देवरानी मेरी दादी के कान में फुसफुसाई, “तुम्हारी बहू अब कस्बापुर वापस न आएगी.”
पीठ पर धौल जमाया, “आएगी क्यों नहीं?”
हफ़्तों से ऊपर हो चले थे. मौसी की बीमारी ने जब मौसी को बस्तीपुर से लखनऊ के
अस्पताल जा पहुँचाया था तो मौसा माँ को अपने संग लखनऊलिवा ले गए थे और जब लखनऊ में
चौथे रोज़ मौसी ख़त्म हुई थीं तो मौसा माँ को लखनऊ से सीधे बस्तीपुर ले गए थे, यहाँ
वापस न लाए थे.
में उसकी जगह लेगी,” मौसी की देवरानी गिलबिलाई, “मेरेजेठने उसके बाप के संग अपनी
गुटबंदी मुकम्मिल कर ली है. दस हजाररूपया उसके हाथ में पकड़ाया है और उसकी लड़की
उससे ख़रीदली है.”
नचाए, “ब्याह के बाद औरत अपनी ससुराल की जायदाद बन जाती है. अपने बाप की मिल्कियत
नहीं रहती. उसे वह लाख बेच ले, मगर वह हमारी चीज़ है, हमारी रहेगी.”
नया ज़माना है. तलाक के लिए सरकारने नई अदालतें खोल दी हैं. उनमें से किसी एक कमरे
में मेरे जेठ उसे ले जाएँगे, उसके नाम से तलाक का मुक़दमा दायर करवाएँगे और उस पर लगा
आपका ठप्पा छुड़ा लेंगे.”
दादा और मेरे पिता के घर लौटने पर मेरी दादी ने जब बात छेड़ी तो मेरे पिता लाल-पीले
होने लगे, “एक बार वह मेरे हाथ लगजाए अब. फिरमैं उसे नहीं छोडूँगा. ऐसी गर्दन मरोडूँगा कि उसकी टैं बोलजाएगी.”
मेरे दादा अपना मुँह मेरे पिता के पास ले गए, “उसे यहाँ किसी तरह फुसलाकर वापस ले आएँगे और फिर किसी
रात गाड़ी के नीचे सरकाकर कटवा देंगे…..”
में तारबाबू रहे और हम रेलवे स्टेशन के एक कोने में बने क्वार्टरों में रहते थे.
कस्बापुर में रेलवे जंक्शन बड़ा था और वहाँ एक साथ कई-कई गाड़ियाँ देर रात में रुका
करतीं.
हमें सौंपिए,” दादी ने मुझे अपनी गोद में दबोच लिया, “दादी और पोता एक साथ
बस्तीपुर जाएँगे और उसे अपने संग लिपटाकर यहाँ लिवालाएँगे.”
आठ बजे दादी ने मेरे साथ हावड़ा मेल पकड़ी और ग्यारहबजकर बीस मिनट पर हम बस्तीपुर
स्टेशन पहुँच गए.
पहुँचने में हमें आधा घण्टा और लग गया. रिक्शा तो
दूर की बात थी, दादी तो ताँगे पर भी कम ही
बैठतीं. खुद भी खूब पैदल चलतीं और दूसरों को भी खूब पैदल चलातीं. दादी के साथ
आने-जाने में इसीलिए माँ और मैं बहुत कतराते.
देखकर मौसा ने अपने हाथ का काम रोक लिया.
करते थे और उनका आरा उनके घर की ड्योढ़ी मेंही लगा था.
दादी मुक़ाबले पर उतर आईं.
उठाई,” मौसा ने न जाने कैसे अपनी आवाज़ में शहद घोल लिया, नहीं तो मौसा मीठी ज़ुबान न
रखते थे, ख़ास कर मौसी के संग तो वे जब भी ज़ुबान खोलते रहे कड़ुवा ही बोलते, “इधर
लड़कियों का मामला है. आप तो जानती हैं, थोड़ी-सी बेपरवाही हो गई तो उम्र-भर के लिए…..”
मैं माँ को देखना चाहता था, जल्दी-बहुत जल्दी.
मौसा के घर से मैं अच्छी तरह वाक़िफ़ था, माँ मुझे अक्सरयहाँ लाती रही थीं. ड्योढ़ी
पार करते ही एक छोटा बरामदा पड़ता था. बरामदे का एक दरवाज़ा पंखे वाले कमरे में
खुलता था और दूसरा भंडार में. रसोई भंडार केआगे पड़ती थी और पाखाना ऊपर छत पर था.
साथ माँ भंडार में बैठी थीं.
में नेल पॉलिश थी और छोटी लड़की के हाथ में माँ काएक पैर. माँ का दूसरा पैर और उन
दोनों लड़कियों के पैर गुलाबी नेल पॉलिश से चमक रहे थे.
पैर अपनी साड़ी में छुपा लिया.
