इश्क के रंग हज़ार -उलझते सुलझते रिश्तों पर सशक्त कहानियाँ

इश्क के रंग हज़ार -उलझते सुलझते रिश्तों पर सशक्त कहानियाँ

जीवन में खुश रहने के लिए मूलभूत आवश्यकताओं  ( रोटी कपड़ा और मकान ) के बाद हमारे जीवन में सबसे ज्यादा जरूरी  क्या है ? उत्तर है रिश्ते |  आज जब हर इंसान पैसे और सफलता के पीछे भाग रहा है तो ख़ुशी के ऊपर किये गए एक अमेरिकन सर्वे की रिपोर्ट  चौकाने वाली थी | सर्वे करने वाले ग्रुप को विश्वास था कि जो लोग अपनी जिन्दगी में बहुत सफल हैं या जिन्होंने बहुत पैसे कमाए होंगे वो ज्यादा खुश होने परन्तु परिणाम आशा के विपरीत निकले | वो लोग अपनी जिन्दगी में ज्यादा खुश थे जिनके रिश्ते अच्छे चल रहे थे भले ही उनके पास कम पैसे हो या सफलता उनकी तयशुदा मंजिल से बहुत पहले किसी पगडण्डी पर अटकी रह गयी हो | भले ही सफलता के  के नए गुरु कहते हों कि जिन्दगी एक रेस है …दौड़ों और ये सब पढ़ सुन कर हम बेसाख्ता दौड़ने लगे हों पर जिन्दगी एक बेलगाम दौड़ नहीं है | ये अगर कोई दौड़ है भी तो नींबू दौड़ है | याद है बचपन के वो दिन जब हम एक चम्मच में नीबू रखकर चम्मच को मुँह में दबा कर दौड़ते थे | अगर सबसे पहले लाल फीते तक पहुँच भी गए और नींबू चम्मच से गिर  गया तो भी हार ही होती थी | सफलता की दौड़ में ये नीम्बू हमारे रिश्ते हैं जिन्हें हर हाल में सँभालते हुए दौड़ना है | लेकिन तेज दौड़ते हुए इतना ध्यान कहाँ रह जाता है इसलिए आज हर कोई दौड़ने के खेल में हार रहा है | निराशा , अवसाद से घिर है | समाज में ऐसे नकारात्मक बदलाव क्यों हो रहे हैं ? , रिश्तों के समीकरण  क्यों बदल रहे हैं ? गाँव की पगडण्डीयाँ चौड़ी सड़कों में बदल गयी पर दिल संकुचित होते चले गए | क्या सारा दोष युवा पीढ़ी का है या बुजुर्गों की भी कुछ गलती है ? बहुत सारे  सवाल हैं और इन सारे सवालों के  प्रति सोचने पर विवश करने और समाधान खोजने के लिए प्रेरित करने  के लिए ‘रीता गुप्ता ‘ जी ले कर आयीं हैं “इश्क के रंग हज़ार “

लेखिका-रीता गुप्ता

इश्क के रंग हज़ार -उलझते सुलझते रिश्तों पर सशक्त कहानियाँ 

” इश्क के रंग हज़ार ‘ नाम पढ़ते ही पाठक को लगेगा कि इस संग्रह में प्रेम कहानियाँ होंगी | परन्तु आशा के विपरीत इस संग्रह की कहानियाँ  रिश्तों के ऊपर बहुत ही गंभीरता से अपनी बात करती हैं | पाठक कहीं भावुक होता है , कहीं उद्द्वेलित होता है तो कहीं निराश भी वहीँ कुछ कहानियों में रिश्तों की सुवास उसके मन वीणा के तार फिर से झंकृत कर देती हैं | कहानी संग्रह का नाम क्या हो ये लेखक का निजी फैसला है | ज्यादातर लेखक किसी एक कहानी के नाम पर ही शीर्षक रखते हैं | शीर्षक के नाम वाली कहानी बहुत मिठास का अहसास देती हैं पर जिस तरह से गंभीर कहानियाँ अंदर के पन्नों पर पढने को मिलती हैं तो मैं कहीं न कहीं ये सोचने पर विवश हो जाती हूँ कि संग्रह का शीर्षक कुछ और होता तो रिश्तों की उधेड़बुन से जूझते हर वर्ग के पाठकों को  ज्यादा आकर्षित कर  पाता | वैसे इस संग्रह की ज्यादातर कहानियाँ विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं  , फिर भी जिन्होंने नाम के कारण इस संग्रह पर ध्यान नहीं दिया है उनसे गुजारिश है कि इसे पढ़ें और फिर अपनी राय कायम करें |

