गुझिया -अपनेपन की मिठास व् परंपरा का संगम


गुझिया -अपनेपन की मिठास व् परंपरा का संगम
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रंगों के त्यौहार होली से रंगों के बाद
जो चीज सबसे ज्यादा जुडी है , वो है गुझिया | बच्चों को जितना इंतज़ार रंगों से
खेलने का रहता है उतना ही गुझिया का भी | एक समय था जब होली की तैयारी कई दिनों
पहले से शुरू हो जाती थी | आलू के चिप्स , साबूदाने व् आलू , चावल के पापड़ , बरी
आदि
 महीने भर पहले से बनाना और धूप  में सुखाना शुरू हो जाता था | हर घर की छत ,
आँगन , बरामदे में में पन्नी पर पापड़ चिप्स सूखते और उनकी निगरानी करते बच्चे नज़र
आते | तभी से बच्चों में कहाँ किसको कैसे रंग डालना है कि योजनायें बनने लगतीं |

गुझिया -अपनेपन की मिठास व् परंपरा का संगम 


संयुक्त परिवार थे , महिलाए आपस में
बतियाते हुए ये सब काम कर लेती थीं , तब इन्हें करते हुए बोरियत का अहसास नहीं
होता था | हाँ ! गुझिया जरूर होलाष्टक लगने केर बाद ही बनती थी | पहली बार गुझिया
बनने को समय गांठने का नाम दिया जाता | कई महिलाएं इकट्ठी हो जाती फाग गाते हुए
कोई लोई काटती , कोई बेलती , कोई भरती
 और
कोई सेंकती, पूरे दिन का भारी काम एक उत्सव की तरह निपट जाता | तब गुझियाँ भी बहुत
ज्यादा
 संख्या में बनती थीं ….घर के
खाने के लिए , मेह्मानों के लिए और बांटने के लिए | फ़ालतू बची मैदा से शक्कर पारे
नामक पारे और चन्द्र कला आदि बन जाती | इस सामूहिक गुझिया निर्माण में केवल घर की
औरतें ही नहीं पड़ोस की भी औरतें शामिल होतीं , वादा ये होता कि आज हम आपके घर
सहयोग को आयें हैं और कल आप आइयेगा , और देखते ही देखते मुहल्ले भर में हजारों
गुझियाँ तैयार हो जातीं |

बच्चों की मौज रहती , त्यौहार पर कोई
रोकने वाला नहीं , खायी गयी गुझियाओं की कोई गिनती नहीं , बड़े लोग भी आज की तरह
कैलोरी गिन कर गुझिया नहीं खाते थे | रंग खेलने आये होली के रेले के लिए हर घर से
गुझियों के थाल के थाल निकलते … ना खाने में कंजूसी ना खिलाने में |


हालांकि
बड़े शहरों में अब वो पहले सा अपनापन नहीं रहा | संयुक्त परिवार एकल परिवारों में
बदल गए | अब सबको अपनी –अपनी रसोई में अकेले –अकेले गुझिया बनानी पड़ती है | एक
उत्सव  की उमंग एक काम में बदलने लगी | गुझिया की संख्या भी कम  होने लगी, अब ना तो उतने बड़े परिवार हैं ना
ही कोई उस तरह से बिना गिने गुझिया खाने वाले लोग ही हैं
 , अब तो बहुत कहने पर ही लोग गुझिया की प्लेट की तरफ हाथ बढ़ाते
हैं
, वो भी ये कहने
पर ले लीजिये
, ले लीजिये खोया घर पर ही बनाया है,वाल सेहत का है, जितनी मिलावट रिश्तों में हुई है उतनी ही खोये
में भी हो गयी हैं  … 


फिर भी शुक्र  है कि गुझिया अभी भी पूरी शान से अपने
को बचाए हुए हैं
| इसका कारण
इसका परंपरा से जुड़ा  होना है | 
यूँ तो मिठाई की दुकानों पर अब होली के आस -पास से ही गुझिया
बिकनी शुरू हो जाती है … जिनको गिफ्ट में देनी है या घर में ज्यादा खाने वाले
हैं वहां लोग खरीदते भी हैं , फिर भी शगुन के नाम पर ही सही गुझिया अभी भी घरों
में बनायीं जा रही है … ये अभी भी परंपरा  और अपनेपन मिठास को सहेजे हुए हैं |

लेकिन जिस तेजी से नयी पीढ़ी में देशी त्योहारों को विदेशी तरीके से मनाने का प्रचलन बढ़ रहा है …उसने घरों में रिश्तों की मिठास सहेजती गुझिया  पर भी संकट खड़ा कर दिया है | अंकल चिप्स कुरकुरे आदि आदि … घर के बने आलू के पापड और चिप्स को पहले ही चट कर चुके हैं, अब ये सब घर –घर में ना बनते दिखाई देते हैं ना सूखते फिर भी गनीमत है कि अभी कैडबरी की चॉकलेटी गुझिया इस पोस्ट के लिखे जाने तक प्रचलन में नहीं आई है ) , वर्ना दीपावली , रक्षाबंधन और द्युज पर मिठाई की जगह कैडबरी का गिफ्ट पैक देना  ही आजकल प्रचलन में है | 


परिवर्तन समय की मांग है … पर परिवर्तन जड़ों में नहीं तनों व् शाखों में होना चाहिए …ताकि वो अपनेपन की मिठास कायम रहे | आइये सहेजे इस मिठास को …

होली की हार्दिक शुभकामनायें 

वंदना बाजपेयी 



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