वरिष्ठ साहित्यकार आशा सिंह जी की लेखनी गंभीर विषय उठाती रही है । फिर चाहें उनकी बहु चर्चित पुस्तक ‘सिताबोबाई’ हो या “सिन्हा बंधु” । जेलर की डायरी के पन्ने पर आधारित उनकी शृंखला आप पहले भी अटूट बंधन में पढ़ चुके हैं । इस बार पढिए माँ और ममता के विविध प्रसंगों को सहेजती उनकी उनकी सामाजिक मार्मिक कहानी “बिटिया” ।
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वरिष्ठ साहित्यकार आशा सिंह की धरवाहिक कहानी -बिटिया भाग 1
वरिष्ठ साहित्यकार आशा सिंह की धारावाहिक कहानी बिटिया -भाग दो
वरिष्ठ साहित्यकार आशा सिंह की धारावाहिक कहानी- बिटिया भाग -3
प्रस्तुत है चौथा भाग वरिष्ठ साहित्यकार आशा सिंह की धारावाहिक कहानी बिटिया भाग -4
कहाँ अपनों के बीच पराई महसूस कर रही थी,और इनमें अपनापन महसूस हुआ,शायद रूमा नाम मुझे खींच रहा था ।डा प्रबोध ने छेड़ा-आंटीजी, आप को पता नहीं कि इनके पापा अभी तक इन्हें लिटिल बेबी समझते हैं ।घर से लेने आयेंगे,अस्पताल छोड़ने आयेंगे । पूरे बाडीगार्ड हैं ।
डा रूमा चलते चलते रुक गई-आंटी अभी तो आप का मरीज़ सो रही है,तब तक आप हमारे घर पर चल कर आराम कर लीजिए ।
मैंने ना-नुकर की,पर दोनों ने इसरार किया- आप बाहर से आई हैं,थोड़ी देर आराम करने से अच्छा लगेगा ।आप स्वस्थ रहेंगी,तभी तो मरीज़ की देख रेख कर सकेंगी ।कोई बात होगी,सिस्टर मुझे काल कर देगी।
पता नहीं किस सम्मोहन से बंधी मैं उनके साथ चल पड़ी ।
नीचे पार्किंग में नीले रंग की मर्सिडीज़ गाड़ी खड़ी थी ।डा रूमा मेरा हाथ थामे उधर बढ़ गई ।अंदर उसके पिता सफ़ेद झकाझक धोती कुर्ता और सदरी पहने बैठे थे,मुझे देख कर चौंक गए और मैं भी ।वे कार से नीचे उतर आए और सम्मान सहित मुझे अंदर बैठाया ।
डा रूमा ने मेरा परिचय कराया-पापा ये माधुरी जी हैं,जबलपुर से आज ही आयीं हैं।इनकी रिश्तेदार मेरी ही वार्ड में भर्ती हैं,मैंने कहा कि थोड़ी देर मेरे घर पर चल आराम कर लीजिए ।
पिता ने सिर हिलाकर सहमति दी।
डा प्रबोध शरारत से बोले-पापा मैं भी चलूँ ।
तुम अभी नहीं। अभी सीधे अपने घर जाओ । बुजुर्ग ने कड़क स्वर में आदेश दिया ।
डा रूमा उसे चिढ़ाते हुए हंस दी । सारे रास्ते हम ख़ामोश रहे,वैसे भी मुंबई का ट्रेफ़िक बहुत धीमा है ।
पिता बार बार चश्मा हटा आँखें पोंछ रहे थे ।
पापा आँख में कुछ गिर गया ।
नहीं बेटा,गर्मी बहुत है,पसीना आ रहा है,जबकि कार का ए सी चल रहा था ।
जुही की शानदार बहुमंज़िली इमारत के सामने कार रुकी। हम लोग लिफ़्ट से 17 लीं मंज़िल पर पहुँचे ।
शानदार फ़्लैट पर तोरण बंधा हुआ था,बीच में गणेश जी विराजमान थे।
नेम प्लेट पर लिखा था-के एल वर्मा ।
दरवाज़ा किसी घरेलू सहायिका ने खोला ।बेहद नफ़ासत से सजी बैठक।मैं चुपचाप सोफ़े पर बैठ गयी।
एक स्थूलकाय महिला पानी लेकर आई,मुझे देख कर चौक गई,पर होंठ सी लिए ।
