बिटर पिल
वेन इट स्नोज इन योर
नोज़
ब्रेन
में गिरती है तो ठंडक आपके दिमाग़ को जा जकड़ती है’) –ऐलन गिंज बर्ग
अपने बँगले के पहले पोर्टिको में कुणाल की गाड़ी देखते ही अपनी लांसर गेट ही पर
रोककर मैं दरबान से पूछता हूँ.
किए गये इस नये दरबान को मैं परखना चाहता हूँ, हमारे बारे में वह कितना जानता है.
हैं, सर!” दरबान अपने चेहरे की संजीदगी बनाये रखता है.
छब्बीसवें और अपने आई.ए.एस. जीवन के दूसरे वर्ष में चल रही है, किन्तु पत्नी का
आग्रह है कि घर के चाकर उसे ‘बेबी जी’ पुकारें. घर में मेमसाहब वही एक हैं.
के दूसरे गेट के सामने वाले पोर्टिको की दिशा में बढ़ा ले आता हूँ.
छोर पर गेट हैं और दोनों गेट की अगाड़ी उन्हीं की भाँति महाकाय पोर्टिको.
अपनी सेवा-निवृत्ति के बाद एक फाटक पर मैंने ताला लगवा दिया है. दोनों सरकारी
सन्तरी जो मुझे लौटा देने पड़े, और दो दरबान अब अनावश्यक भी लगते हैं.
हाथ पर मेरा निजी कमरा है जिसकी चाभी मैं अपने ही पास रखता हूँ. पहले सरकारी
फाइलों की गोपनीयता को सुरक्षित रखने का हीला रहा और अब एकान्तवास का अधियाचन है.
मुझे मेरे कमरे की चाभी के साथ उसके दरवाज़े ही पर आ पकड़ता है.
है पापा.” बेटी उसकी बगल में आ खड़ी हुई है.
हैं.” मेरे क़दम लॉबी की ओर बढ़ लेते हैं.
लेते हैं. मेरे डग लम्बे हो रहे हैं. कुणाल को अपना दामाद बनाने कामुझे कोई चाव
नहीं. उसकी अपार सम्पदा के बावजूद. किन्तु बेटी के दृढ़ संकल्प के सामने मैं असहाय
हूँ. तीन वर्ष पूर्व एम.ए. पूरा करते ही उसने अपने इस बचपन के सहपाठी के संग विवाह
करने की इच्छा प्रकट की तो मैंने शर्त रख दी थी, बेटी को पहले आई.ए.एस. में आना
होगा. और अपने को आदर्श प्रेमिका प्रमाणित करने की उसे इतनी उतावली रही कि वह अपने
पहले ही प्रयास में कामयाब हो गयी. फिरअपनी ट्रेनिंग के बाद उसने जैसे ही अपनी
पोस्टिंग इधर मेरे पास, मेरे सम्पर्क-सूत्र द्वारा, दिल्ली में पायी है, कुणाल के
संग विवाह की उसकी जल्दी हड़बड़ी में बदल गयी है. फलस्वरूप चार माह पूर्व उसकी मँगनी
करनी पड़ी है और अब अगले माह की आठवीं को उसके विवाह की तिथि निश्चित की है.
पर मैं बैठ लेता हूँ.
एक सरकरी पत्र मेरे हाथ में थमा देता है, “पापा को सेल्स टैक्स का बकाया भरने का
नोटिस आया है…..”
कनाट प्लेस में एक भव्य शॉपिंग कॉम्प्लेक्स है, दो करोड़ का.
मैं पूछता हूँ.
बेटी कहती है, “हम जानते हैं इस आदेश से छुटकारा दिलवाना आपके बायें हाथ का खेल है…..”
आई.ए.एस. के अन्तर्गत मेरे पास चुनिंदा सरकारी डेस्क रहे हैं और दो चोटी के विभाग.
फिर साहित्य और खेलकूद के नाम पर खोले गये कई मनोरंजन क्लबों का मैं आज भी सदस्य
हूँ और मेरे परिचय का क्षेत्र विस्तृत है.
