अन्तराष्ट्रीय तम्बाकू निषेध दिवस पर विशेष : चाहिए बस एक स्नेह भरा हाथ

                    
                  
अन्तराष्ट्रीय तम्बाकू
निषेध दिवस पर विशेष
 चाहिए बस एक स्नेह भरा हाथ …….
टूट जाते हैं कुछ लोग 
सांसों के टूटने से पहले 
जब जीवन के
टीभते  दर्द के 
अनेक नाम ,अनेक रूप 
गढ़ लेते हैं 
अपनी सर्वमान्य परिभाषा 
निराशा “
कि  छोटे- बड़े रास्तों 
पगडंडियों से होते हुए 
अपनी समस्याओं का समाधान
खोजते
 
क्यों पहुँच जाते हैं 
एक ही जगह 
चौराहों की गुमटियों पर
जहाँ  
फूट जाती है कुछ आँखें 
आँखों के फूटने से पहले 
दिखती  ही नहीं 
साफ़ -साफ़ शब्दों में लिखी 
वैधानिक चेतावनी
कि  पैसे देकर 
खरीदते हैं “धीमी मौत
समय के साथ 
रगड़ते -घिसटते 
अतिशय पीड़ा झेलते 
जब तय कर देता है डॉक्टर एक
तारीख
आह ! दुर्भाग्य  
मर जाते हैं कुछ लोग
 मौत के आने से पहले 
 मैं जहाँ जा रही हूँ वहां मेरे साथ इस यात्रा में मेरी सहेली सुलेखा
है। विशाल प्रांगण से होते हुए ईमारत में अन्दर घुसने से ठीक पहले मैं  धडकते
दिल से मुख्य द्वार  पर लगा बोर्ड देखती हूँ
… “क ख ग कैंसर हॉस्पिटल
“। कैंसर
एक ऐसा
शब्द जिसको सुनकर भय के  अनगिनत केकड़े शरीर पर रेंगने लगते हैं । कैंसर जैसे जिंदगी
मृत्यु की तरफ रेंग -रेंग कर चल रही हो
,सब ख़त्म कर देने के लिए सब लील जाने के लिए । मैं सुलेखा का हाथ कस
कर पकड़ लेती हूँ । मैं आश्वस्त हो जाना चाहत हूँ की एक -दूसरे का साथ शायद उस पीड़ा
को कम कर दे जो एक शोध के लिए हम अन्दर देखने जा रहे हैं । हम एक बड़े से वार्ड में
प्रवेश करते हैं जहाँ मरीज ही मरीज हैं। …. तम्बाकू का दुष्परिणाम भोगते हुए
मरीज
……… या
अस्पताल की भाषा में कहें तो बेड संख्या । बेड नंबर -१ पर लेटा  मरीज बुरी तरह खांसता  है
,उसका दाहिना गाल फूल कर चार
गुना हो गया है लाल
,सडा ,पीब भरा | दर्द की टीस
 के साथ मरीज उलटी कर देता है …….. खून की उल्टी …. कैंसर की तीसरी
अवस्था ।दर्द की सिहरन के साथ सुलेखा को उबकाई   आती है  ।”नहीं
मैं और नहीं देख सकती कह कर सुलेखा मेरा हाथ छुडा  कर बाहर भाग जाती है ।
“जो सुलेखा से देखा नहीं जा रहा  है
वो कोई भोग  रहा है ।
                                          मैं आगे
बढती हूँ बेड नंबर -२।  ओपरेशन के बाद गाल सिल  दिया गया है  ।
मरीज ठीक हो गया है पर होठ
,गाल ,नाक एक विचित्र स्तिथि में
आ गए हैं बोलने में लडखडाहट है जो शायद पूरी उम्र रहेगी । बेड नंबर ३ व् चार की
असहनीय यंत्रणाओं को देखते हुए मेरी दृष्टि पड़ती है बेड नंबर -५ के मरीज पर… शांत
,निश्चेष्ट
,सफ़ेद कफ़न
ओढ़े । साथ में रोती -बिलखती २६ -२७ साल की स्त्री
,गोद में ६ माह का शिशु लिए । शायद पत्नी ही होगी ,और वह नन्हा  शिशु
उसका पुत्र
,जो
 पिता  शब्द सीखने से पहले ही  पिता के स्नेह से वंचित हो गया ।
वहीँ जमीन पर पसरी अपने जवान पुत्र की मौत पर मातम मनाती
बदहवास अर्धविक्षिप्त सी
माँ ।  हे विधाता ! एक साथ चार मौते …
,एक दिख रही है ,तीन दिख