मम्मा जल्दी से मेरे फ़्लैट की चाभी दे दीजिए। कपड़े बदल कर आती हूँ ।जल्दी से खाना लगवाइए,बड़ी भूख लगी है ।माँ को प्यार कर चाभी लेकर चली गई ।
वर्मा जी ने गला साफ़ कर कहा-ऐसा है सामने वाला फ़्लैट इनके लिए है ।शादी के बाद यहीं रहेंगे ।
जल्दी ही रूमा कपड़े बदल कर आ गयी।वर्मा ने कहा अब ये पूजा करेगी।चलिए आप भी शामिल हो जाइए ।
भगवान को धन्यवाद देती हूँ कि इतने अच्छे मम्मी पापा दिये ।
अच्युतं केशवं रामनारायणं ,कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिं।
आरती संपन्न हुई ।सबको मिश्री की डली प्रसाद में मिली ।
खाने की टेबल पर शुद्ध भारतीय भोजन भिंडी और कटहल की सब्ज़ी,दाल चावल ।सहायिका गरम फुल्के दे रही थी। मालिकीन बोलीं – हमें पता नहीं था कि आप आयेंगी,कुछ अच्छा बनाती ।
नहीं खाना बहुत स्वादिष्ट है ।
हाँ आंटी,मेरी मम्मी बेस्ट कुक है।मैं अपने फ़्लैट में आराम करने जा रही हूँ। रात की ड्यूटी है । कल आंटी की रिश्तेदार का आपरेशन भी है ।
आपरेशन तुम करोगी ।
नहीं मै अभी जूनियर हूँ,डा शेखर गुप्ता आपरेशन करेंगे ।मैं तो साथ में रहूँगी। वह अपने फ़्लैट में चली गई ।
उसके जाते ही दोनों पति पत्नी मेरे पैरों पर गिर पड़े ।
कभी सोचा न था कि इस जन्म में आपसे भेंट हो पायेगी ।
तुम दोनों ने मुझे पहचान लिया ।
मैडम,आप तो बिलकुल नहीं बदलीं,मैं तो देखते ही पहचान गया ।
पर तुम दोनों तो बहुत बदल गये हो ।पार्वती तुम कितनी मुटिया गई हो।कन्हैया कम बदले है ।
क्या करें,मैडम पहले झाड़ू पोंछा करती थी,शरीर सही था ।अब कोई काम नहीं है सो वजन बढ़ गया ।
पार्वती शर्मा गई ।
मैं उनकी पूरी कहानी सुनने के लिए उत्सुक थी।
जब सारे कर्मचारी चले गए,बस एकांत में हम तीनों थे।
कन्हैया ने कहा- मैडम,मैं कैसे भूल सकता हूँ कि कितना बड़ा उपकार आपने किया ।
मैं भी आश्चर्य के सागर में गोते खा रही थी- कहाँ मेरा रिक्शा चालक कन्हैया और अब श्री के एल वर्मा ।
मैंने हंस कर कहा-भाग्य । लक्ष्मी चंचला होती है। जब मैंने डा रूमा का नाम सुना,तभी सोचने लगी थी ।
कन्हैया भरे हुए कंठ से बोला- मैडम, आप ने हमें बिटिया नहीं,साक्षात लक्ष्मी दी।
हाँ,वह तो दिख रहा है,पर ये चमत्कार कैसे हो गया ।
मैडम ,बच्ची को लेकर सीधे क्वाटर पर पहुँचे ।परवती से कहे-जल्दी से निकल,कोई जान न सके,ई हमारी बिटिया है।
पार्वती- मैडम जी,हम कभी कोई सवाल इनसे नहीं किये ।जल्दी से रुपया पैसा एकाध कपड़ा थैला में डाल कर निकल पड़ी।आप जो तनख़्वाह बक्शीश देतीं थीं,वह अलग थैली में था।दोनों प्राणी का खर्चा तो रिक्शा से निकल जाता था ।
रास्ते में मालिक को रिक्शा वापस किए,घर से बुलाया गया है ।वे भी कुछ पैसा दिये।
टेसन पर पता चला कि बंबई मेल खुल रही है,जल्दी से टिकट लिए और हमेशा के लिए कानपुर छोड़ दिया ।
