शब्द केवल अभिव्यक्ति का माध्यम भर नहीं है। ये विरासतों को सहेजते हैं, समकालीन समय का दर्पण बनते हैं और भविष्य को दिशा निर्देश देने वाली मशाल भी। शब्दों को समर्पित ऐसी ही एक समृद्ध करने वाली शाम थी 30 अगस्त की शाम। जब दिल्ली के इंडिया इंटेरनेश्नल सेंटेर के मल्टीपर्पज हॉल में वरिष्ठ साहित्यकार, आलोचक, संस्कृतिकर्मी शिव कुमार शिव जी की जयंती पर किस्सा पत्रिका द्वारा एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। अद्भुत संयोग था कि सावन का आगमन भी इसी दिन हुआ और बादलों कभी रिमझिम और कभी मूसलाधार झड़ी के साथ गर्मी से तृप्त धरती का अभिषेक किया। आम तौर पर दिल्ली में दूरी और असुविधा के कारण बारिश में होने वाले कार्यक्रमों में साहित्य प्रेमियों की उपस्थिति कम देखी जाती है परंतु यह आदरणीय शिव कुमार शिव जी के प्रति श्रद्धा और किस्सा पत्रिका परिवार के स्नेह और सब को साथ लेकर चलने का जज़्बा ही था कि कार्यक्रम के साढ़े 5 बजे के निर्धारित समय से बहुत पहले ही लोगों का आना आरंभ हो गया और साढ़े पाँच बजे तक दिल्ली के वरिष्ठ, कनिष्ठ, नामचीन,साहित्य सुधि जनो के वार्तालाप से इंडिया इंटेरनेश्नल हॉल का प्रांगण गुंजायमान हो गया। कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार हरियश राय जी, अनामिका जी, वंदना राग जी, गीताश्री जी, राकेश कुमार जी के साथ ही समकालीन सिनीवाली, योगिता यादव, सुमन केशरी, कल्पना मनोरमा सहित अनेकों समृद्ध साहित्यकार उपस्थित थे। सभागार के अंदर आयोजकों की तैयारियों से दूर रिमझिम बारिश के दृश्य निहारते हुए साहित्य प्रेमियों ने आपसी गुफ़्तगू के साथ चाय-नाश्ते का आनंद लिया।
शब्दों के स्मरण और विस्तार के साथ दी गई वरिष्ठ साहित्यकार शिव कुमार शिव जी श्रद्धांजलि
आगंतुकों में उत्साह का एक कारण यह भी कि उनके प्रिय कथाकार आदरणीय शिव कुमार शिव जी के राजकमल से प्रकाशित कहानी संग्रह ‘प्रतिनिधि कहानियाँ’ का लोकार्पण भी होना था। एक तरह से पाठकों के लिए उनसे पुनः मिलने का अवसर था। वस्तुतः शब्द कभी काल कवलित नहीं होते वे पीढ़ियों तक यात्रा करते हैं। ऐसी ही तो थी साहित्यकार शिव कुमार शिव जी की लेखनी जिसने समाज में संवेदना, मानवीय मूल्यों और साहित्यिक चेतना का प्रकाश फैलाया। उत्साह का दूसरा कारण सम्मान समारोह था जिसमें एक उपन्यासकार और एक कहानीकार को सम्मानित किया जाना था। समकालीन सुपरिचित कथाकार प्रज्ञा जी को 2025 में प्रकाशित उनके कहानी संग्रह ‘काठ के पुतले’ व सविता पाठक जी को उनके उपन्यास “कौन देस उतरने का” के लिए ‘शिव कुमार शिव स्मृति सम्मान -26” प्रदान करने की घोषणा के साथ ही कई साहित्यकार कार्यक्रम में जाने को उत्सुक थे। पुरस्कृत दोनों ही पुस्तकें पाठकों के मध्य भी प्रशंसित और चर्चित रहीं हैं।
