कहानी -जमा मनफी
पपा के दफ़्तर
पहुँचते-पहुँचते मुझे चार बज जाते हैं|
वे अपने ड्राइंगरूम
एरिया के कम्प्यूटर पर बैठे हैं|
अपनी निजी
सेक्रेटरी, रम्भा के साथ|
दोनों खिलखिला रहे
हैं|
ठग लो,” मुझे देखते ही पपा अपनी कम्प्यूटर वाली कुर्सी से उठकर मुझे अपने अंक में
ले लेते हैं, “इसने अभी कुछ देर पहले ५०,००० रुपए बनाए हैं…..”
के प्रति मैं विरक्त हो उठती हूँ| पहले की तरह उसके उत्तर में अपनी गाल उनकी गाल पर
नहीं जा टिकाती|
शेयर ख़रीदे थे उनकी कीमत तीन बजे तक पांच गुणा
चढ़ गई और इसने उन्हें बेचडाला| बधाई दो इसे…..”
देने ही तो आई हूँ,” पपा से मैं थोड़ी अलग जा खड़ी होती हूँ, “इसकी ड्राइविंग सीखने
के लिए और इसकी नई ऑल्टो के लिए…..”
लोप हो रही है|
नहीं होगी,” मैं व्यंग्य कर रही हूँ|
है, जो पपा केरिटायरमेन्ट के समय के सरकारी दफ़्तर में एक जूनियर पी. ए. है और पपा
ने उससे जब अपनी रिटायरमेन्ट के बाद खोली गई अपनी इस नईकन्सलटेन्सी के लिए एक निजी
सेक्रेटरी की ज़रुरत की बात की थी तो उसने रम्भा को आन पेश किया था| ५००० रु.
माहवार पर|
रम्भा,” पपा तुरंत स्थिति संभाल ले जाते हैं, “तीन चाय और एक प्लेट पनीर पकौड़े इधर
भेज दे…..”
प्रश्न का उत्तर दिए बिना रम्भा सोफ़े के बगल में रखे फ़ोन पर तीन अंक घुमाकर पूछती
है, “किचन?”
दफ़्तर अपने एक मित्र के गेस्ट हाउस के एक स्वीट में खोल रखा है जिसकी रसोईसे
जोचाहें, जब चाहें, कुछ भी मँगवा सकते हैं| सच पूछें तो यह पपा का दफ़्तर कम और
अतिथि आवास ज़्यादा है| शहर से बाहर के अपने मित्रों और परिवारजन को पपा यहीं
ठहराते हैं| उधर ममा के पास नहीं|
मत मंगवाइए,” पहले की तरह सोफ़ा ग्रहण करने की बजाए मैं वहीं खड़ी रहती हूँ, “मुझे
आप से एक बात करनी है| सौरभ के बारे में| अकेले में|”
१९९३ से| रईस पिता के इकलौते बेटे| शहर के सबसे बड़े मॉल की एक बड़ी दुकानके अपने पिता
की साझेदारी के मालिक| पंद्रह वर्षीय मेरे रोहित और ग्यारह वर्षीया मेरी वृन्दा के
पिता|
पपा रम्भा की ओर देखते हैं|
“मैं जाऊँ?” वह अपनी हीं-हीं
छोड़तीहै|
को अपने क्लब के स्विमिंग पूल ले जा रहे थे और मैं ममा-पपा से मिलने उनके घर पर गई
हुई थी| रम्भा उस समय वहीं थी| अभी तीन हीदिन पहले पपा ने मोतियाबिंद का ऑपरेशन
करवाया था और उन दिनों दफ़्तर नहीं जा रहे थे| रम्भा ही दफ़्तर से डाक ला रही थी|
नौकर, परसराम, पपा को बुलाने गया तो उन्होंने उससे खाने की मेज़ पर रम्भा की प्लेट
भी लगवा ली|
खाएगी,” माँ ने मेज़ पर पहुँचते ही परसराम को रम्भा की प्लेट उठा ले जाने का आदेश
दिया|
के साथ वहां पहुँच लिए, “या तो यह लड़की भी अभी खाएगी या फिर मैं बाद में इसके साथ
खाऊँगा…..”
