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| फोटो क्रेडिट –www.shutterstock.com |
जो चीज सबसे ज्यादा जुडी है , वो है गुझिया | बच्चों को जितना इंतज़ार रंगों से
खेलने का रहता है उतना ही गुझिया का भी | एक समय था जब होली की तैयारी कई दिनों
पहले से शुरू हो जाती थी | आलू के चिप्स , साबूदाने व् आलू , चावल के पापड़ , बरी
आदि महीने भर पहले से बनाना और धूप में सुखाना शुरू हो जाता था | हर घर की छत ,
आँगन , बरामदे में में पन्नी पर पापड़ चिप्स सूखते और उनकी निगरानी करते बच्चे नज़र
आते | तभी से बच्चों में कहाँ किसको कैसे रंग डालना है कि योजनायें बनने लगतीं |
गुझिया -अपनेपन की मिठास व् परंपरा का संगम
बतियाते हुए ये सब काम कर लेती थीं , तब इन्हें करते हुए बोरियत का अहसास नहीं
होता था | हाँ ! गुझिया जरूर होलाष्टक लगने केर बाद ही बनती थी | पहली बार गुझिया
बनने को समय गांठने का नाम दिया जाता | कई महिलाएं इकट्ठी हो जाती फाग गाते हुए
कोई लोई काटती , कोई बेलती , कोई भरती और
कोई सेंकती, पूरे दिन का भारी काम एक उत्सव की तरह निपट जाता | तब गुझियाँ भी बहुत
ज्यादा संख्या में बनती थीं ….घर के
खाने के लिए , मेह्मानों के लिए और बांटने के लिए | फ़ालतू बची मैदा से शक्कर पारे
नामक पारे और चन्द्र कला आदि बन जाती | इस सामूहिक गुझिया निर्माण में केवल घर की
औरतें ही नहीं पड़ोस की भी औरतें शामिल होतीं , वादा ये होता कि आज हम आपके घर
सहयोग को आयें हैं और कल आप आइयेगा , और देखते ही देखते मुहल्ले भर में हजारों
गुझियाँ तैयार हो जातीं |
रोकने वाला नहीं , खायी गयी गुझियाओं की कोई गिनती नहीं , बड़े लोग भी आज की तरह
कैलोरी गिन कर गुझिया नहीं खाते थे | रंग खेलने आये होली के रेले के लिए हर घर से
गुझियों के थाल के थाल निकलते … ना खाने में कंजूसी ना खिलाने में |
बड़े शहरों में अब वो पहले सा अपनापन नहीं रहा | संयुक्त परिवार एकल परिवारों में
बदल गए | अब सबको अपनी –अपनी रसोई में अकेले –अकेले गुझिया बनानी पड़ती है | एक
उत्सव की उमंग एक काम में बदलने लगी | गुझिया की संख्या भी कम होने लगी, अब ना तो उतने बड़े परिवार हैं ना
ही कोई उस तरह से बिना गिने गुझिया खाने वाले लोग ही हैं , अब तो बहुत कहने पर ही लोग गुझिया की प्लेट की तरफ हाथ बढ़ाते
हैं , वो भी ये कहने
पर ले लीजिये , ले लीजिये खोया घर पर ही बनाया है,सवाल सेहत का है, जितनी मिलावट रिश्तों में हुई है उतनी ही खोये
में भी हो गयी हैं …
को बचाए हुए हैं | इसका कारण
इसका परंपरा से जुड़ा होना है |
बिकनी शुरू हो जाती है … जिनको गिफ्ट में देनी है या घर में ज्यादा खाने वाले
हैं वहां लोग खरीदते भी हैं , फिर भी शगुन के नाम पर ही सही गुझिया अभी भी घरों
में बनायीं जा रही है … ये अभी भी परंपरा और अपनेपन मिठास को सहेजे हुए हैं |
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