नहीं रही । क्यों आखिर क्यों
? नशे की
दिशा भटके क़दमों के साथ  ये नशा लील लेता है इतनी सारी  जिंदगियाँ एक
साथ  । अनमयस्क सी मैं बाहर की तरफ भागती
हूँ ।
  
                                
बाहर खुली हवा में एक बेचैन कर देने वाली घुटन है । रह -रह कर बेड
नंबर १
,, ……… के मरीज मुझे याद आ रहे हैं
। शायद उनसे मेरा कोई रिश्ता नहीं है
……… या शायद उनसे मेरा बहुत घनिष्ठ रिश्ता है जो एक मनुष्य को दूसरे
मनुष्य से
,एक आत्मा
को दूसरी आत्मा से जोड़ता है ………. हमारे बीच मानवता का रिश्ता है । अनमयस्क
सी मैं चल पड़ती हूँ और मेरे साथ चल पड़ती हैं फूटपाथ पर कुकुरमुत्तों की तरह उगी
पान की गुमटियां और उस पर सजे  सिगरेट के पैकेट व् ख़ूबसूरती से लटकाये गए
तम्बाकू के गुटखे । जिन पर साफ़ -साफ़ लिखी वैधानिक् चेतावनी ” तम्बाकू
स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है  “मुझे मुंह चिढा रही है । जानते समझते
हुए भी बच्चे
,किशोर ,युवा और कुछ वृद्ध उसे खरीद
कर ले जा रहे हैं और साथ में खरीद कर ले जा रहे हैं …………. अतिशय पीड़ा
,एक धीमी मौत ।
        आज
 स्कूल में चार्ट कॉम्पटीशन है । विषय है “से नो टू  टुबैको “। कक्षा ३
,४ और ५ के ढेर सारे
 बच्चे चार्ट बना रहे हैं ।
  तरह -तरह
की आकृतियों  के बीच बड़ा -बड़ा लिखा है “से नो टू  टुबैको “। इनमें से किसी की प्रथम
पुरूस्कार मिलेगा
,किसी को
द्वितीय किसी को तृतीय । पर मैं खोज उन बच्चों को जो हार जायेंगे । आज की इस
प्रतियोगिता में नहीं । उम्र के किसी पड़ाव में
,किसी समय में किसी उलझन में “से नो टू  टुबैको ” कहने वाले बच्चे  ,एक सिगरेट का पैकेट या एक
तम्बाकू का गुटखा खरीद कर “से यस टू  टुबैको कहते हुए लील जायेंगे ……….तम्बाकू
नहीं
, ये सारे
चार्ट
,ये सारे
भाषण
,ये सारे
मार्च पास्ट…. और ये सारा उत्साह और धीरे -धीरे तब्दील होने लगेंगे बेड नंबर १
,,३ के मरीजों में ।  
                   हर वर्ष  अन्तराष्ट्रीय
तम्बाकू निषेध दिवस मनाया  जाता
  है । जोर -शोर से तम्बाकू
और उसके उत्पादों की खराबियाँ  बतायी जाती हैं । स्कूलों  में विशेष
कार्यक्रम होते हैं । सेमिनार्स होते हैं ।
 ज्यादातर सबको बचपन से ही रट  जाता है “कि
तम्बाकू धीरे धीरे सुरसा के मुंह की तरह पूरी दुनिया को लीलने को आमादा है | ४५०
ग्राम तम्बाकू में निकोटीन मात्रा लभग ६५ ग्राम होती है और  इसकी ६ ग्राम मात्रा से एक कुत्ता ३ मिनट में ही
मर जाता है|
भारत में किए गए अनुसंधानों से पता चला है कि गालों
में होने वाले कैंसर का मुख्य कारण खैनी अथवा जीभ के नीचे रखी जाने वाली
, चबाने वाली तम्बाकू है। इसी प्रकार गले के ऊपरी भाग में,
जीभ में और पीठ में होने वाला कैंसर बीड़ी पीने से होता है। सिगरेट
से गले के निचले भाग में कैंसर होता पाया जाता है
, इसी से
अंतड़ियों का भी कैंसर संभव हो जाता है।
तम्बाकू
का नियमित सेवन व्यक्ति को धीरे –धीरे मृत्यु के करीब ला देता है और वह असमय काल
कवलित हो जाता है |  मन में अजीब सा मंथन
है.