विद अ सर्फ़ औन माए टेबल,” (अपनी मेज़ पर मुझे एक दास की संगत स्वीकार नहीं), रम्भा
की कमज़ोर अंग्रेज़ी का लाभ उठाते हुए ममा ने अंग्रेज़ी में पपा से कहा|
रम्भा की सुविधा के लिए पपा हिंदी में बोले, “मेरी मित्र है| मेरी मेहमान है…..”
ममा की बात मानता है| जानता है उसे पक्की सरकारी नौकरी दिलाने में ममा उसके लिए
अधिक सहायक सिद्ध हो सकती हैं| यों तो पपा और ममा आए.ए.एस. में एक ही साल १९७० में
आए थे और रिटायर भी एक ही साल, २००५ में हुए थे, ममा मार्च में और पपा सितंबर में,
किंतु ममा को अपनी एक विदेशी पोस्टिंग के आधार पर सार्वजनिक एक विशाल संस्था में
अध्यक्षा की नियुक्ति मिल गई थी| १ अप्रैल, २००५ ही से| रिटायरमेंट के बाद का एक
दिन भी उनका खाली नहीं गया था| जैसे पपा के जनवरी तक के पूरे चार माह|
ममा| लेट इट बी,” मैंने ममा को संकेत दिया, (वे अपने गुस्से को विराम दे दें और
ऐसा ही चल लेने दें)|
फिर?)”, ममा का चेहरा बुझ चला, “बट शी इज़ नॉट आर इक्युल(किंतु वह हमारे बराबर की
नहीं…..)”
पड़े, “उसके हाथ में उंगलियाँ कम हैं? या खाने के लिए मुंह ज़्यादा हैं?”
पपा की ओर देखकर अपनी हीं-हीं छोड़ी| उसकी इसी हीं-हीं की बारम्बारता को देखते हुए हम
माँ-बेटी उसे अकेले में ‘लाफ़िंग गैस’ (हास्स-गैस) पुकारा करते हैं|
शेयर द डेलिकेसीज दैट आए हैड गौट फ़ौर यू(तुम्हारे लिए विशेष बना भोजन मैं उसके साथ
बाँटना नहीं चाहती थी),” ममा की आवाज़ टूटने लगी|
ममा(अपना दर्प छोड़ दो, माँ)| फ़ौर माए सेक (मेरी ख़ातिर)|”
परसराम को संबोधित किया, “सभी प्लेट यहीं रहने दो…..”
पास खड़ी रम्भा ने अपनी हास-गैस फिर छोड़ी| पपा की ओर देखते हुए|
से पहले मैंने उसे कह दिया|
के लिए ममा फिर वहां खाने के अंत तक बैठी तो ज़रूर रहीं मगर पुराने अभ्यास के
विपरीत उन्होंने कोई भी पकवानन ही किसी को परोसा और नस्वयं ही भरपेट खाया|
है?” पपा सोच में डूब जाते हैं, “तो चलो हमीं उधर हॉल में चलते हैं| रम्भा यहाँ
कम्प्यूटर का अपना काम पूरा कर लेगी…..”
साथ मैं भी अपने कदम दरवाज़े की ओर बढ़ाती हूँ, “और चाय, भी हम दोनों वहीं ले लेंगे…..”
मचलती है|
दूँगा| तुम्हारे पनीर-पकौड़ों के साथ…..”
के दूसरे किराएदार ने दो सोफ़ों के साथ आठ कुर्सियाँ और एक लंबी मेज़ लगवा रखी है जो
उसकी कंपनी की मीटिंग़्ज़ के दौरान कॉन्फ्रैन्स के काम में लाई जाती है और मीटिंग़्ज़
के बाद खाने-खिलाने के|
हॉल के खाली होने पर इसका प्रयोग भी मुक्त रूप से कर सकते हैं, करते हैं| वास्तव
में इस फ़्लैट की एंट्री ही हॉल से होती है|
कहता है?” हम दोनों के सोफ़े पर अपने-अपने आसन ग्रहण करते ही पपा पूछते हैं|
नई ऑल्टो ड्राइव करते हुए क्या देख लिया, मुझे आप से यह पूछने के लिए इधर भेज
दिया, क्या वह मोटर आपने उसे ख़रीद कर दी है…..”
