*मोह* ( साहित्यिक उदाहरणो सहित गहन मीमांसा )





वंदना बाजपेयी 


कोई इल्तजा कोई बंदगी न क़ज़ा से हाथ छुड़ा सकी
किये आदमी ने कई जतन  मगर उसके काम न आ सकी
न कोई दवा न कोई दुआ ………………
                                                       यू  कहने को तो यह गीत की पंक्तियाँ  हैं पर इसके पीछे गहरा दर्शन है ………………मृत्यु  अवश्यम्भावी है ……………हम रोज देखते हैं पर समझते नहीं या समझना नहीं चाहते है ………….. मृत्यु  हर चीज की है|बड़े -बड़े  पर्वत समय के साथ   रेत  में बदल जाते है .|नदियाँ विलुप्त हो जाती हैं ,द्वीप गायब हो जाते हैं |सभ्यताएं नष्ट हो जाती हैं|किसी का आना किसी का जाना जीवन का क्रम है .परंतू मन किसी के जाने को सहन नहीं कर पता है .जाने वाला विरक्त भाव से चला जाता है ,कहीं और जैसे कुछ हुआ ही न हो बस समय का एक टुकड़ा था जो साथ -साथ जिया था |परंतू जो बच  जाता है उसकी पीड़ा असहनीय होती है ,ह्रदय चीत्कारता है ,स्मृतियाँ जीने नहीं देती ……..यह मोह है जो मन के दर्पण को धुंधला कर देता है |जो अप्राप्य को प्राप्त करने की आकांक्षा करने लगता है |


मोह ( साहित्यिक उदाहरणो  सहित गहन मीमांसा )


………….. दुर्गा शप्तशती में राजा  सुरथ जो  अपने अधीनस्थ कर्मचारियों द्वारा जंगल में भेजे जाने पर भी निरंतर अपने राज्य के बारे में चिंतन करते रहते हैं वो  विप्रवर मेधा के आश्रम में वैश्य को भी अपने सामान पीड़ा भोगते हुए पाते हैं जो पत्नी व् पुत्र के ठुकराए जाने पर भी निरंतर उन्हीं की चिंता करता है .वैश्य कहता है “हे महामते ,अपने बंधुओं के प्रति जो इस प्रकार मेरा चित्त प्रेम मगन  हो रहा है .इस बात को मैं जान कर भी नहीं जान पाता ,मैं उनके लिए लम्बी साँसे ले रहा हूँ जिनके मन में प्रेम का सर्वथा आभाव है .|. मेरा मन उनके प्रति निष्रठुर  क्यों नहीं हो पता? ऋषि समझाते हैं “मनुष्य ही नहीं पशु -पक्षी भी मोह से ग्रस्त हैं ….. जो स्वयं भूखे होने पर भी अपने शिशुओ की चोंच में दाना डालते हैं(दुर्गा शप्तशती -प्रथम अध्याय -श्लोक -५०)


यतो हि ज्ञानिनः सर्वे पशुपक्षिम्रिगाद्य :
ज्ञानं  च तन्मनुश्यांणा यत्तेषा मृगपक्षीणाम


.मोहग्रस्त शूरवीर निद्राजित अर्जुन के हाथ से धनुष छूटने लगता है वो कहते हैं “इस युद्ध  की इच्छा  वाले स्वजन समुदाय को देख कर मेरे अंग शिथिल हुए जाते हैं और मुख भी सूखा जाता है मेरे हाथ से धनुष गिरता है ,त्वचा जल रही है मेरा मन भ्रमित है मैं खड़ा रहने की अवस्था  में नहीं हूँ (गीता अध्याय -१ श्लोक ३० )

स्वयं प्रभु राम जो माता सीता से बहुत प्रेम करते हैं कि उनके अपहरण होने पर होश खो बैठते हैं ……दुःख में पशु -पक्षियों ,लता पत्रों से भी सीता का पता पूछते हैं (अरण्य कांड (२९ -४ )