मेरे लिए यह अवसर कुछ और ही खास था। जिनकी किताबें लंबे समय से पढ़ती रही। लेखन की बारीकियाँ सीखती रही। उन्हीं की जयंती पर आयोजित कार्यक्रम के संचालन का महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व प्रिय अनामिका शिव जी ने मुझे सौंपा था। स्नेह और आदर के इस दोहरे उत्तरदायित्व से बंधकर खचाखच भरे सभागार में नियत समय पर जब मैंने आ. शिव कुमार शिव जी की स्मृतियों को नमन करते हुए शब्दों को ही समर्पित स्वरचित मुक्तक के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ किया तो लगा कि काल की सीमाओं को पार कर स्वयं आदरणीय रचनाकार शब्दों में समाहित हो स्नेह और आशीर्वाद की वर्षा कर रहे हैं। शब्द स्वतः ही फुट पड़े कि “बेटियाँ जब विरासतें संभालतीं हैं तो एक बड़ा संदेश जाता है। बहुत सारी अवधारणाएँ अपने आप टूट जाती हैं। समाज में समता समानता की स्थापना करता साहित्य पुरानी मिट्टी में रूढ़ियों के खरपतवार हटाकर कुछ नया गढ़ने का प्रयास ही तो है।”

साहित्यानुरागियों की विशेष अभिलाषा का आदर करते हुए कार्यक्रम की विधिवत शुरुआत से पूर्व श्रद्धेय कुमार शिव जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आधारित डॉक्यूमेंटरी दिखाई गई। जिसमें उनके अपनी मिट्टी भागलपुर के प्रति प्रेम, मानवीय मूल्यों के प्रति जिद, और साहित्यिक चेतना के प्रति जुझारूपन के दिग्दर्शन ही नहीं हुए बल्कि उनके पारिवारिक मूल्यों का भी बारीकी से रेखांकन हुआ था। ये एक ऐसा क्षण था जब पूरा सभागार भावुक हो गया। अभी तो कितना सीखना था। जानना था । सभागार में शायद ही कोई ऐसा होगा जिसे स्मृतियों से जुडने और टूटने का एक साथ अहसास न हुआ हो। आखिरकार वे हमारी पीढ़ी और आने वाली पीढ़ियों के साहित्यिक पिता हैं। पिता का जाना उस बरगद का छिन जाना है जिसकी छाया में संतति अपने सपनों को आकार देती है। परंतु सृजन दुख का सकारात्मक निस्तार ही है। भावनाओं के अतिरेक को संभालते हुए अतिथियों को मंच पर बुलाकर कार्यक्रम का विधिवत आरंभ हुआ। साहित्य जगत की जानी-मानी हस्तियों का यह एक समृद्ध मंच था जिनके स्वागत के लिए देर तक तालियाँ बजती रहीं। किस्सा पत्रिका की प्रबंध संपादक मीनाक्षी सिंघानिया जी ने कार्यक्रम की अध्यक्ष ममता कालिया जी का व आनंद सिंघानिया जी ने मुख्य अतिथि पुरुषोत्तम अग्रवाल जी का दुशाला व फूलों के गुलदस्ते से स्वागत किया। मुख्य वक्ता महेश कटारे जी, लीलाधर मांडलोई जी, कथाकार सविता जी और प्रज्ञा जी का स्वागत क्रमश: सक्षम भारद्वाज, आनंद सिंघानिया जी, और मीनाक्षी सिंघानिया जी ने किया।
सरल सौम्य मीनाक्षी सिंघानिया जी ने स्वागत भाषण से अतिथियों का स्वागत किया और किस्सा पत्रिका की संपादक अनामिका शिव जी के पिता को लिखे गए पत्र का पाठ भी किया। इस भावुक पत्र की शुरुआत अनामिका जी ने ‘पा’ सम्बोधन के साथ की। वे अपने पिता को ‘पा’ कह कर ही संबोधित करती थीं। इस पत्र ने पिता पुत्री के स्नेह को ही प्रदर्शित नहीं किया बल्कि यह भी सिद्ध किया कि समता समानता की नींव से रचे गए घरों की बेटियाँ विरासतें संभालती हैं और बहुए बहनों की तरह हाथ मिलाकर साथ चलती है।
कार्यक्रम का अगला भाग राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित शिव कुमार शिव जी की “प्रतिनिधि कहानियाँ” पुस्तक के लोकार्पण के नाम रहा। ममता कालिया जी, पुरुषोत्तम अग्रवाल जी, महेश कटारे
