दो चाकों के बीच

औरत हूँ मगर सूरत-ए-कोहसार खड़ी हूँ

इक सच के तहफ़्फ़ुज़ के लिए सब से लड़ी हूँ

वो मुझ से सितारों का पता पूछ रहा है

पत्थर की तरह जिस की अँगूठी में जड़ी हूँ

फरहत जाहिद

युवा कवि-कथाकार रेखा भारती मिश्रा के श्वेतवर्णा प्रकाशन से हालिया प्रकाशित कहानी संग्रह “दो चाकों के बीच का कवर पेज और नाम अपने आप में ही पूरे कथा संग्रह की बानगी है। संग्रह की सभी कहानियाँ स्त्री जीवन का रेखाचित्र हैं। इसमें शामिल है वह शाश्वत प्रश्न कि मायका या ससुराल लड़की का अपना घर कौन सा है? और इसकी कहानियाँ क्या लड़की का कोई घर नहीं होता के परंपरागत प्रश्न से आगे निकलकर स्त्री के लिए एक नव-नीड़ का निर्माण करती हैं — स्थूल, वैचारिक, या सांकेतिक।

लगभग सभी कहानियों में परंपराओं में जकड़ी नारी की सपनों के उड़ान के लिए परवाज़ भरती स्त्री की कशमकश दिखाई देती है। फिर चाहें वो रिया हो, सुमन हो, कुसुम हो, या फिर स्नेहा, कृष्णा, या सर्वे वाली l रेखा की स्त्रियों में एक बेचैनी है, अकुलाहट है, कुछ कर दिखाने का जज्बा है। एक कदम उनको पीछे खींचता है और दूसरा आगे । वे अपनी यथास्थिति को स्वीकार नहीं करती बल्कि उम्र के अलग-अलग मुकाम पर फैसले लेकर अपनी जीवन धारा को पलटने में यकीन करती हैं। एक और बिंदु जो कहानियों कि अंतर्धारा में मुझे दिखाई दिया, वह कि औरतें करियर और रिश्तों में से एक को चुनने की देहरी पर क्यों खड़ी रहती हैं? और ये दुविधा भी सिर्फ और सिर्फ मध्यम वर्गीय स्त्रियों के आँचल में कोंछ के चावल की तरह बाँध दी गई है।

“दो शब्द” में रेखा कहती हैं कि, “उन महिलाओं की टीस मुझे चुभती है, जो अपने सपने ही नहीं अपनी सुखद ज़िंदगी से समझौता कर रिश्ते बचाने के लिए विवश होती है”

एक सवाल शीर्षक कहानी ‘दो चाकों के बीच” में चुभता सा लगा कि क्या माता-पिता पूर्णतः निस्वार्थ होते हैं? कृष्णा के भाई के अपने परिवार के साथ अलग हो जाने पर उसके माता-पिता विवाह करते समय शर्त रखते हैं कि लड़की और दामाद उसके घर में रहेंगे। वहीं संपत्ति के लालच में ससुर एक साल ससुराल में रखकर मायके भेजने के लिए हामी भर देते हैं। इस एक साल में कृष्णा की प्रेग्नेंसी से लेकर बच्चे के जन्म तक ऐसे अनेक मौके आते हैं जब दोनों पक्ष कृष्णा से सेवा तो लेना चाहते हैं पर उसके प्रति अपनी जिम्मेदारी का भार दूसरे पर डालना चाहते हैं। कहानी का सकारात्मक अंत पाठकीय सुकून देता है । काश इतनी समझदारी हर परिवार में आए और कोई कृष्णा इस प्रश्न से न जूझे कि उसका अपना घर कौन सा है?

वैधव्य की मुसीबत झेलती स्त्री के साथ कोई अपना खड़ा हो या न खड़ा हो, चरित्र पर लगाए जाने वाले लांछन हमेशा तैयार खड़े मिलते हैं। “हौसले की उड़ान” कहानी की सुमन पति के न रहने पर बेटी बिटटो के साथ ससुराल द्वारा ठुकरा दी जाती है। मायके में भाई-भाभी भी उसे आश्रय तो देते हैं, पर बोझ समझ कर। भैया-भाभी द्वारा इसी बोझ को उतारने के लिए प्रस्तावित विधुर व्यक्ति से दूसरे विवाह के लिए तैयार होती है। पर वर पक्ष बिटटो को अपनाने को तैयार नहीं। कहानी के कई डायलॉग मन को छूते हैं। जैसे भाभी के द्वारा समझाए जाने पर कि तुझे उस घर में कोई कमी नहीं होगी । सुमन कहती है कि, “सबसे बड़ी कमी तो मेरी बिटटो की होगी भाभी”। अंततः नायिका अपने ऊपर लगाए गए लांछनों की परवाह न करते हुए अपने सहृदय सहकर्मी से विवाह का फ़ैसला लेती है।