“हे खग -मृग हरी मधुकर श्रेणी ,तुम देखि  सीता मृगनयनी
खंजन सुक कपोत मृग मीना ,मधुप निकर कोकिला प्रवीणा
वही स्वयं   बाली के वध पर उसकी पत्नी तारा को ईश्वर द्वारा निर्मित  माया का ज्ञान देते हैं …………….(किष्किन्धा कांड -चौपायी ११ -२ )
“तारा विकल देख रघुराया ,दीन्ह ज्ञान हर लीन्ही माया
चिति जल पावक गगन समीरा ,पञ्च रचित अति अधम शरीरा


प्रगट सो तन तव आगे सोवा ,जीव नित्य को लगी तुम रोवा
उपजा ज्ञान चरण तब लागी ,लीन्हेसी परम भागती वर मांगी
                                     उपनिषदों में में आत्मा के नित्य स्वरुप की व्यख्या करते हुए मोह को बार -बार जन्म लेने का कारण बताया है। यह मोह ही है जो समस्त पीड़ा का केंद्र बिंदु है ,जिसके चारों ओर प्राणी नाचता है। ……….
“साधकको शरीर और मोह की  की अनित्यता और अपनी आत्मा की नित्यता पर विचार करके इन अनित्य भोगो से सुख की आशा त्याग करके सदा अपने साथ रहने वाले नित्य सुखस्वरूप परमब्रह्म पुरुषोतम को प्राप्त करने का अभिलाषी बनना चाहिए (कठोपनिषद -अध्याय १ वल्ली दो श्लोक -१९ )


                                    परन्तु फिर भी ये प्राणी के बस में नहीं है,कि वो मोह को अपने वष में कर ले।
                                                         मोह एक ऐसा पर्दा है जो  ज्ञान ,विवेक पर आच्छादित हो जाता है जब देवता व् अवतारी ईश्वर भी इससे  नहीं बचे तो साधारण मनुष्य की क्या बिसात है | दरसल जब मनुष्य समाज में रहता है तो एक -दूसरे के प्रति शुभेक्षा या सद्भाव  और प्रेम होना होना स्वाभाविक है .|परन्तु मोह और प्रेम में अंतर है ……… मोह वहीँ उत्पन्न होता है  जहाँ प्रेम की पराकाष्ठा  हो जाये …………दशरथ का पुत्र प्रेम कब पुत्र मोह में परिवर्तित हो गया स्वयं दशरथ भी नहीं जान पाए ….और पुत्र के वियोग में तड़पते -तड़पते उन्होंने प्राण त्याग दिए ……………….. जहाँ प्रेम स्वाभाविक है वहीँ मोह घातक .|समझना ये है कि प्रेम आनन्द देता है मोह पल -पल पीड़ा को बढ़ाता  है ,जहाँ प्रतीक्षा है वहीँ तड़प है .|अगर हम हिंदी काव्य साहिय में बात करे तो  हरिवंश राय  बच्चन मोह वश  कहते हैं ………………….
तिमिर समुद्र कर सकी न पार नेत्र की तरी
 न कट सकी न घट सकी विरह घिरी विभावरी
कहाँ मनुष्य है जिसे कमी खली न प्यार की ………….
इसीलिए खड़ा रहा की तुम मुझे दुलार लो
इसीलिए खड़ा रहा की तुम मुझे पुकार लो …………


                            वही जब माया  का पर्दा हटता है तो वो खुद ही गा उठते है,जीवन -म्रत्यु ,प्रेम और मोह के अंतर को समझते हैं  …………..तो कह उठते हैं ……………..


अम्बर के आनन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गए फिर कहाँ मिले
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अम्बर शोक मनाता है
जो बीत गई सो बात गई