जी, लीलाधार मांडलोई जी, कथाकार प्रज्ञा जी, सविता पाठक जी एवं राजकमल प्रकाशन समूह के आमोद माहेश्वरी जी व अशोक माहेश्वरी जी ने भारी करतल ध्वनि के मध्य पुस्तक को पाठकों को समर्पित किया।
वरिष्ठ साहित्यकार महेश कटारे जी जो शिव कुमार शिव जी के अभिन्न मित्र रहे हैं। पुस्तक लोकार्पण के बाद जब वह मंच पर आए तो स्मृतियों का कोष भी अपने साथ ले आए। उनको देखकर श्रद्धा हो रही थी कि जन से उन्होंने कहानियों पर विस्तार से अपनी बात रखी। उनके वक्तव्य में मित्रवत स्नेह, संवेदनाओं की सुवास, और साहित्यकाश के साथ-साथ निजी जीवन में उपजे खालीपन का दर्द भी स्पष्ट रूप से दिख रहा था। उन्होंने उनकी किस्सागोई की प्रशंसा करते हुए कहा कि, वे अपनी कहानियों के पात्र कल्पना से नहीं उठाते थे उनकी कहानियों के पात्र रोजमर्रा के जीवन से टकराने वाले लोग हैं। उनकी कहानियों में प्रेम और देह जरूरी बिन्दु हैं, लेकिन वे कलात्मकता के साथ आते थे न कि किसी फूहड़पन या अश्लीलता के साथ। सहज भाषा में लिखी गई उनकी कहानियों के बारे में अपनी बात रखते हुए उन्होंने आगे कहा कि शिव कुमार शिव जी की कहानियों में मौन चीत्कार, उदासियों और हाहाकार की एक भीषण दुनिया बसी होती है। जिनको पढ़ने के पश्चात पाठक सहज नहीं रह पाता है। सामाजिक असमानताओं के प्रश्नों को पाठकों के मन में बो देना ही उनकी कहानियों की जीत रही है।
पुरस्कृत कथाकारों की कहानियों पर अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा कि दोनों ही कथाकारों की कहानियाँ दिल्ली की उन बस्तियों से होकर गुजरती हैं जिन्हें विकास की चमक से चुँधियाई आँखें अक्सर देख नहीं पाती हैं। सविता पाठक के उपन्यास “कौन से देस उतरने का” पर अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा कि ये देश के गाँवों से रोजी रोटी की तलाश में शहर आए लोगों की मार्मिक कथा है। ये अपने ही देश में विस्थापित हैं। इनका जीवन समाजिक व्यवस्था और राज्य व्यवस्था का मारा हुआ जीवन है। इनकी एक ही जाति है ‘गरीबी’। महिलाओं पर तो पितृसत्ता का दोगुना बोझ है। लोक भाषा और लोक रंग में रंगी कथा सोचने पर विवश कर देती है। कथाकार प्रज्ञा की कहानियों पर अपना मन्तव्य रखते हुए उन्होंने कहा कि वे उनकी कथाएँ पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ते और सराहते रहे हैं। ‘मन्नत टेलर’ का जिक्र करते हुए प्रज्ञा की कहानियों में समाज के दमित, शोषित वर्ग के लिए शाइस्तगी से एक गंभीर आवाज उठती है। वे समाज के अंधेरे कोनों को दिखाती ही नहीं बल्कि परिवर्तन की एक किरण भी थमाती हैं। बेचैन परिस्थितियों से संघर्ष करते उनके पात्र आशा की मशाल थामे रखते हैं।