कुणाल का काग़ज़ मैं तहाने लगाता हूँ.
उठता है.
एक तारीख को एक जगह ख़ाली हो रही है, उस जगह पर उसकी आँख है. मेरी तरह.
साथ आये थे और हमें कैडर भी एक ही मिला था और उसकी तरह मैंने भी अपनी नौकरी की एक-तिहाई
अवधि इधर दिल्ली ही में बितायी है.
जगह कौन भर रहा है?” वह पूछता है.
लेता हूँ, “उस पर तुम्हारा ही नाम लिखा है…..”
केन्द्रीय मन्त्री के समधी आ रहे हैं….. आज लैटर भी जारी हो गया है…..”
कोई प्रयास नहीं करना पड़ा है.
संक्षोभ को छिपाना मैं बखूबी जानता हूँ.
बाहर छोड़कर बेटी मेरे पास आ खड़ी हुई है.
मेरे मोबाइल बन्द करने पर वह कहती है, “आप अपनी सहानुभूति उसे दें न दें…..”
अपने कन्धे उचकाता हूँ, “मैं अपने कमरे में चलूँगा. मुझे कुछ फ़ोन करने हैं……”
को फ़ोन क्यों करते हैं?” अपनी खीझ प्रकट करने में बेटी आगा-पीछा नहीं करती, तुरन्त
व्यक्त कर देती है, “यह कमीशन, वह कमीशन, क्यों? यह ट्रिब्यूनल, वह ट्रिब्यूनल,
क्यों? यह बोर्ड, वह बोर्ड, क्यों? यह कमिटी, वह कमिटी, क्यों? क्यों कुछ और
हथियाना चाहते हैं, जब आपके पास घर में तमाम वेबसाइट हैं, ढेरों-ढेर म्यूजिक हैं,
अनेक किताबें हैं…..”
हो? तो किससे माँगू?”
पिलाने की ख़ातिर मैं अपनी सत्ताइस साल की नौकरी छोड़ दूँ? जिसके बूते आज मैं अपनी
बेटी की शादी का सारा गहना-पाती ख़रीद रही हूँ…..!” पत्नी अपने कमरे से बाहर निकल
आयी है. पेशे से वह डॉक्टर है, लेकिन मरहम-पट्टी से ज़्यादा दवा पिलाने में विश्वास
रखती है. दवा भी कड़वी से कड़वी. मेरे तीनों भाई उसकी पीठ पीछे उसे ‘बिटर पिल’ के
नाम से पुकारते हैं.
बूते नौ करोड़ के इस बँगले में एक महारानी का जीवन बिताती हो, उसके लिए तुम्हें एक
कप कॉफ़ी बनाना भी बोझ मालूम देता है……” मैं भी बिफ़रता हूँ.
रखना चाहिए, पपा सभी मैरिज इवेंट्स का ख़र्चा उठा रहे हैं.”
शान्त देखना चाहती है. अपने भले की ख़ातिर.
मैं उखड़ लेता हूँ, “कितना कहा, कम-से-कम लेडीज संगीत ही घर पर रख लो मगर नहीं…..
सब अशोक होटल ही में रखना है……”
मेरा हाथ चूम लेती है, “बैंक में आपके पास बेहिसाब रूपया है. अपनी इकलौती के लिए इतना
नहीं कर सकते?”
है. वर्तमानकाल में मेरी गर्लफ्रेंड. मेरी‘लैस’ (प्रेयसी). मेरी अन्तरंग मित्र.
मेरी इष्टतम विश्वासपात्र. जिसेमैं अपने सभी भेद सौंप सकता हूँ. सौंप चुका हूँ.
अपने इकतालीसवें वर्ष में भी जो खूब बाँकी-तिरछी है और कन्यासुलभ अरुणिमा लिये है.
कमरे की ओर बढ़ लेता हूँ.
डिस्ट्रैस्ड? (विपदाग्रस्त?)”
कमरे तक पहुँच लिया हूँ और खटकेदार उसका ताला बन्द करके आश्वस्तहो लेता हूँ.
एक सेशन चाहिए. आज ही, अभी ही…..”