थीं, निखरी-निखरी और सँवरी-सँवरी. माँ का चेहरा भी पहले से बहुत बदल गया था. माँ
की आँखें पहले से छोटी लग रही थीं और गालपहले से बहुत ऊँची और चर्बीदार. माँ की पुरानी
ठुड्डी के नीचे एक दूसरी नई ठुड्डीउग रही थी.
को बरामदे से आवाज़ दी, “दौड़करहलवाई से गरम जलेबी तो पकड़ ला. जब तक पार्वती चाय बना
लेगी.”
रानी,” माँ से अपने चरण स्पर्श करा रही दादी अपने पुरानेमिजाज में बहकने लगीं,
“होश मत खो. चल, अब बहुत हो गया. अब घर चल. तेरे बिना वहाँ पूरा घर हाल-बेहाल हुआ
जाता है.”
मैंने माँ की तरफ़ देखा.
पाखाने के लिए माँ की मदद लेने का मुझे अभ्यास था.
लगीं.
क्या?” छत का एकांत पाते ही माँ अधीर हो उठीं.
जाना,” मैंने कहा, “वे लोग तुम्हें रात को गाड़ी के नीचे सरका कर कटवा देंगे.”
रहे और दादी, दादा और मेरे पिता ‘वे लोग’.
माँहँसने लगीं.
साथ नहीं जाऊँगी.”
मैंने कहा, “तुम्हारे पास यहाँ रहूँगा.”
मेरे लिए बहुत मुश्किल था. माँ की सारी दौड़-भाग अबमेरे ऊपर आन पड़ी थी और मुझे एक पल
का चैन न था. चूँकि मेरे पिता घर की बगल में बनी पुलिस चौकी में दारोगा रहे, सो घर
में उनकी आवाजाही बराबर लगी रहती. कभीवे अपनी पान की डिबिया भरवाने आते तो कभी
चाय-नाश्ता लेने और कई बार तो वे यों हीबेमतलब घंटे, दो घंटे सुस्ताने के लिए ही
चले आते. हर बार अब मुझी को दौड़ कर उनका सामना करना पड़ता. उनकीचीज़ें उन्हें सौंपते
समय या उनके जूते खोलते या पहनाते समय उनकी बदमिजाजी का स्वाद चखना पड़ता. भाजी
बनने से दादी बड़ी होशियारी से हर बार बच निकलतीं. कभी रसोई में जा छिपतींतो कभी
पड़ोसिन के घर शरण ढूँढ लेतीं.
ज़रूर बुलाऊँगी,” माँ ने मेरा हाथ झुलाया, “मगर अभी नहीं. बाद में.”
रेलगाड़ी से नीचे गिरा दिया.
हाथ दोबारा झुलाना चाहा, “मैं रोज़ तेरी ख़ैर मनाऊँगी.”
खींच लिया, “मैं नहीं घबराता.”
बैठे चाय पी रहे थे.
रहीं. मठरी माँ के हाथ की बनाई लग रही थीं. माँ मठरीबहुत अच्छी बनाती थीं.
मेरी तरफ़ जलेबी बढ़ाई. कुंती मेरे साथ मेल का बर्ताव करती थी, पारबती नहीं.
मुँह फुला लेती थी. मुझे तब भी शक था, पारबती माँ को पसंद न करती थी. मेरा शक बाद
में यक़ीनमेंतब्दीलभीहुआ.
मैं दादी के पास जा खड़ा हुआ, “मैं अब घर जाऊँगा.”
दादी ने एक जलेबी मुँह में रख ली- “विमला रानी के साथ चलेंगे. विमला रानी क्या अभी छत पर ही है?”
“मैं यहाँ हूँ.”
मौसाअब तुनक लिए, “इन लड़कियों को मैं अकेले न सँभाल पाऊँगा.”
झकझोरा, “उठो, घर चलो.”
ले,” माँ ने मठरी का एक टुकड़ा मेरे मुँह की तरफ़ बढ़ाया, “तुझे तो मठरी पसंद थी.
नहीं?”
मैंने अपने हाथ से निवाला कभी न तोड़ा था.
कुछ न खाऊँगा. मैं घर जाऊँगा.”
त्यौरी दिखाई, “कस्बापुर के लिए हमारी गाड़ी तीन बजे से पहले नहीं जाएगी. तब तक हम
कैसे जा सकते हैं?”
समय दादी पाखाने के लिए छत पर रहीं और मौसा अपने आरे पर, माँ मुझे अपनी गोदी में
उठाकर भंडार में ले गईं.
कमरे में सोई रहीं.
चढ़ाकर माँ ने अपनी साड़ी के पल्लू में बँधी चाबियों का
गुच्छा एक बक्से की तरफ़ तेज़ी से बढ़ाया और पलक झपकते ही एक बुकची से एक थैलीनिकाली.
के सिक्के रहे.