सबसे पहले मैं बात करना  चाहूँगी कहानी ‘आवारागर्दियों का सफ़र ‘की | ये कहानी ‘इद्र्प्रस्थ भारती’ में प्रकाशित हुई  थी | ये कहानी है 17 -18 साल के किशोर  अनु की , जो  ट्रक में खलासी का काम करता है | काम के कारण अनु को अलग -अलग  शहर में जाना पड़ता है | पिछले कई वर्षों में वो झारखंड व् आसपास के कई राज्यों में  जा चुका  है | हर जगह उसकी कोशिश यही होती है कि  उस शहर में रेलवे स्टेशन जरूर हो |  हर रेलवे स्टेशन के पास ही वो अपना डेरा बनाता है ताकि उसे खोजने में आसानी हो  | आप सोच रहे होंगे कि आखिर अनु क्या खोज रहा है ? इस खोज के पीछे एक बहुत दर्द भरी दास्ताँ है | नन्हा अनु अपने माता -पिता के साथ किसी रेलवे स्टेशन के पास ही रहता था , जब वो पिता की ऊँगली छुड़ा कर रेलगाड़ी में घुस गया था | उसके लिए महज एक खेल था , एक छोटी सी शरारत ….पर यही खेल उसके जीवन की सबसे कड़वी  सच्चाई बन गया | आज उसे कुछ भी याद नहीं है …याद है तो पिता की धुंधली सी आकृति , तुलसी  के चौरे पर घूंघट ओढ़े दिया जलाती माँ और स्टेशन के पास एक दो कमरों का एक छोटा सा मकान जिसकी दीवारे बाहर से नीली और अंदर से पीली पुती हुई थी पर दरवाजा सफ़ेद और पीछे कुएं के पास लगे आम और अमरुद के पेड़ | हर स्टेशन के आस -पास यही तो ढूँढता है वो …और हर बार बढती जातीं है उसके साथ पाठक की बेचैनियाँ | अब उसकी तलाश पूरी होती है या नहीं ये तो आपको कहानी पढ़ कर पता चलेगा पर अनु की बेचैनी को उजागर करती ये पंक्तियाँ अभी आप को भी बेचैन होने को विवश कर देंगी |

“पक्षियों के झुण्ड दिन भर की आवारागर्दियों के बाद लौट रहे थे | अनु को उनके उड़ने में एक हडबडी , एक आतुरता महसूस हो रही थी | “घर ” वहाँ  इन सब का जरूर कोई ना कोई घर कोई ठिकाना होगा , वहाँ  कोई होगा जो इनका इंतजार कर रहा होगा | ‘परिवार ‘इन पंक्षियों का भी होता होगा क्या ? होता ही होगा , दुनिया में हर किसी का एक परिवार अवश्य ही होता है , सिवाय उसके , और अनु की आँखों से कुछ खारा पानी आज़ाद हो गया उसी क्षण |