                                अपनी प्रिय पत्नी के वियोग पर   जय शंकर प्रसाद  का ह्रदय द्रवित हो जाता है। ………उनके   साथ की प्रेम की बाते जो आनद देती थी वही आज वियोग के दिनों में कष्ट देती हैं संयोग में जो सुखद था वियोग में वही दुखद स्मृतियों के रूप में परिलक्षित कहते हैं। …………घटना व्ही है दृष्टिकोण  बदल गया। …यहि पर्दा है यही माया है। …………… वो चीत्कार कर उठते हैं। …
“मादक थी मोहमयी थी मन बहलाने की क्रीड़ा
अब ह्रदय हिला देती है वह मधुर प्रेम की पीड़ा “
(जय शंकर प्रसाद …. आंसूं )
                                                         परन्तु जैसा कि होता आया है मोह “करो या मरो की स्तिथि में पहुंचा देता है” मोह  ग्रस्त प्राणी विषाद की एक स्तिथि के बाद  या तो तड़प -तड़प कर प्राणों का अंत कर देता है या सच्चे ज्ञान की तरफ भागता है.| प्रश्न उठते हैं ये जीवन। … “क्या ,क्यों ,किसलिए ” …… ऐसी ही मनोदशा में जयशंकर प्रसाद लिखते हैं। ………
“जीवन की लम्बी यात्रा में
खोये भी हैं मिल जाते
 जीवन है तो  कभी मिलन है
कट जाती दुःख की रातें
                                   यहाँ जीवन की लम्बी यात्रा का अर्थ ,अनंत जीवन से है जिसमे प्राणी बार -बार जन्मता और मृत्यु को प्राप्त होता रहता है। इस अनंत जीवन में हम बार -बार अपने परिचितों से मिलते है। …. जिनकी मृत्यु पर हम शोक करते हैं अगले जन्म में वो फिर साथ होते हैं। अनंत जीवन में एक जन्म मात्र समय का वो टुकड़ा है जिसे इस रूप में साथ गुज़ारा है।  इसी बात को श्री कृष्ण गीता में कहते हैं “हे अर्जुन ऐसा कौन सा समय था जब मैं नहीं था ,जब तुम नहीं थे, जब ये सारे के सारे लोग नहीं थे। …………
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृहाति नरोपराणि
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा
नन्यानि संयति नवानि देहि
                               मोह माया की वजह से उत्पन्न होता है ,ये मोह ही पीड़ा का कारण  है।  जब हम किसी एक व्यक्ति ,वस्तु ,स्थान से  जुड़े न रहकर समस्त प्राणियों में अपने स्व का विस्तार कर देंगे|तब प्रेम सीमित नहीं रह जाएगा। एक स्थान पर रुके हुए प्रेम में मोह का कीचड उत्पन्न  होने की सम्भावना समाप्त हो जाएगी  ……………. प्राणी मात्र हमारा अपना हो जायेगा। वैमनस्य ,ईर्ष्या ,द्वेष आदि दुर्गुण समाप्त हो जायेंगे और कबीर की अलमस्त झोली लिए गली -गली गाते घूमेंगे। …………….
कबीरा खड़ा बाजार में मांगे सबकी खैर
ना  काहू  से  दोस्ती  ना  काहू  से   बैर
                                                    मोह से छूटने का   केवल एक मात्र  उपाय यही है अपने में सबको ,या सबमें अपने को देखना…प्रेम को अपरिमित कर देना जिससे निज शोक की भावना हावी नहो सके।  उदहारण के तौर पर एक महिला के बारे में बताना चाहूंगी जिसने सुनामी में अपने तीनों बच्चों को अपने सामने बहते हुए देखा ,एक लाचार माँ काल के क्रूर हाथों से अपने बच्चों को बचा नहीं पायी।  उसके बाद जीवन था पर प्राण नहीं थे ,विषाद  की तड़प उसे तिल -तिल कर मार रही थी। अंततः उसने हिम्मत कसी और सुनामी में अनाथ हुए ३० बच्चों को गोद  लिया। धीरे -धीरे हर बच्चे में उसे अपने बच्चे नजर आने लगे।  निज शोक की पीड़ा कम हुई. वैसे  जीवन अनत यात्रा का एक हिस्सा है। ………………  अनवरत चले जा रहे हैं अंतिम बिंदु बौद्धित्व तक पहुचने के लिए। …………यही धयान यही ज्ञान श्रेष्ठ  है.………… अंत में महादेवी वर्मा जी के शब्दों के साथ। …………


                         चिर सजल आँखे उनींदी
                          आज कैसा व्यस्त बाना
                                                    जाग तुझको दूर जाना  ………………… 
      


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