हो तुम गुलाब मैं कंटक क्यूँ कविता में थोड़ी कल्पना का समावेश किया है | जैसा कि हम सब जानते हैं कि गुलाब के कांटे लोगों को खलते हैं | शायद इस कारण कांटे के मन में द्वेष पैदा होता हो ? उसे गुलाब से शिकायत होती हो ? गुलाब का अपना दर्द हैं …..यहाँ उनका आपसी संवाद है |
हो तुम गुलाब मैं कंटक क्यूँ
तब अपने मध्य यह अंतर क्यूँ ?
हो तुम गुलाब मैं कंटक क्यूँ?
पूजन -अर्चन श्रृंगार में नियुक्त
कवि कल्पना का तुम प्रथम द्वार
मिलता सबसे तुम्हें अतिशय प्यार
नित आत्मग्लानि से गड़ा हुआ
अपने मन में मत द्वेष भरो
अपने घर में कहाँ रह पाता
निज डाली से टूटता है नाता
तोडा कुचला मसला जाता
कैसे समझाउ मैं तुमको
यह रूप बना है बाधक यूँ
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