‘ बाबा ब्लैक शीप ‘इस संग्रह की मेरी सबसे पसंदीदा कहानी है | ये कहानी दो पीढ़ियों के टकराव पर है | कहानी की शुरुआत अंकल सरीन की मृत्यु की खबर से होती  है , जिसे कभी उनके  पड़ोसी रहे व्यक्ति का बेटा पढता है | खबर में मीडिया ने अमेरिका में बसे बेटे पर ऊँगली  उठाई है कि  उसने अपने पिता की मृत्यु की खबर वाला फोन भी नहीं उठाया | पूरा मीडिया बेटे को कोस रहा है | ऐसे में उसके सामने उसके दोस्त रहे समर्थ का बचपन घूम जाता है |  समर्थ,  जिसे फूलों से तितलियों से प्यार है | जो कवितायें लिखता है , चित्र बनाता है | जीवन के कितने रंग उसके ब्रश से निकल कर पन्नों -पन्नों में बिखर जाना चाहते हैं | पर ये उच्च पदाधिकारी सरीन अंकल को नहीं भाता | उनकी आँखों में सपने हैं बड़ी नौकरी , बड़ी सैलिरी के | यहीं से शुरू होती है समर्थ के मशीनीकरण की प्रक्रिया | जहाँ घर में रिश्ते -नातों , टी वी त्यौहार , हंसी मजाक सब पर धारा 144 लग जाती है | ये कहानी एक बहुत बड़ा सवाल उठती है कि सफलता के लिए हम बच्चों पर दवाब डालते हैं कि वो सारे इमोशंस मार कर केवल पढाई करें , फिर वृद्ध होने पर मशीन हुए बच्चों से हम भावनाओं की उम्मीद करते हैं | यहाँ पर ठहर कर हमें सोचना होगा , विचारना होगा कि आखिर उन्हें मशीन बनाया किसने ?

” आशा साहनी के बहाने’  कहानी वागार्थ में प्रकशित हुई थी | मुंबई की आशा सहानी के बारे में तो सभी जानते हैं | आशा सहानी वहीँ महिला हैं जिनका बेटा विदेश में रहता था |   अपने घर में एकांत झेलती हुई महिला की कब मृत्यु हो गयी किसी को पता नहीं चला | जब घर का दरवाजा खोला गया तो महिला कंकाल मिला | ये खबर बुजुर्गों के प्रति बच्चों की संवेदनहीनता को दिखाती है | कहानी का ताना बाना  आशा सहानी के घर के बगल में रहने वाली एक महिला के आधार पर बुना गया है | ये महिला भी अकेली है और इसका बेटा भी विदेश में रहता है | इसमें और आशा सहानी में बस इतना फर्क है कि इस महिला के एक बेटी भी है जो भारत में ही रहती हैं | फिर भी ये महिला अकेली ही रहती है | अतीत की धुंध को साफ़ करने पर पता चलता है कि इस महिला ने अपनी बेटी के ऊपर हमेशा से बेटे को वरीयता दी थी | पुत्र प्रेम में बौराई  माँ ने अपनी पुत्री से लगभग नाता ही तोड़ लिया था |बरसों से दोनों के बीच संवाद भी बंद था | पर  बेटे के द्वारा ठुकराए जाने पर उसका अहंकार उसे बेटी से मदद माँगने  को रोक रहा था | ये कहानी उन वजहों की तलाश करती है कि क्या आशा सहानी जैसे हश्र पर पहुँचने के लिए सिर्फ नयी पीढ़ी ही जिम्मेदार है या पुरानी  पीढ़ी से भी कुछ चूक हो गयी | रिश्ते संभालना और सहेजना एक जिम्मेदारी का काम है किसी को काला और किसी को सफ़ेद कह देना आसान है पर जिन्दगी असल में ग्रे शेड है | जहाँ हर कहानी में कुछ काला है और कुछ सफ़ेद |

