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प्रेम का बंधन


                                                                       

लघुकथा -प्रेम का बंधन

 
सफलता , सुख सम्पत्ति अकेलापन भी लाती है और दुःख में सम भाव का अहसास टूटे  रिश्तों के धागों को जोड़ कर परम का अटूट बंधन बना देता है | मानवीय स्वाभाव की इस विशेषता पर एक लघुकथा …

लघु कथा -प्रेम का बंधन 

दोनों की आयु बारह-तेरह वर्ष होगी। उनके हाथ में रद्दी का सामान जमा करने वाला एक ठेला था। वे उसे घसीटते हुए गली में आगे बढ़ रहे थे और लोगों से अपने घर के कबाड़ बेचने का ऊंचे स्वरों में आह्वान कर रहे थे। मैंने उनकी पुकार सुनी तो उन्हें अपने घर में बुलाया। वे बड़ी उम्मीद से घर में आए। मगर मैंने उनके घर में घुसते ही सवाल किया, ‘‘तुम लोग पढ़ते क्यों नहीं ? यह उम्र क्या यही सब करने की है ?’’

उन्हें प्रश्न बेहद अवांछित लगा। उनमें जो बड़ा था, उसने उलाहना देते हुए पूछा, ‘‘गरीब पहले खाएगा या पढ़ेगा ?’’
जवाब सुनकर मैं अपराध-बोध से ग्रसित हो गया। आवाज को मुलायम करते हुए मैंने पूछा, ‘‘क्या तुम बहुत गरीब हो ?’’

उसमें से छोटे ने कहा, ‘‘हां, आज हम बहुत गरीब हैं। मगर कभी हम अच्छे खाते-पीते घर के थे। हम बड़े शौक से स्कूल जाते थे। मगर एक दिन हमारे बड़े ताऊ ने धोखे से हमारी पूरी जमीन हथिया ली। मेरे पिता जी कोर्ट-कचहरी करते रहे। मगर हमें हमारी जमीन वापस नहीं मिली। उल्टे जो घर में बचा-खुचा था, मुकदमेबाजी के भेंट चढ़ गया। हम कंगाल हो गए। ऊपर से दोनों परिवारों में भीषण दुश्मनी पैदा हो गई। ’’

पढ़िए -लघुकथा :मिलाप 

मैंने पूछा, ‘‘तुम्हारे उस दुष्ट ताऊ का क्या हुआ ? क्या वह सुख-चैन से जी रहा है ?’’

छोटे लड़के ने जवाब जारी रखते हुए कहा, ‘‘उस अन्यायी ताऊ का भी भला नहीं हुआ। वह बीमार हो गया। उसकी छाती में पानी भर गया। वह इलाज कराता रहा। मगर ठीक नहीं हुआ। हथियाई हुई जमीन इलाज की बलि चढ़ गई। एक दिन वह भी कंगला हो गया और आखिर एक दिन भगवान को भी प्यारा हो गया।’’

यह सब सुनकर मुझे बड़ा अफसोस हुआ। मेरे मुंह से ‘आह!’ निकल गई।

मैंने कहा, ‘‘धन-दौलत तो स्वाहा हो गए मगर दोनों परिवारों की दुश्मनी का क्या हुआ ?’’

इसपर दोनों खिलखिलाकर हंसने लगे। इस बार बड़े लड़के ने कहा, ‘‘बस यही तो फायदा हुआ। मेरे बाऊजी के मरते ही हमारी दुश्मनी हवा हो गई।’’

मैं चैंक पड़ा। बड़े लड़के की तरफ मुंह घुमाकर मैंने पूछा, ‘‘तुम्हारे बाऊ जी ? मतलब ?’’

उसने बड़ी सहजता से कहा, ‘‘मेरे बाऊजी ही इसके दुष्ट ताऊ थे, जिन्होंने मेरे छोटे ताऊ की जमीन हड़प ली थी। ये छोटा मेरा चचेरा भाई है। हम दोनांे की जमीन गई तो हमारे परिवारों की दुश्मनी भी गई। अब हम मिलकर रोजी-रोटी कमाते हैं। हम जमीन पर आ गए तो क्या हुआ, अब हम एक हैं।’’
एकता की ऐसी अद्भुत कहानी सुनकर मैं भौंचक रह गया।                         
                                         -ज्ञानदेव मुकेष                                                               
                                        न्यू पाटलिपुत्र काॅलोनी
                                         पटना-800013 (बिहार)

लेखक -ज्ञानदेव मुकेश
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