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निजी मामलों में उसे दिलचस्पी नहीं लेनी चाहिए…..”
सतर्क हो जाती हूँ| इधर मैं पपा को नाराज़ करने नहीं आई हूँ|
तो मैं ज़रूर बताऊँगा| तुम तो मेरी लाडली हो| मेरी निहंग लाड़ली, पपा मेरे हाथ से
खेलने लगते हैं| मानो अभी भी मैं कोई बच्ची रही|
जानना चाहती हूँ,”
“मैंने उसे खरीद कर
नहीं दी, सिर्फ़उसे खरीद का लोन दिया है…..”
शेयर्स बेचकर उतार रही है| प्लीज़, पपा, थ्रो दैट पैरासाइट आऊट (कृपया उस परजीवी को
बाहर निकाल फेंकिए)”|
(तुम मुझे परजीवी कहो)| नौट हर(उसे नहीं)| आएलिव औन हर| शी इज़ नौट लिवऑन मी (मैं
उसके सहारे जी रहा हूँ, वह मेरे सहारे नहीं जी रही…..)”
लिए आपको ऐसी वौन-न-बी (साधन-विहीन उच्चाकांक्षी), ऐसीवौंट-विट(मूर्खा) का सहारा
क्यों चाहिए? जब ममा आपके साथ खड़ी है…..”
खड़ी होती है? आगे ही आगे निकल भागती है| भूल जाती है हम दोनों बराबर की तनख्वाह
पाते रहे हैं, बराबर के रैंक से रिटायर हुए हैं, बराबर की पेंशनपा रहे हैं और सच
बताऊँ तो वह यह भी भूल जाती है हम सबसे पहले मानव जीव हैं, हमें मानव स्पर्श की,
मानव प्रेम की ज़रुरत रहती है…..”
सकती हूँ पपा, यह शिकायत तो ममा भी कर सकती हैं लेकिन परस्पर-विरोधी, अव्यवस्थित
माता-पिता की संतान सामान्य बच्चों की तरह न तो उन तक दूसरे की शिकायत पहुंचाती है
और न ही एक से दूसरे की शिकायत करती है|
मालूम है इधर मेरी दोनों आँखें मोतियाबिंद से कमज़ोर से कमज़ोरतर हो रही थीं और उधर
तुम्हारी चेयरपर्सन साहिबा मुझे क्या बता रही थीं? हमारेमंत्री मेरे विभाग के सभी
रीजनल डायरेक्टर्ज़ की एक मीटिंग बुलाने वाले हैं| और उस मीटिंग से पहले मुझे सभी
का काम उनके रीजन में जाकर देखना-परखना है| ऐसे में मुझे किसने देखा? तुम्हारी उस वौन-न-बीने,
उसवौन्ट-विटने| मेरे साथ वह डॉक्टर के पास जा रही थी| तीन-तीन घंटे मेरे साथ वहां
बैठ रही थी| और मालूम है? ऑपरेशन के दिन वहां मेरे साथ कौन था? वहीवौन-न-बी, वही
वौन्ट-विट| औरऑपरेशन केबाद आँख में हर घंटे दवा डालने का काम किसने संभाला? दिन
में उस लड़की ने और रात में उसके पति ने| इस बीच चेयरपर्सन साहिबा क्या करती रही
थीं? एक दौरे के बाद दूसरे दौरे की तैयारी| एक रिपोर्ट के बाद दूसरी रिपोर्टकाआयोजन…..”
नहीं बुलाया पपा?” अपनी बाँहों से मैं उनके कंधे घेर लेती हूँ|
नहीं वह सौरभ और उसका परिवार तुम्हारे समय को कैसे अपनी पकड़ में रखते हैं?
ब्लडी बास्टर्ड्ज़(पुश्तैनी हरामज़ादे)!”
