प्रेम विवाह लड़की के लिए ही गलत क्यों-रंजना जायसवाल की कहानी भागोड़ी

लड़कियों के लिए तो माता-पिता की मर्जी से ही शादी करना अच्छा है l प्रेम करना तो गुनाह है और अगर कर लिया तो भी विवाह तो अनुमति लिए बिना नहीं हो सकता और अगर कर लें तो वो उससे भी बड़ा गुनाह है l जिसकी सजा माता-पिता परिवार मुहल्ला- खानदान पीढ़ियाँ झेलती हैं l पर प्रेम को मार कर कहीं और विवाह कर लेने की सजा केवल दो लोग… इसलिए समाज को दो लोगों को सजा देना कहीं ज्यादा उचित लगता है और विवाह के मंत्रों के बीच किसी प्रेम पुष्प की आहुति अक्सर हो ही जाती है l “प्रेम और इज्जत” सदियों से तराजू के दो पलड़ों में बैठा दिए गए हैं l इस नाम से किरण सिंह जी का कहानी संग्रह भी है l

प्रेम विवाह लड़की के लिए ही गलत क्यों-रंजना जायसवाल की कहानी भागोड़ी

रंजना जायसवाल

ऐसे विचार मेरे मन में आये किस्सा पत्रिका में रंजना जायसवाल की कहानी “भगोड़ी” पढ़कर l कहानी में पिता से कहीं अधिक स्त्री जीवन की विडंबनाएँ खुलती हैं l एक प्रेम में भागी हुई लड़की जब कुछ वर्ष बाद अपने ही शहर वापस आती है तो उसे पता चलता है कि उसके पिता कि मृत्यु हो चुकी है l भाई द्युज की कहानी में सात भाइयों की बहन को भाई की शादी में भी नहीं बुलाया जाता पर घर से भागी हुई लड़की को पिता की मृत्यु की सूचना भी नहीं दी जाती l मायके जाने के लिए पूछने की दीवारे अब भले ही टूट रहीं हो पर पिछली पीढ़ियों ने ये दर्द जरूर झेला है l एक हुक सी उठती है और मन के कोने में मुकेश द्वारा गाया गया गीत बज उठता है ….
“नए रिश्तों ने तोड़ा नाता पुराना
ना फिर याद करना, ना फिर याद आना”
और तंद्रा टूटती है दरवाजे पर खड़ी छोटी बहन के इस आर्त-कटाक्ष से
“जो लड़कियां भाग जाती है ना उस घर की और लड़कियों की शादी नहीं हो पाती l केवल उस घर की लड़कियों की ही नहीं मुहल्ले की लड़कियों की भी शादी नहीं हो पाती l”
l
और उसके बाद शुरू होती है, आरोपों की झड़ी कि घर छूटे लोगों कि क्या दशा होती है l जिस पिता ने माँ-पिता दोनों की भूमिका निभाई l जिनसे मुहल्ला भर अपने बच्चों के लिए राय लेने आता था उन्हें सगी बुआ की बेटी की शादी में बुलाया भी नहीं गया lछोटा भाई नन्ही उम्र में ही वयस्क बन जाता है l जल्दी मुहल्ले की लड़कियों की शादी कर दी जाती है l
लेखिका ने जो लिखा वो यथार्थ है l हमारे छोटे शहरों और गांवों का … पर क्या यथार्थ दिखाना ही कहानी का उद्देश्य है को लेखिका अंतिम पैराग्राफ में पलट देती है और एक प्रश्न पाठक के मन में बो देती हैं l
और मुझे फिर से दो पलड़े दिखाई देने लगते हैं … एक में स्त्री बैठी है और एक में पुरुष l इन तमाम सामाजिक विडंबनाओं को जब प्रेम के नाम पर तोलने का प्रयास होता है पुरुष और उसके परिवार का पलड़ा फूल सा हल्का होकर उठता चला जाता है और स्त्री का धड़ाम से जमीन छूता है l
और प्रश्न उठता है कि प्रेम और इज्जत के इस पलड़े में सिर्फ स्त्री ही क्यों बैठी है?
डॉ. संगीता पांडे की एक कविता मुझे बार-बार याद आती है “विकल्प” l इसमें लड़की को माता-पिता बहुत प्यार करते हैं और उसे अपनी मर्जी का विकल्प चुनने देते हैं… तमाम विकल्पों में वो चुनती है नीली आँखों वाला गुड्डा, गुलाबी फ्रॉक, लाल रिबन पर शादी के समय उसे चुनने का विकल्प नहीं होता… बदले में मिलती है मौत…. जहाँ से वापस लौटने का कोई विकल्प नहीं है l
क्या आज बेटियाँ अपने पिता से ये विकल्प देने कि इजाजत नहीं मांग रहीं ? ये कहानी यही जवाब मांग रही है l
कहानी के लिए रंजना जायसवाल जी को बधाई , शुभकामनाएँ
वंदना बाजपेयी
वंदना बाजपेयी
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