लघुकथा -मिलाप
किनारे आकर उसमें कूद जाने की तैयारी में था। तभी उसने एक बूढ़े व्यक्ति को नदी में
छलांग लगाते देखा। वह अपना कूदना भूलकर बूढ़े को बचाने के लिए पानी में फौरन उतर
गया। उसे तैरना भलीभांति आता नहीं था। उसे बड़ी मशक्कत करनी पड़ी। वह किसी तरह बूढ़े
को खींचकर पानी के बाहर तट पर ले आया। बूढ़ा व्यक्ति नीम बेहोशी में था। उसने लड़के
से पूछा, ‘‘मुझे…मुझे क्यों
बचाया….? मैं जीना नहीं
चाहता।’’
छोड़कर चला गया। लेकिन मुझे लगता है, तुम भी कूदनेवाले थे। तुम्हारी क्या मजबूरी है ?’’
‘‘मैं भी अकेला हो गया हूं। कुछ समय पहले मां
चली गई। अब पिता भी छोड़ गए।’’
ताकते रहे। रात उतरने लगी तो दोनों सड़क की तरफ बढ़ चले। सड़क पर आते-आते दोनों
एक-दूसरे के नजदीक आने लगे। सड़क पर आते ही बूढ़े ने लड़के का हाथ पकड़ लिया और निराशा
से निकलने की कोशिश में पूछा, ‘‘क्या तुम मेरे साथ रहोगे ?’’
एक तारा झिलमिलाता दिखा। तारे की रोशनी उसकी आंखों में भर गई। उसने हल्की मुस्कान
के साथ कहा, ‘‘हां,
मैं आपके साथ चलूंगा।’’
–ज्ञानदेव
मुकेश
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