“सर्वे वाली” कहानी के कथ्य और लेखन में नयापन है। एक एनजीओ की तरफ से एक महिला सर्वे के लिए घर-घर जाती है। सर्वे का विषय है कि घर में महिलाओं के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है? मतलब उनकी शैक्षणिक, आर्थिक स्थिति कैसी है? और निकल कर आते हैं घरों के भीतर महिलाओं के दुर्व्यवहार के किस्से। जिनसे कोई वर्ग छूटा नहीं है। कुछ संवाद बड़े चुटीले बने है। जैसे एक वृद्ध महिला से यही पूछने पर वह कहती है, ‘अच्छा! लिखो… हम रोज अच्छा खाना खाते हैं, अच्छे कपड़े पहनते हैं” जब सर्वे वाली जोर देकर पूछती है तो वह कहती हैं कि, “अब इस उम्र में मुझ बुढ़िया से ये सब जानोगी। हम औरतों का क्या है, भगवान ने जो दिया है उसे में खुश रहना सीख जाते हैं” तथाकथित सफल महिलाओं का दुख अलग है, उन्हें सफलता मिलती है तो रिश्ते छूटे हैं। कहानी का ये अंश पढ़ते हुए मुझे बिंदिया पत्रिका का गीताश्री का संपादकीय याद आता रहा l जो शायद इस तरह था, “स्त्री के दोनों हाथों में लड्डू नहीं होते”

‘नया सवेरा” कहानी ‘लिव इन” के प्रति स्त्री को सचेत करती है। खुले जीवन की चाह में लड़कियां उस ओर बढ़ तो जाती हैं पर पितृसत्ता की गाँठे वहाँ अभी मौजूद हैं। ‘सजा’ में चेहरे से अनाकर्षक वृंदा की शादी चचेरी बहन शोभा को दिखाकर कर तो दी जाती है पर पति उसे स्वीकर नहीं करता और शोभा से फिर से विवाह करता है। पिता की गलती की सजा वृंदा भोगती है। कहानी का तेज घटनाक्रम वृंदा के अंदर पतिगृह से अलग होकर अपना जीवन जीने का साहस भरता है।

घर यानि समझौता नहीं सामंजस्य। “घर” और “नया सवेरा” दोनों कहानियों में माँ की भूमिका प्रमुख है। एक में वे सामंजस्य का पाठ पढ़ा छोटी-छोटी बातों पर बेटी का घर टूटने से बचाती है तो दूसरी में प्यार के नाम पर दिए जा रहे धोखे के दुष्परिणामों से।

अंत में यही कहूँगी कि, “अगर आप अपने फैसले खुद नहीं लेते तो कोई दूसरा आपके फैसले लेगा के भाव के साथ स्त्री जीवन की काशमकश को दर्शाती इन 15 छोटी कहानियों में अधिकांश कहानियाँ गृहशोभा, मुक्ता, सरिता, गृहलक्ष्मी आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। इनका एक बड़ा पाठक वर्ग है, जो अपनी चेतना पर कलम के हथौड़ों की छोटी-छोटी इबारतों से अपने जीवन के संघर्ष की एक नई गाथा लिखना सीख रहा है। ये हमारे गाँवों, कस्बों और छोटे शहरों की महिलायें हैं, जिनके बंधन इतने गहरे हैं कि उन्हें बार-बार अपने को खड़ा करना सीखना होता है। ये कहानियाँ निश्चित तौर पर उन्हें प्रेरित करेंगी।

कथानक की दृष्टि से भले ही कहानियाँ नई नहीं है पर इनकी जिरह और प्रस्तुति आकर्षित करती है। छोटे-चुटीले संवाद रेखा की कहानियों की विशेषता है, उम्मीद है कि इनकी मारक शक्ति उत्तरोत्तर बढ़ेगी। वही वाक्यों की क्रिया में प्रांतीयता की जगह मानक प्रयोग उचित रहेंगे ।

लेखिका का पहला कहानी संग्रह उनकी संभावनाओं को दर्शा रहा है अब उनकी आगे की सचेतन यात्रा देखने को उत्सुक हूँ।

बधाई और शुभकामनाएँ

वंदना बाजपेयी

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