दूसरी औरत ये एक ऐसा भय है जो आम तौर पर पत्नियों में पाया जाता है | पति का मूड कुछ दिन उखड़ा -उखड़ा रहता है कि पत्नी की शक की सुई दूसरी औरत पर घूम जाती हैं, ” कहीं मेरे पति के जीवन में कोई दूसरी औरत तो नहीं | इतनी नज़र रखने , छानबीन तहकीकात करने के बावजूद कुछ पति पत्नी से दूर दूसरी औरत को मेनेज कर ही लेते हैं| जाहिर है इसके लिए कुछ तो छल-बल अपनाते ही होंगे , जिससे पत्नी का भावुक हृदय पिघल जाता होगा, कुछ ऐसा ही छल -बल कर रहे हैं आज की कहानी के नायक यानि बिट्टो के बाबूजी या ये केवल उनकी पत्नी की गलतफहमी ही है | क्या है ? आइये जानते हैं दीपक शर्मा जी की कहानी छल -बल से | यहाँ एक ख़ास बात बताना चाहूंगी … आप पहली बार कहानी को पढेंगे आनंद लेंगे , लेकिन जब उसका तंज समझेंगे तो दोबारा पढेंगे
कहानी –छल-बल
१९५८ के उन दिनों बिट्टो की अम्मा की गर्भावस्था का नवमा महीना चल रहा था|
“ऊपरवाले खाने में एक ख़ाकी लिफ़ाफ़ा रखा है, वह मुझे लादे|”
बिट्टो वह ख़ाकी लिफ़ाफ़ा तत्काल उठा लायी|
अम्माने उसमें से कुछ रुपए निकाले और साथ में एक चवन्नी|
बोलीं, “यह तेरे स्कूल के नाश्ते के लिए है|
तबीयत ढीली होने की वजह से आज मुझसे कुछ बनाते बन नहीं रहा|”
बिट्टो के बाबूजी शुरू ही से बहुत पक्के थे|
वह इंजन ड्राइवर थे|
रेल कर्मचारियों की भाषा में मोटरमैन| उनकी ड्यूटी उन्हें दो-दो, तीन-तीन दिन तक घर सेअलग रखा करती किन्तु घर लौटने पर
फ़ुरसत पाते ही वह अपनी आलमारी का ताला खोलते औरअपनी डायरी के साथ बैठ जाते| बिट्टो
के पूछने पर कहते : इसमें मैं अपनी तनख्वाह का हिसाब रखता हूँ| घर का ख़र्च दर्ज
करता हूँ और अपनी ड्यूटी के समय और स्थान का रिकॉर्ड रखता हूँ| “देखूँ,”
जिज्ञासावश बिट्टो ने वह डायरी झपट ली और उसे पलटनेपर एक अनजाना शब्द उसे कई बार
दिखाई दे गया|
उन दिनों बिट्टो अंगरेज़ी के अक्षर पहचानने लगी थी और उस अनजाने शब्द को उसने अपने
स्कूल की रफ़ कॉपी पर उतार लिया और डायरी वापस धर दी|
का मतलब बिट्टो की अंगरेज़ी अध्यापक ने बताया : सैनेटोरियम| तपेदिक के रोगियों का
आरोग्य-आश्रय जिसे विशेष रूप से किसी पहाड़ी स्थल पर बनाया जाता है ताकि रोगी के
फेफड़े स्वस्थ, खुली हवा में साँस भर सकें|
अम्मा से पूछा- “हमारे परिवार में तपेदिक किसे है?”
सिर हिलाया|
“तुम्हें बताना होगा, अम्मा|
वरना मैं खाना छोड़ दूँगी| भूखी रहूँगी,” बिट्टो ने ज़िद पकड़ ली|
और अपनी बात मनवाने के लिए वह यही अचूक नुस्खा काम में लाया करती थी|
के लिए असम्भव था| और वह बोल दी, “जहाँ तक मैं जानती हूँ तेरे बाबूजी की एक
रिश्तेदारिन थी जिसे तपेदिक हुआ था| मगर उसे मरे हुए तो साल बीत गए…..”
बाबूजी अभी भी तीस रुपए किसे भेजते हैं?” बिट्टो ने पूछा|
तुम्हें बाबूजी की डायरी के पन्ने दिखलाती हूँ…..” बिट्टो बोली|
थी, लेकिन लिखी हुई रकम की पहचान रखती थी|
मूर्च्छित हो गयीं|
बुलाया, “मौसी…..”
मोटरमैन का परिवार रहता था वहाँ आस-पड़ोस एक दूसरे के सुख-दुख बाँटने में पीछे नहीं
रहता था| ज़रुरत पड़ने पर भोजन भी साझा कर लिया जाता|
को पलंग पर लिटा कर बिट्टो को दाई बुलाने भेज दिया|
कमरे से बाहर रहने को बोला| अनमनी बिट्टो बाहर आन बैठी|
तेज़ कराहटों के बीच जैसे ही एक नन्हे बच्चे के रोने की आवाज़ आ शामिल हुई, बिट्टो
को बताया गया- अब तू अकेली नहीं रही| भाई वाली है|
नहीं समाए|
कर स्वयं आँगन में नहाने चले गए : लड़के को साफ़ हाथों से पकडूँगा, सुथरे कपड़ों में…..