खाली कर दी और रुमाल बाँधकर मेरी जेब में टिका दिया, “कोई पूछे तो कहना मठरी है.”
से निकाल कर बाहर फेंक दिया, “मैं न लूँगा.”
मेरी गाल चूम ली.
“मौसा तुम्हें मारेंगे. बहुत मारेंगे.”
गायब करने की बुरी आदत रही. पकड़े जाने पर माँ माफ़ी माँगने लगतीं मगर मेरे पिता
उन्हें जमकर पीटते, कभी अपने जूतों से तो कभी पुलिस रूल से.
नरम दिल हैं,” माँ थोड़ा लजा गईं, “मुझ पर कभी नहीं बिगड़ सकते. मुझ पर कभी न
बिगड़ेंगे. तुम ख़ामोशी से इसे अपने साथ ले जाओ.”
अपनी जेब के साथ चिपका लिया, “मैंकुछ न लूँगा.”
देखकर मेरे दादा और मेरे पिता जैसे ही दादी पर खीझने को हुए, दादी ने हँसकर माँ के
हाथों तैयार किया हुआ रुमाल अपने झोले से निकाल लिया.
चेहरे पर रौनक खेल गई.
मिलकर डेढ़ तोला तो होगी ही,” दादी उनके संग-संग गहने जोखने लगीं, “और चाँदी की यह
पाजेब और चूड़ियाँ आठ तोले की समझ लो….. फिरये सात सिक्के हैं.”
लगे, “बाज़ार में इनका क्या दाम मिलता है?”
दादी ने कहा, “चोट्टी ने यह सामान अपने घर वालों से छिपाकर दिया है. इसे बेचोगे तो
वह आराकश इसे सुनार से बरामद करा लेगा.”
इनकी बरामदी न कराएगा?”
गहने और सिक्के ज्यों के त्यों टिका दिए, “इन्हेंठिकाने लगाना मैं जानता हूँ.”
ने अपनी आवाज़ धीमी कर ली, “रुमाल मेरे हाथ में पकड़ाते हुए चोट्टी ने कहा क्या-
बोली- बहन के घर का सारा कीमती सामान आपके हवाले कर रही हूँ. सिर्फ़ लड़के के
वास्ते. तलाक के वक़्त लड़का मुझे मिल जाना चाहिए.”
भर आई कहीं?” दादा हँसने लगे, “नकारने पर कचहरी तो न जाना पड़ेगा?”
दीं, “सोचा जाए तो तलाक में हमारा क्या नुकसान है? उस छिनाल को यहाँ लाने से अब कोई
लाभ नहीं. उधर तलाक होगा तो इधर हम घर में नया बैंड बाजा लाएँगे. नए सिरे से लड़के
की गृहस्थी जमा देंगे.”
ही लें,” मेरे पिता भी तरंग में बह लिए, “घर में एक फ़ालतू कमरा तो होना ही चाहिए.”
पिछले बरामदों को घेरकर कमरों की शक़्ल दे रखी थी. बल्कि
माँ जब तक घर में रही थीं बरामदे को घेरने की ज़िद लगाए रही थीं.
ठिकाने लगाया जाए,” मेरे दादा ने रुमाल की तरफ़ इशारा किया, “इसे घर में रखना ख़तरे
से ख़ाली नहीं.”
इंदुबाला के पास छोड़ आओ. आज उसकी नाइट ड्यूटी है.”
ने हामी भरी- इंदुबाला मेरी पाँचों बुआ लोगों में सबसे अच्छी रहीं; वे यहीं
कस्बापुर के सरकारी अस्पताल में नर्स थीं और अपने परिवार में उनका अच्छा दबदबा था,
“इंदुबाला दीदी यों भी समझदार हैं. वह इन्हें ठिकाने लगाएँगी तो खरीदने वाले सुनार
को भी शक़ न होगा.”
नज़ारा मेरे सामने आया.
माँ पर चिल्ला रहे थे. माँ अपने दाँत निपोड़ रही थीं,
अपने कान खींच रही थीं, अपनी नाक रगड़ रही थीं, अपने हाथ जोड़ रही थीं, मगर हुलस रही
पारबती माँ को ड्योढ़ी की तरफ़ घसीट ले गई थी. मौसा ने माँ को ड्योढ़ी की पैड़ी पर शहतीर
की जगह लिटा दिया था और माँ के पहले हाथ काटे थे, फिर कान, फिर पैर और….. और फिर
गर्दन…..
तेज़ दस्तक ने खोली.
सामान उठाने आए थे- माँ के साथ.
के पास है,” दादी के नकारने से पहले ही मैंने
उगल दिया.
जंक्शन की गाड़ियों से तो बचाया जासकता था मगर मौसा के बस्तीपुर वाले आरे से नहीं.
मौसा हमारे पास न लौटे. सीधे बस्तीपुर चले गए.
ज़्यादा दुबकी और सिकुड़ी.
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