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वर्षों बाद …

वर्षों बाद ...

                           हर घटना जब घटती है तो हम उसे एक एंगल से देखते हैं , अपने एंगल से , लेकिन जब दूसरे का एंगल  समझ में आता है तो हम जिस उम्र परिस्थिति के हिसाब से सोच रहे हैं , दूसरा उससे अलग अपनी उम्र व् परिस्थिति के हिसाब से सोच रहा होता है | तब लगता है , गलत कोई नहीं होता , हर घटना का देखने का सबका एंगल अलग होता है …..अक्सर ये समझ वर्षों बाद आती है

लघु कथा -वर्षों बाद 

                                            मैं  हॉस्पिटल के बिस्तर पर  लेटी थी | ड्रिप चढ़ रही थी |  एक -एक पल मेरा मृत्यु से युद्ध चल रहा था | पता नहीं घर वापस जा भी पाउंगी या नहीं |  पर मृत्यु से भी ज्यादा मुझे कर रहा था अपनी बेटी का दुःख | मेरे बाद क्या होगा उसका | कितनी संवेदनशील है , किसी का दर्द सुन लें तो महीनों मन से निकाल नहीं पाती है | जब उसे ससुराल में पता चलेगा तो … टूट जायेगी , सह नहीं पाएगी , कितना रोएगी , अभी बेटा छोटा है उसे पालना है , इतनी जिम्मेदारियां सब पूरी करनी है , ऐसे कैसे चलेगा |

                                           मैं अपने ख्यालों में खोयी हुई थी कि बेटी ने कमरे में प्रवेश किया | उसकी डबडबाई आँखे देख कर मैं टूट गयी , फूल सा चेहरा ऐसे मुरझा गया था जैसे कल से पानी भी न पिया हो | उसकी हालत देख कर मैंने मन को कठोर कर लिया और उससे बोली , ” किसने खब कर दी तुमको , अभी बच्चा छोटा है उसको देखो , तुम्हारा भाई है तो मेरी देखभाल को … बेटियाँ पराई  होती हैं उन पर ससुराल की जिम्मेदारी होती है | और इस तरह रो -रो कर मेरा अंतिम सफ़र कठिन मत करो | उसने मेरे मुंह पर हाथ रख दिया और बोली , ” कुछ मत बोलो माँ , कुछ मत बोलो … और वो मेरे सीने से लग गयी |

                   उसके सीने से लगी मैं अतीत में पहुँच गयी | ऐसे ही माँ  अपने अंतिम समय में गाँव में आँगन में खाट पर लेटी थीं | मैं दौड़ती भागती बच्चों को ले माँ को देखने पहुँची थी | मुझे देख कर माँ , जो दो दिन से एक अन्न का दाना नहीं खा पायी थीं , न जाने खान से ताकत जुटा  कर बोलीं , ” हे , राम , इनको कौन खबर कर दीन , ए तो बच्चन को भी जेठ का माहीना में ले दौड्स चली आयीं , अब पराये घर की हो उहाँ की चिंता करो यहाँ की नहीं | अब  रो रो के हम्हूँ को चैन से न मरने दीन , चार दिन के जिए दो दिन माँ ही चले जाइये |” मैं माँ के पास से हट गयी थी | अगली सुबह माँ  का निधन हो गया |

                     वो अंतिम मिलन मुझे कभी भूलता ही नहीं था  | माँ क्या मुझे देखना ही नहीं चाहती थीं | क्या बेटियों की विदा कर के माँ उन्हें पराया मान लेती हैं | मैं जब भी माँ को याद करती उनके अंतिम शब्द एक कसक सी उत्पन्न करते | मैं आंसू पोछ  कर सोचती , जब माँ ही मेरा आना पसंद नहीं कर रहीं थीं तो मैं अब क्यों याद करूँ |

आज अचानक वही शब्द मेरे मुंह से अपनी बेटी के लिए निकल गए | तस्वीर आईने की तरह साफ़ हो गयी | ओह माँ , आप नहीं चाहती थी कि मैं आपके लिए ज्यादा रोऊँ , इसलिए आपने अंतिम समय ऐसा कहा था | सारी  उम्र मैं आपको उन शब्दों के लिए दोषी ठहराती रही | ऐसा कहते समय आपने कितनी पीड़ा कितना दर्द झेला होगा उसकी समझ भी मुझे आई तो आज … इतने वर्षों बाद |

वंदना बाजपेयी

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