोर ने बाबूजी को अपनेअंक में भर लिया है, “अपनी माँ से मैं रोज़कहता
हूँ, मेरीअब आठ सिस्टर्ज़हैं, इधरछः घर पर हैं और उधर दो सिस्टर्ज़मैचिन्ग सेन्टर पर…..”
बाबूजी की फुसफुसाहट चीख में बदलली है|
जी जी हमारे पास तत्काल चली आयीहैं|
अप्रतिम किशोर जीजीको देखतेही लोप हो लिया है|
किशोरी लाल की छःबहनेंहैं?” बाबूजीअपनीआँख मिचकाते हैं|
पिछले वर्ष तक आतेआते उनकी दूसरी आँख भी अपनी ज्योति पूरी तरह गँवा चुकी है|
रेटिनाऔरऑप्टिक नर्व की कोशिकाओं के निरन्तर ह्रास से उनकी आँखों में सम्पूर्ण रिक्तता भर तो दी है,
लेकिन उत्तेजना में उनकी आँखों के गोलकपक्ष्म और पपोटे अजीब फुरतीलापन ग्रहण कर लेते हैं|
जीजी बाबूजीका हाथअपने हाथ में लेलेती है, “तो?”
नहीं?” बाबूजी की उत्तेजना बनी हुई है|
जीजी तुनकतीहैं|
हमें तुम्हें डॉक्टर बनाना है| छोटी दुकानदारी में नहीं लगाना, अपनी तरह…..”
इसी साल मैं बारहवीं जमात के अपने इम्तिहान के साथ साथ सी.पी.एम.टी. की तैयारी में भी
जुटी जो हूँ|
लगी हैं तो मैं जीजी के पास खिसक आतीहूँ, “आप जानती थीं किशोरीलाल की छः बहनें
हैं?”
वह झूठ बोल गया| वरना, उसकी दो बहनें हैं, छः नहीं…..”
क्यों?” मैं हैरान हूँ, जीजी से अच्छी पत्नी उसे और कहीं नहीं मिलने वाली है|
करना चाहता था| मुझे एक दिन अकेली रास्ते में पा कर बोला, मैं निशा को चाहता हूँ|
उस से मेरी शादी करवा दीजिए| मैं ने उसे खूब डाँटा, निशा तुम जैसे छोटे आदमी
से कतई शादी नहीं करेगी| उसे तो अभी कई ऊँचे पहाड़ चढ़ने हैं, गहरे कई समुद्र पार
करने हैं…..”
जीजी के कंधे पर अपना सिर टिका देती हूँ, “मुझे डॉक्टर बनना है, उस सेल्ज़मैन की
पत्नी नहीं…..”
मैं बाबूजी को जा घेरती हूँ, “उस सेल्ज़मैनसे बात करने से पहले आपने जीजी से पूछा
क्यों नहीं?”
पूछना-जानना नहीं था| जोपूछना-जानना था, उसी लड़के से पूछना-जानना था| उस के संग एक
साँझे भविष्य की ओर जा रहे उषा के कदम पलट क्यों रहे थे? विपरीत दिशा क्यों पकड़
लिए थे?”
पड़ती हूँ, “आप गलत समझ रहे हैं, बाबूजी| जीजी के मन में किशोर के लिए कोई जगह
नहीं| वह तो उसे बहुत ही तुच्छ, बहुत ही छोटा आदमी मानती हैं…..”
कस लिए हैं और स्वर दृढ़ हो आया है, “मैं तुम से ज़्यादा समझ रखता हूँ| ज़्यादा
जानता-बूझता हूँ| आँखें नहीं तो क्या? कान जो हैं| और वह भी तुम आँखों वालियों से
दुगुने तेज़, चौगुने ग्रहणशील| मैं तो हवा तक में तैर रहे हर लहराव, हर कम्पन, हर
स्पंदन पकड़ लेता हूँ और फिर उषा तो मेरी अपनी बच्ची है| किशोरीलाल के लिए उसका
उत्साह भी मेरे पास पहुँचा है और उसका निरुत्साह भी….. और पीछे का सच मुझे
किशोरीलाल ही बता सकता था, उषा नहीं…..”
ली हूँ| बाबूजी को पूरा सच बतलाना मेरे लिए असम्भव है|
चंपा का मोबाइल –दीपक शर्मा
दो जून की रोटी -उषा अवस्थी
गली नंबर दो -अंजू शर्मा
खंडित यक्षिणी – रमा द्विवेदी
ओटिसटिक बच्चे की कहानी लाटा -पूनम डोंगरा
चूड़ियाँ-वंदना बाजपेयी



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