“हम तुम कुछ और बनेगे ” कहानी एक पुरुष के मानसिक अंतर्द्वंद पर आधारित है | कहानी है एक ऐसे जोड़े की जिसकी कोई संतान नहीं हैं |  जाहिर है वो इसके लिए डॉक्टर को दिखाते है | डॉक्टर पुरुष में कमी बताता है | दोनों आई वी ऍफ़ की मदद लेने को तैयार हो जाते हैं | जिस अस्पताल में पत्नी का इलाज होता है उसी में पति का छोटा भाई डॉक्टर है | ये कहानी दो स्तरों पर द्वन्द उत्पन्न करती है | एक तो भावी बच्चे की दादी का आई वी ऍफ़ के जरिये हुए बच्चे के खून, संस्कार पर संदेह तो दूसरा पति के मन में यह वहम आ जाना की कि कहीं ये स्पर्म उसके अपने छोटे भाई के तो नहीं हैं | ऐसा दिमाग में आते ही उसे होने वाले बच्चे से वितृष्णा होने लगती है | धीरे -धीरे उसका व्यवहार अपनी पत्नी के प्रति भी बदलने लगता है | ऐसे में गर्भवती पत्नी की देखभाल के लिए छोटे भाई को आना ही पड़ता है | जिससे उसका शक और गहराता है | आज  जब आई वी ऍफ़ मेथड के द्वारा बच्चे की नानी , मौसी या परनानी भी बच्चे को जन्म दे रहीं है ऐसे में ये प्रश्न उठाना स्वाभाविक है क्यों पुरुष ये स्वीकार नहीं कर पाता कि उसी के परिवार के किसी अन्य व्यक्ति का स्पर्म लिया जाए ? जबकि ये पूरी तरह से वैज्ञानिक प्रक्रिया है | हालांकि कहानी शक और सुलह के बीच चलती है | पर जो सवाल पितृसत्ता के लिए छोड़ जाती है वो अभी भी बना हुआ है | जरा देखें …

” वह देखता जब रोहन आता तो वो काजल की कुछ ज्यादा ही देखभाल करता | ये बात रमण को अब चुभने लगी थी | शक का बुलबुला मानस में आकार पाने लगा था | 
“कि कहीं ये वीर्य दान रोहन ने ही तो नहीं किया है “
हालांकि उसके पास इस बात का कोई सबूत नहीं था पर जब कमी खुद में होती है तो शायद ऐसे विचार उठने लाजिमी हैं ” 

एक छोटी सी कहानी ‘चौबे गए छब्बे बनने’ स्त्री प्रताड़ना के विरुद्ध आवाज़ उठाने की कहानी है | जहाँ ट्रेन में अपनी पत्नी को प्रताड़ित करने वाले पति के विरुद्ध जब एक आवाज़ उठती है तो पत्नी ही उसे यह कह कर रोक देती है कि ” मेरा पति हैं चाहें मारे या पीटे  आपको क्या दिक्कत है ?” ये हमारे समाज की सच्चाई है | जिससे हम अक्सर रूबरू होते रहते हैं |’इश्क के रंग हज़ार’ एक सॉफ्ट सी कहानी है |  कई बार किसी का हमारे साथ होने का अह्सास भी हमारे जीवन के सफ़ेद बेजान से कैनवास पर खिलखिलाते  रंगों की सुंदर चित्रकारी कर देता है | साहित्य अमृत में प्रकाशित कहानी ‘शिद्दते अहसास ‘ एक ऐसी माँ की कहानी है जिसने अपने युवा एकलौते पुत्र को एक दुर्घटना में खो दिया है | माता -पिता दोनों की हालत परकटे पक्षी की तरह है | दोनों पुत्र वियोग में तड़प रहे हैं | एक बार माँ अपने को खत्म करने की कोशिश भी करती है पर बच जाती है …वहीँ से उसके मन में एक विश्वास आ जाता है कि उसका बेटा उसके पास जरूर लौटेगा | कहते हैं विश्वास में बहुत शक्ति होती है | तो क्या उस माँ का विश्वास जीतेगा या जिन्दगी यूँ ही हाथ से फिसल जायेगी ?