महेश कटारे जी के वक्तव्य के बाद मंचासीन अतिथियों द्वारा वरिष्ठ कथाकार प्रज्ञा जी व सविता पाठक जी को सम्मानित किया गया। यह वह गौरवपूर्ण क्षण था जिसकी सबको प्रतीक्षा थी। क्योंकि सम्मान केवल शब्दों का नहीं होता, यह उस संघर्ष का होता है जिससे जूझते हुए कृतिकार अपनी कृति को आकार देता हैं। शब्दों का स्मरण करते हुए शब्दों के विस्तार से ज्यादा सुंदर और क्या हो सकता है। उत्सुक आँखों की प्रतीक्षा पर विराम लगाते हुए भारी करतल ध्वनि के मध्य दोनों कथाकारों के प्रशस्ति पत्र का मंच से पाठ कर के सम्मान स्वरूप उन्हें दुशाला, प्रशस्ति पत्र, स्मृति चिह्न व 51,000 रुपये की राशि प्रदान की गई।
अब बारी थी रचनाकारों के वक्तव्य की। सभागार में सभी लोक और आम जन से जुड़ी इन गंभीर पर सहज रचनाओं की रचना प्रक्रिया को जानने को उत्सुक थे। सभागार को संबोधित अपने वक्तव्य में वरिष्ठ कथाकार प्रज्ञा जी ने आ. शिव कुमार शिव जी की स्मृतियों को नमन करते हुए किस्सा पत्रिका परिवार के प्रति आभार व्यक्त किया साथ ही उन्होंने परिकथा पत्रिका और उसके सम्पादक शंकर जी का भी आभार व्यक्त करते हुए कहा कि काठ के पुतले संग्रह की शीर्षक कहानी परिकथा में ही प्रकाशित हुई और उसे व्यापक चर्चा मिली। अपनी रचनाओं पर बात रखते हुए प्रज्ञा जी का कहना था कि आज हम आभासी,वास्तविक दुनिया के साथ जो दुनिया हम पर थोपी जा रही है, उसमें रह रहे हैं और हर लेखक का स्वप्न है एक ऐसी दुनिया बनाए जो बेहतर हो। ऐसे में लेखन में मैं दो विचारों से लगातार टकराती हूं-पहला-ये तो होता ही आया है और दूसरा-यह तो होगा ही। पहला विचार कोमल दिखता है पर वह अतीत के गलत अभ्यासों को दोहराए जाने की नजीर प्रस्तुत करता है और दूसरा विचार आतंकित करता है कि यथास्थिति को बनाए रखते हुए खामोश रहो। उन्होंने आगे कहा कि उनका लेखन प्रगतिशील परंपरा के साथ खड़े होकर इन दोनों विचारों का प्रतिपक्ष रचता है क्योंकि ये दोनों विचार ही अपमान,अन्याय,अनीति को सहने वाले काठ के पुतले रचना चाहते हैं और वे लेखन में अपने रचनात्मक संवेदन से इसका विरोध करती हैं कि हमें सत्ता द्वारा पोषित ‘काठ के पुतले’ नहीं बनना । सत्ता व्यवस्थाएं हमें एक ढंग में काट रही हैं उसमें हम चाहते हैं कि मनुष्य के सामाजिक संबंध हैं, जो रागात्मक संबंध हैं उन्हें बचाएं वो मर न जाएं। वो जीवित रहें। व्यवस्था ये मानकर मुतमइन न हो जाए कि उनके आदेश और लोगों का स्वीकार। समय की प्रतिकूलताएं एक तरफ काठ के पुतले गढ़ने वाले खेल को समझ लेती हैं और दूसरी तरफ इन काठ के पुतलों के बरक्स उस जनतांत्रिक विवेकसम्मत चेतना का विकल्प चुनती हैं जो सिरे से इंकार करे-ये तो होता ही आया है और ये तो होगा ही। काठ के पुतले बनने से साफ इंकार करना दरअसल विचार प्रणाली के लिए गलत अभ्यासों को सही बताए जाने का सिरे से इंकार है।

सविता जी ने सभी का आभार व्यक्त करते हुए शिव कुमार शिव जी की कहानियों की चर्चा की। उनकी सहज भाषा और किस्सागोई की प्रशंसा करते हुए उन्होंने उनकी यथार्थ चित्र उकेरने की कला को सीखने योग्य बताया। अपने उपन्यास के बाबत उन्होंने कहा कि उपन्यास के नाम में देश की जगह देस चुनना ही कथा के लोक से जुड़े होने की गवाही है। वह लोक, जो उस ग्राम्य जीवन की छटपटाहट है, जो अपनी माटी से दूर शहर में आकार संवेदना की बूंदें तलाशती है। दोनों लेखकों ने इस साहित्यिक परंपरा पर खुशी व्यक्त की कि आज भी वरिष्ठ न केवल कनिष्ठों को पढ़ते हैं बल्कि पसंद आने पर उन्हे मेसेज भी करते हैं। सभागार ने करतल ध्वनि के साथ इस वक्तव्य पर अपनी मोहर लगाई।