मैं देहली से बाहर हूँ, तीसरे दिन लौटूँगी…..”
खो रहा हूँ.
बताया था यहाँ मेरी ननद शादी कर रही है…..”
तुम्हें याद है न, बंगलौर से दिल्ली तुम्हें रेलगाड़ी से नहीं, प्लेन से आना है. कल,
इसी रविवार को. मेरे एक्सपेंस अकाउंट पर…..”
सर! मेरी रेल टिकट सबके साथ ख़रीदी गयी है. मेरे बच्चे क्या करेंगे? मैं मंगलवार ही
को पहुँचूँगी.”
हूँ.
आ बैठता हूँ. अपने दवा के डिब्बे के साथ. अपनी दवा मुँह मेंरखता हूँ और डिब्बा बगल
वाली मेज पर ला टिकाता हूँ.
दोलन कुर्सी मैं झुलाता हूँ.
प्रेयसी का नाम रहा. उसके कम्युनिस्ट पिता की देन.
दोहराता हूँ, “बलवती…..”
धज्जी मेरे मन के पार्श्व घाट से निकलकर मेरे समीप चली आती है.
बलवती कहती है, “फिर से असमान लोगों की अधीनता स्वीकारोगे? मार्क्स ने क्या कहा
था? हमें समाज समझना नहीं है, बदलना है…..”
करूँ?” मैं रो पड़ता हूँ, “मेरे सिद्धान्त आज भी उतने ही अनिश्चित हैं….. समाज
में परिवर्तन चाहता भी हूँ और नहीं भी……”
घेर लेती है और मैं निर्जीव ही देखता हूँ, मेरे चारों ओर दीवारें ही दीवारें हैं!
हैं?” मैं चीख़ उठता हूँ.
ने मुझे जीते-जी दीवार में चिनवा दिया है?
बजता है.
लग गयी है, आइए…..” बेटी का फ़ोन है.
है?” मैं चिल्लाता हूँ.
हैं,पपा?” बेटी की आवाज़ काँप रही है.
ग़ायब हो चुके हैं,” मैं रो पड़ता हूँ, “न लॉबीवाला दरवाज़ा यहाँ है, न पोर्टिकोवाला
और न ही बाथरूमवाला…..”
कीजिए. दरवाज़ा अपने आप आपके सामने आ खड़ा होगा……”
करता हूँ, लेकिन उठ नहीं पा रहा.
दौड़ाता हूँ.
हैं.
ही दीवारें हैं.
अभी भी रुक नहीं रही, “मेरे दरवाज़े कोई चुरा ले गया है….. अब मैं क्या करूँगा?
मेरा क्या होगा?”
लाओ.” मेरा मोबाइल पत्नी की आवाज़ पकड़ता है, “उससे दरवाज़ा खुलवातेहैं-”
लेती हूँ…..” पत्नी कहती है, “कहीं फालिज़ ही न हो…..”
अस्पतालमैंकब और कैसे पहुँचाया गया हूँ. लेकिन डिफेंसिव मेडिसिन के अन्तर्गत किये
जा रहे मेरे सभी टेस्ट्स की रिपोर्ट्स सही आ रही हैं. कहीं भी किसी भी रोग अथवा
विकार का उनमें कोई लक्षण नहीं मिल रहा.
अस्पताल छोड़ देने की ज़िद पकड़ लेता हूँ.
वह बोल उठती है, “आप मनोविच्छेद की स्थिति से गुज़र रहे हैं, सर! आपका मस्तिष्क बँट रहा है. अपनी विचारणा और अपनी भाव-प्रवणता आप
पास-पास नहीं रख पा रहे! बेटी का विवाह उस व्यवसायी से करना भी चाहते हैं और नहीं
भी. पत्नी की पसन्द-नापसन्द को अपने से अलग रखना भी चाहते हैं और नहीं भी. अपने
समय को नयी उपजीविका से भरना भी चाहते हैं और नहीं भी.अपनी पहली प्रेयसी की
आत्महत्या के लिए स्वयं को उत्तरदायी मानना भी चाहते हैं और नहीं भी……”
दीपक शर्मा
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