दिशा से एक आदमी चाय की ट्रे के साथ आन उपस्थित हुआ है|
के कंधों से अलग कर लेती हूँ|
और तीसरी चाय और एक प्लेट में कुछ पकौड़े रखकर अंदर, मेरे स्वीट में पहुँचा आओ|”
हैंड-ब्रेक खोलते समय मैं अपनी घड़ी देखती हूँ|
दिखा रही है|
निकलते ही मैं ममा के दफ़्तर की सड़क लेती हूँ| सौरभ का मानना है मेरी ममा को चेताना
बहुत ज़रूरी है ताकि पपा रम्भा को कुछ और न दे-दिला दें|
वाली एक सड़क के एक किनारे पर रोककर मैं ममा का मोबाइल मिलाती हूँ| ममा से मिलने के
लिए मुझे पहले उनके दफ़्तर में उनकी उपस्थिति की पुष्टि करनी होती है|
मोबाइल उठाती हैं|
रही हूँ…..”
समय मैंने यहाँ अपने रीजनल डायरेक्टर्ज़की एक मीटिंग बुलारखी है…..”
जाओगी?”
ख़ास बात है?”
‘लाफ़िंगगैस’ को एक नई ऑल्टो खुद ड्राइव करते हुए देखा तो मुझे बोला, ममा को चेता दो, पपा उस सैक्रेटरी-वैक्रेटरी
को कुछ ज़्यादा ही भाव दे रहे हैं…..”
उसे और भी कुछ दे-दिला सकते हैं…..”
ममा ठठाती हैं, “मकान मेरे नाम हैं…..”
बैंक-बैलेंस?”
सिर-दर्द है, मेरा नहीं….. मेरे पास अपना बहुत है…..”
तो खुश होना चाहिए एक गरीब लड़की आगे बढ़ रही है…..”
बढ़ा कौन रहा है?”
पति ऐसी ही गरीब, लड़कियों को आगे बढ़ाया करते हैं…..”
क्या करती हैं?”
आगे बढ़ाने लगती हैं और इस तरफ़ अपनी आँखें मूँद लेती हैं…..”
हल हो जाती है क्या?” मन में उठ रहे अपने प्रश्न को मोड़ कर मैं व्यावहारिकता का
वेश पहना देती हूँ| क्योंपूछूँ उनसे, आँखें बंद कर लेने से क्या मन में खुल रहे,
रिस रहे घाव भी अपनी टपका-टपकी बंद कर दिया करते हैं? मैं जानती हूँ ममा अपने मन
के घाव को, अपनी अवमानना, अपनी असफलता के रूप में नहीं, बल्कि एक समस्या के रूप
में प्रस्तुत हुए देखना चाहती हैं|
औरत ही हल करती है,” ममा फिर ठठाती हैं, “आगे बढ़ जाने के बाद वह दूसरे बड़े शिकार
ढूँढने लगती है और आपकी गृहस्थी चलती रहती है…..”
का मतलब शायद उसके स्वरुप से है, जिस पर हो रहे व्यय का परिचालन वे पपा के साथ
बखूबी बाँटती रही हैं| और अब भी बाँट रही हैं| क्योंकि मैं जानती हूँ गृहस्थी के
तत्वावधान का स्वभाव तो वे दोनों ही अपने वैवाहिक जीवन के प्रारंभिक वर्षों ही में
खो चुके हैं|
ममा, (तुम्हारी बुद्धि बहुत तेज़ है, माँ)” मैं कहती हूँ|
चपरासी इधर दो बार झाँक कर गया है| कॉन्फ्रैंस रूम में सभी डायरेक्टर्ज़ पहुँच गए होंगे|
लेकिन तुम बोलो, तुम्हारे मन से मेरी चिंता दूर हुई?”
स्वीटहार्ट(प्रियतमा)| जब तक मैंने चिंता की, बहुत कष्ट पाया| चिंता छोड़ी, तो सब मिला|
मिल रहा है…..”
मैं उदास हो जाती हूँ|
जब ममा वहां जिलाधीश थीं और पपा मेरीआया को ममा से ज़्यादा तूल दिया करते थे|
मेरा चपरासी फिर इधर झाँक रहा है| मुझेअब उठना ही होगा…..”
छूटे लोगों की भीड़ लगातार बढ़ रही है|
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