वरिष्ठ साहित्यकार लीलाधार मांडलोई जी रोचक वक्तव्य से समां बांध दिया। दोनों कथाकारों की पुस्तकों की विवेचना करते हुए कहा कि जनचेतना की आवाज है ये पुस्तकें। कथाकार प्रज्ञा की कहानी ‘काठ के पुतले पर बात रखते हुए उन्होंने कोयले की खानों में श्रमिकों के लगातार खड़े रहने के दर्द पर लिखी अपनी कविता का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध की शुरुआत ही साहित्य की नींव है।
मुख्य अतिथि पुरुषोत्तम अग्रवाल जी जो विचारक और चिंतक भी हैं ने अपने वक्तव्य में समाज और समय कि आहटों को भी सुना। दोनों पुरस्कृत किताबों पर अपनी बार रखते हुए उन्होंने कहा कि, इनमें स्त्री पात्र तो हैं पर ये स्त्री विमर्श नहीं रचती हैं। जब कोई विमर्श अपनी अति को छू लेता है तो विपरीत परिस्थितियाँ भी सामने आने लगती हैं। प्रज्ञा जी की कहानियों पर अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा कि वे उस आम आदमी की कथा कहतीं हैं जो हमारे समाज की रीढ़ है, पर जिसके दुख- दर्द अक्सर बिसरा दिए जाते हैं। सविता पाठक का यह पहला उपन्यास है और इसको सम्मान मिलने का अर्थ है कि अभी भी गंभीर काम को चीन्हने वाले संपादक है। जब तक ऐसा है साहित्य और सरोकार की आवाज सुरक्षित है। उन्होंने किस्सा पत्रिका परिवार की भी सराहना की जो अपनी धरोहरों को सहेज रही है।
कार्यक्रम की अध्यक्ष साहित्य अकादमी सम्मान से सम्मानित ममता कालिया जी ने अपने सहज ममतामयी संक्षिप्त पर गहन वक्तव्य में उन्होंने आज के कथा जगत के साथ-साथ दोनों कथाकारों की कहानियों पर प्रकाश डालते हुए उन्हें यूंही अँधेरों के खिलाफ आवाज उठाने को प्रेरित किया। दोनों की कहानियों में प्रबल तार्किक दृष्टिकोण को उन्होंने उजागर किया. ममता जी का कहना था प्रज्ञा और सविता स्त्री लेखन के पूर्वनिर्धारित मानकों से अलग बेहतर रच रही हैं. उन्होंने कहा इस सम्मान समारोह की सफलता ये है कि यहाँ बैठे सभी लोगों ने इन दोनों कथाकारों को खूब पढ़ा है. हम सब ममता जी को और सुनना चाहते थे पर समय शत्रु की तरह आकर खड़ा हो गया। उनके वक्तव्य के बाद मीनाक्षी सिंघानिया जी ने पुनः माइक संभाला और सभी कि गरिमामयी उपस्थिति का धन्यवाद करते हुए कार्यक्रम की समाप्ति की घोषणा की।

इस साहित्यिक गहमागहमी के बाद सुस्वादु भोजन की भी व्यवस्था थी। जहां साहित्यिक चर्चा आकार लेती रही। मित्र मिलन, एक दूसरे के पढे-लिखे पर बात रखना, सराहना के बाद मोबाइल में स्मृतियों को कैद करने के बाद तृप्त मन के साथ अगले वर्ष पुनः मिलने की शुभेकक्षाओं के साथ सुधि साहित्यकारों ने अपने घरों की ओर प्रस्थान किया।
रिमझिम बारिश अभी भी हो रही थी और उनींदी धरती नए बीजों को अंकुरित करने के कार्य गुपचुप गुपचुप करने में मगन थी।
वंदना बाजपेयी
किस्सा पत्रिका से साभार

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