“थोड़ी सी जमीन सारा आसमान “हिन्दू मुस्लिम विवाह पर आधारित है | ऐसा विवाह जिसका पूरा समाज दुश्मन बन कर खड़ा है | यहाँ तक कि दोनों बच्चों के माता -पिता भी | लेकिन तमाम अवरोधों के बावजूद विवाह होता है | क्योंकि प्रेम शरीर से नहीं आत्मा से होता है | “अमाके के खेमा करो ” कहानी  एक ऐसे वृद्ध व्यक्ति की मन :स्थिति पर आधारित है | जिसने अभी कुछ ही दिन पहले अपनी पत्नी को खोया है | अपनी पत्नी की मृत्यु के पल को याद करते हुए वृद्ध के मानसिक अंतरद्वंद से रूबरू होते हुए पाठक को ये कहानी गहरे विषाद  में छोड़कर समाप्त हो जाती है और साथ में उकेर देती है कई प्रश्न चिन्ह | ये कहानी दैनिक जागरण  में प्रकाशित हुई थी |

इसके अतरिक्त पति -पत्नी के रिश्तों पर आधारित दिल की वो रहस्यमयी पर्ते , बाजूबंद , वीणा के तार सी जिंदगी, भाई बहन के रिश्ते पर आधारित रक्षा बंधन और इंसानियत के रिश्ते पर आधारित हमसाया व  पुरसुकून की  बारिश प्रभावित करती हैं | ‘काँटों से खींच कर  ये आँचल’ कहानी अच्छी है पर एक सौतेली माँ के इस महान त्याग को समझना सबके लिए आसान नहीं है | फिर भी कुछ चरित्र एक सुखद कल्पना की तरह मन को बशुत सुकून देते हैं |

रीता जी का ये पहला कहानी संग्रह है | रीता जी उन गिनी चुनी लेखिकाओं में से एक हैं जो देर से साहित्य की दुनिया में आयीं पर आते ही  साहित्यिक/गैर साहित्यिक  पत्रिकाओं में छा गयीं | इस संग्रह की सबसे खास बात ये है कि इसकी भाषा बहुत सरल है और कहानियाँ कसी हुई | कहीं भी खींचतान कर कहानी को बड़ा करने की कोशिश नहीं की गयी है | कई बार कहानी को जबरदस्ती बड़ा करने की कोशिश में कहानी की आत्मा मर जाती है | कुछ साहित्यिक कहानियों में ऐसा देखने को मिलता है | ये कहानियाँ आधुनिक समाज में रिश्तों की बदलती परिभाषा को ही नहीं बताती बलि उन्हें निभाने के नए अंदाज भी प्रस्तुत करती हैं | इन कहानियों ने लगभग हर प्रमुख रिश्ते को उठाया है | कहानियों में रीता जी उन्हें बिलकुल नए दृष्टिकोण से देखती हैं | कई बार ये सोचने पर विवश कर देती हैं कि आज जिस तरह रिश्तों का हास हो रहा है उसमें हम एक -दूसरे पर ऊँगली उठाने के स्थान पर सोचें कि कहीं इसका कारण हम ही तो नहीं | आजकल कहानी संग्रहों में आत्मकथ्य का चलन बढ़ा है | इसमें उसकी कमी महसूस होती है | रिश्तों की पर्ते खोलते -सिलते इस कहानी संग्रह को पढने के बाद आपको कहीं उधेड़े जाने का गम होगा तो कहीं सिले  जाने का सुकून |

इश्क के रंग हज़ार – कहानी संग्रह
प्रकाशक -वनिका पब्लिकेशन
पृष्ठ -128
मूल्य – 120 रुपये (पेपर बैक )

अगर आप आज के समय में बनते बिगड़ते रिश्तों को समझना चाहते हैं तो ये संग्रह आपके लिए है |

वंदना बाजपेयी

                                     

समीक्षा -वंदना बाजपेयी

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