करवाचौथ : एक चिंतन

   हमारा देश एक उत्सवधर्मी देश है। अपने संस्कारों, परम्पराओं, रीति-रिवाजों का संवाहक देश ! पूरे वर्ष कोई न कोई उत्सव, इसलिए पूरे वर्ष खुशियों का जो वातावरण बना रहता है उसमें डूबते-उतराते हुए जीवन के भारी दुःख उत्सवों के द्वारा मिलने वाली छोटी-छोटी खुशियों में बहुत हल्के लगने लगते हैं। यही है हमारे उत्सवों की सार्थकता।

   प्रेम ! एक शाश्वत सत्य है। जहाँ प्रेम है वहां भावनाएँ हैं और जहाँ भावनाएँ हैं वहां उनकी अभिव्यक्ति भी होगी ही। मीरा, राधा ने कृष्ण से प्रेम किया। दोनों के प्रेम की अभिव्यक्ति भक्ति और समर्पण के रूप में हुई। प्रेम की पराकाष्ठा का भव्य रूप ! हनुमान ने राम से प्रेम किया तो सेवक के रूप में और सेवा भक्ति के रूप में अपने प्रेम को अभिव्यक्ति दी। लक्ष्मण को अपने भाई राम से इतना प्रेम था की उसकी अभिव्यक्ति के लिए वे आज्ञाकारी भाई बन, अपनी पत्नी को छोड़ कर राम के साथ वन गए  और भरत, उन्होंने अपने प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए त्याग का माध्यम चुना। तो इसका अर्थ ये हुआ की जहाँ प्रेम है, भावनाएँ हैं उनकी अभिव्यक्ति भी होनी उतनी ही आवश्यक है जितना जीवन में प्रेम का होना आवश्यक है।

      जीवन में प्रेम है तो संबंध भी होंगे और हमारा देश संबंधों के मामले में बहुत धनी है। इतने संबंध, उनमें भरी ऊष्मा, ऊर्जा और प्रेम ! अपने पूर्वजों के प्रति आदर और श्रद्धा प्रकट करने के लिए श्राद्ध पर्व तो माँ का अपने बच्चों के प्रति प्रेम जीवित पुत्रिका,अहोई अष्टमी ,संकट चौथ व्रत, तो भाई -बहन के लिए रक्षाबंधन और भैयादूज और पति-पत्नी के प्रेम के लिए तीज और करवाचौथ। यहाँ तक कि गाय रुपी धन के  लिए भी गोवर्धन पूजा का विधान है।

     इन संबंधों की, उत्सवों की सार-संभाल करने, उन्हें अपनी भावनाओं  से गूँथ कर पोषित करने में स्त्री की सबसे बड़ी भूमिका होती है। घर की लक्ष्मी कहलाती है इसी से घर के सभी व्यक्तियों के संबंधों को सहेजते हुए अपने प्रेम, त्याग, कर्तव्य से उन्हें ताउम्र संभाल कर रखती है। पति-पत्नी का सम्बन्ध, उनका प्रेम जितना खूबसूरत है उसका प्रतीक करवाचौथ का उत्सव भी उतना ही खूबसूरत है। सभी संबंध प्रतिदिन के है और उनमें प्रेम व भावनाओं की अभिव्यक्ति भी होती रहती है, पर उत्सवों के रूप में अपने प्रेम और भावनाओं की अभिव्यक्ति से इन्हें नवजीवन, ऊष्मा और ऊर्जा मिलती है और प्रेम जीवंत बना रहता है।उसी प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए पत्नी करवाचौथ का व्रत करती है। 


एक-दो दिन पहले से ही उसकी तैयारियों में जुट जाती है, मेहंदी लगाती है, निराहार रह कर व्रत करती है। शाम को पूर्ण श्रृंगार करके अपनी सखी-सहेलियों के साथ व्रत की कथा सुनती है। पति और घर में अन्य सभी की पसंद का खाना बना कर चाँद के उदय होने की प्रतीक्षा करती है। रात को चलनी से चंद्र-दर्शन कर,अर्ध्य देकर, अटल सुहाग का वर मांगते हुए अपना व्रत खोलती है। बड़ों के पाँव छूकर, आशीर्वाद लेकर अपनी सास को, उनके न होने पर जिठानी की बायना देती है जिसमें श्रृंगार के सामान के साथ ड्राई फ्रूट्स, मिठाई और साड़ी और शगुन के रूप में कुछ रुपए भी होते हैं। इस दिन सुई से कुछ भी न सिलने का प्रावधान होता है। इसके पीछे शायद यह भावना हो कि सुई से सिलना मानो सुई चुभा कर पीड़ा देने के समान है, इसीलिए यह नियम बनाया गया होगा।

      कहीं पर व्रत के दिन सुबह सरगी, विशेषकर पंजाबियों में, खाने का चलन है तो कहीं पूरी तरह निराहार रहकर व्रत करने का चलन है। कई स्त्रियां पूजा करते समय हर वर्ष अपने विवाह की साड़ी ही पहनती हैं तो कई हर बार नई साड़ी लेती हैं और अपने-अपने मन के विश्वास पर चलती हैं।

      आज इस अटल सुहाग के पर्व का स्वरुप बदला-बदला लगने लगा है। फिल्मों और टी.वी.सीरियल्स ने सभी उत्सवों को ग्लैमराइज कर इतनी चकाचौंध और दिखावे से भर दिया है की उसमें वास्तविक प्रेम और भावनाओं की अभिव्यक्ति दबने सी लगी है। पहले प्रेम की अभिव्यक्ति मर्यादित और संस्कारित थी, अब इतनी मुखर है की कभी-कभी अशोभनीय हो जाती है। उपहार और वह भी भारी-भरकम हो, पहले से ही घोषित हो जाता है। व्रत से पहले खरीददारी होगी ही। बाज़ार ने अपने प्रभाव से संबंधों को भी बहुत हद तक प्रभावित करना शुरू कर दिया है। निराहार व्रत की कल्पना नई पीढ़ी को असंभव और पुरानी लगती है।खाना बाहर खाना है,उसके बाद फ़िल्म देखनी है आदि-आदि। और पर्व के बाद मुझे उपहार में यह मिला, तुम्हें क्या? और जिसे नहीं मिला वह सोच में रहेगी कि मैं तो यूँ ही रह गयी बिना उपहार के….

      मैं यह नहीं कहती कि यह सब गलत है।सोचने की बात मेरी दृष्टि से सिर्फ इतनी है कि ग्लैमर और दिखावे की चकाचौंध में प्रेम और भावनाएँ कहीं पीछे छूटतीचली जा रहीं हैं और जो छूट रहा है उसकी ओर किसी का ध्यान क्यों नहीं जा रहा है? क्या यह बात समझनी इतनी कठिन है कि प्रेम और प्रेम की अभिव्यक्ति सार्वजानिक रूप से प्रदर्शन की चीज नहीं है और जिसका प्रदर्शन होता है वह वास्तविकता से कोसों दूर  केवल दिखावा है। शायद दिखावे का ये अतिरेक किसी दिन समझ में आए तो वही इन उत्सवों की सार्थकता होगी।
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डॉ.भारती वर्मा बौड़ाई



फोटो क्रेडिट – wikimedia से साभार
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