पार्वती ने बात आगे बढ़ाई-बिटिया को छाती से चपका कर बैठ गयी।ब्लाउज़ को थोड़ा सा फाड़कर बोतल डाल दिया,और निपल उसके मुँह से लगा दिया,वह चुसुक चुसुक कर दूध पीने लगी।
सामने की सीट पर बैठी अम्मा समझाने लगी- ऐसे ही करो,छाती से चिपका कर रखो,दूध उतर जायेगा ।बहुत जल्दी निकल पड़े, का बात है ।
एक रिश्तेदार की तबीयत ख़राब है,सो जल्दी जा रहे हैं ।
अम्मा बोली- इतनी जल्दी कि बिटिया का कपड़ा भी न ले सके ।
पार्वती ने बात सँभाली-अम्मा,हमारे यहाँ छठी से पहले कपड़ा नहीं पहनाया जाता ।
बूढ़ा बोली-हाँ हम जानत हैं ।मिला रिश्तेदार तो दे सकते हैं ।अपनी पोटली से एक छोटी सी फ्राक दी।हम अपनी नातिन के लिए ले जा रही थीं ।
बिटिया को पहला कपड़ा और असीस मिल गया ।सारी रास्ते हिदायत देते गई कि बच्चा कैसे पाला जाता है ।
हम बहुत कोशिश किये कि कुछ पैसा ले लें,पर डपट दीं।
समोसा चाय बेचने वाला आया,हम दो समोसा लिए,पर वे पार्वती को नहीं खाने दी।
लड़कौर मेहरारू को मिर्ची मसाला न खाना चाहिए ।अपने पास से रोटी दी ।
मैडम जी,बिटिया के भाग्य से कदम कदम पर मदद मिली ।वे मदद तो बहुत की,पर भाषण बहुत दीं।
नासिक में आसीस देते हुए उतर गयीं,उनके दामाद स्टेशन पर आये थे ।
भगवान ऐसे ही मदद करते हैं पहले आप,डा रूमा ।अब ये अम्मा जी ।
बंबई स्टेशन देख कर आँखें चौंधिया गयी,इतनी भीड़ ।कानपुर में तो सीढ़ियों से प्लेट फार्म से निकल जाते हैं,पर यहाँ सीधे ही चलते जाओ।
पार्वती बिटिया को लेकर धीरे धीरे चल रही थी। वह भी पैदाइशी समझ दार थी।बस टुकर टुकर अपनी माँ को देखती और चिपक जाती।
बाहर निकल कर एक आटो चालक से बात किए ।
हम लाख जाति,धर्म और क्षेत्रीयता में बंटे हों,पर परदेस में कोई अपनी भाषा बोलता मिलता है,लगता है मानो ख़ज़ाना मिल गया । इतनी मुहब्बत से पेश आते हैं कि सगे संबंधियों जैसे लगते हैं ।
वह हमारी बोली से समझ गया कि हम यू पी से हैं ।
ए भाई,कहाँ से हो ।
कानपुर ।
अरे वाह,परोस के। हम उन्नाव के है । कहाँ जाओगे ।
भैया,किसी धर्म शाला में ले चलो,बाद में इंतज़ाम किया जायेगा ।
अरे,धर्म शाला काहे बदे।हमारे परोस के हो,यहाँ भी पड़ोसी बन जाओ।यहाँ हमारी खोली है,बग़ल वाली साले साहब के लिए लिए थे।पर उन्हें मुंबई भाया नहीं,वापस गाँव चले गए ।
हमारा नाम सुरेश है,और आप का?
इतनी बातचीत के बाद नाम पूछा गया । कन्हैया,हमने कहा।
कहकर सीधे खोली ( चाल)पहुँचे ।लंबी चौड़ी बिल्डिंग,गलियारे के दोनों ओर छोटे छोटे कमरे । एक ही कमरे में रसोई नहाना और सोना था।मुंबई में जगह कम होने के कारण लोग इसी प्रकार रहते हैं । दिशा फ़राग़त के लिए सबसे कोने में लाइन लगाना पड़ता। कुछ लोग दूर सरकारी शौचालय में जाते ।
सुरेश की पत्नी भी बड़े प्रेम से मिली,पूछी-बहुत प्यारी बिटिया है,नाम क्या है ।
फ़ौरन मुँह से निकल गया-रूमा।
आशा सिंह
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