पचासके उस दशक में रेलगाड़ियाँ
डीज़ल या बिजली की जगह भाप से चलती थीं, भाप छोड़ती हुई|
उन्हें कहा जाता| मोटरमैन को उस समय कोयलों की भट्टी में कोयला स्वयं बेलचे से
डालना पड़ता था| ऐसे में इंजन छोड़ते समय बाबूजी के कपड़े और हाथ गंधैले और दगैल हो
जाया करते|
रेल कर्मचारियों के पास भी आज जैसी सुविधाएँ नहीं थीं| एयरब्रेक्स की जगह ब्रेकमैन
थे जो रेल के डिब्बों पर चढ़-चढ़ कर- उनकेआर-पार- हाथ से ब्रेक सेट करते| डिब्बा की
कपलिंग तक हाथ से की जाती, ऑटोमेटिक कपलर से नहीं|
लपक कर नन्हे को अपनी गोदी में उठा लिए और बिट्टोसे बोले, “देख तेरा बन्धु कैसे
मुस्करा रहा है….. हमारा नन्हा….. हमारा नन्हा…..”
बार देख रही थी| उसका सिर उसके बाक़ी शरीर के अनुपात में खूब बड़ा था| आँखें मूँदी
थीं| लेकिन अन्दर छिपे उसके नेत्र गोलक अपने अपने कोटर में तेज़ी से चल फिर रहे थे|
ताली बजायी, “और देखिए, इतना छोटा मुँह और इतनी बड़ी मुस्कान…..”
रही जो इसे हमारे पास बीस दिन पहले लिवा लायी…..” बाबूजी हँसे और अम्मा की बगल
में बैठ लिए|
था और अब भी वहीं लेटी थीं|
बाबूजीके वहाँ बैठते ही
अम्मा ने अपना मुँह दीवार की तरफ़ फेर लिया|
में बहते रहे, “कल मुझे दो काम करने हैं| तेरे आने की ख़ुशी में सुनार से तेरी
अम्मा कोबीर कंगन दिलाना है और तेरी नानी को यहाँ लिवाना है…..”
वहाँ छोड़ आइए,” अम्मा रोने लगीं|
बाबूजी हैरान हुए|
क्या मैं खुश रहूँगी,” अम्मा बोलीं|
हुए|
ज़िन्दा थी तो तुमने उसे मरी हुई कैसे बता दिया? मुझे छला? मेरेपरिवार को छला?”
बाबूजी ने अपने होंठ सिकोड़े| माथा मिचोड़ा|
ने आलमारी क्या खोली, तुम्हारी ज़िन्दगी खोल दी…..” अम्मा ने कटाक्ष किया|
बाबूजी हड़बड़ा गए| बिट्टो ने उन्हें इस तरह
हड़बड़ाते हुएपहली बार देखा|
कुछ बोले, वह अपने कमरे की ओर चल दिए|
ने अम्मा से पूछा|
रुलाई और गुस्से की तैश में अम्मा भूल गयीं वह बिट्टो पर चिल्ला पड़ी थीं| पहली
बार|
पर लेटे थे| उनके पैताने जा कर बिट्टो उनके पैर दबाने लगी|
अम्मा से सीखी थी|
पैर खींच लिए| वह काँप रहे थे|
“मुझे माफ़ कर दीजिए,”
बिट्टो का जी बाबूजी की घबराहट देख कर दुखा जा रहा था, “मुझे आपकी डायरी नहीं
देखनी चाहिए थी…..”
थे| बहुत जल्दी पिघल जाया करते| अव्वल तो उन्हें गुस्सा आता ही नहीं और कभी आता भी
तो वह आपे से बाहर होने की बजाए आपा सँभालने में लग जाते|
अपने प्रश्न पर लौट ली|
“मेरी पहली पत्नी| उसे
तपेदिक हो गया तो डॉक्टर ने मुझे उससे दूर रहने की सलाह दी| उसके मायके का घर भी
हमारे जैसा छोटा घर था| उनके लिए भी उसे रखना मुश्किल था…..” बाबूजी का गला रूंध
गया|
समर्थ कहाँ? एक गाँव है जहाँ उसकी एक मौसेरी ताई अकेली रहती है| उसी के नाम हर
महीने राजेश्वरी के लिए वे रुपए भेजा करता हूँ…..”
को अम्मा को वापस लीक पर लाने की जल्दी थी|
“उसे यह भी बता आना
राजेश्वरी मर रही है, जल्दी मर जाएगी,”बाबूजी की आवाज़ उनके आँसुओं से भीग गयी|
के गाल जा छुए,” रोओ नहीं…..” अम्मा की गालें आँसुओं से तर थीं |
जल्दी मर जाएगी, अम्मा…..”
चमकी|
पर एक थपकी दे कर बोलीं, “धत! अपनी माँ का नाम लेती है| उसके लिए अशुभ बोलती है…..”
दीपक शर्मा
वास्तु दोष
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