……आखिर
क्या है जो तमाम वैधानिक चेतावनियों ,जानकारी और 
हर साल मनाये जाने वाले “से नो टू टुबैको “वाले दिवस के बावजूद कुछ लोग उस
दिशा में बढ़ जाते हैं जो वर्जित क्षेत्र है |ज्यादातर तम्बाकू खाने की शुरुआत
किशोरावस्था या युवावस्था में ही होती है |जो उम्र ऊर्जा व उत्साह  से भरी होती है उसमें क्यों चुनते हैं कुछ लोग
धीमी मौत |क्यों बचपन से दब्बू सा बबलू 
जिसने जीवन में अब तक कभी  कौन से
जूते  खरीदने हैं  का भी निर्णय स्वयं से नहीं लिया चौदह साल की
उम्र में दोस्तों के कहने पर “अरे ये तो मुन्ना है ,छोटा बेबी ,दूध पीता बच्चा ,जा
माँ की गोद में खेल कहकर उकसाए जाने पर “दूसरों की नजर में खुद को बड़ा साबित करने
के लिए तम्बाकू खा लेता है |वही राहुल प्रेम में असफल हो जाने पर , रामरती पति की
असमय मृत्यु के बाद समाज से लड़ने की हिम्मत जुटाने के लिए ,सोमेश असफल विवाह के
बाद ,मयंक  बेरोजगारी से जूझते  हुए एक के बाद एक इंटरव्यू में असफल होने के
बाद तम्बाकू में अपने दुःख का समाधान ढूँढने लग जाते हैं |
                                  मानव मन भी कितनी विचित्रताओ से भरा
है |हर मन की समस्या अलग ,उसकी उलझन अलग ,उसकी 
मानसिक गुत्थी अलग | कितने लोग कितने दुःख कितने कारण पर इन सब के बीच एक
समानता है सब के सब निराश हैं …जीवन की किसी हार से किसी पराजय बोध से | पर सबने
एक ही समाधान खोजा है ……… तम्बाकू के छोटे –छोटे दानों में |जो कुछ क्षण के
लिए उनके अवसाद को दूर कर सके जीवन की निराशा से निकाल सके |ये सब निराश लोग  बुझते जीवन में आशा की चिंगारी जलाने के लिए उस
गाडी पर सवार हो जाते हैं जो उन्हें धीरे –धीरे चिता की ओर ले जाती है |इनमें से
कई हमारे प्रियजन हैं |मेरे मन में यह शास्वत प्रश्न है ……. आखिर  क्यों टूट गए ये लोग |सुख दुःख तो जीवन का
हिस्सा हैं |आशा –निराशा में दिन –रात की सी आंख मिचौली है |फिर पराजय बोध इतना
,इस कदर क्यों हावी हो गया की पढ़े लिखे लोग भी इस दिशा की तरफ बढ़ चले |
                           मुझे पता है, शायद सब को पता हो | जितने भी
नशीले पदार्थ  होते हैं,उन सब में एक गुण
अवश्य होता है ….. वो है बार –बार उनको खाने का मन जिसे हम आम भाषा में  एडिक्शन कहते हैं | अक्सर किशोरावस्था में
उत्सुकता वश या मित्रों के साथ इन पदार्थो का सेवन शुरू होता है फिर इसके नशे का
आनंद  आने लगता है। इसकी मात्रा बढ़ाई जाती
है। जो लोग बार-बार लोग इसका सेवन करते है
, उनका शरीर इस
मादक पदार्थ का आदी हो जाता है और फिर वह उसको छोड़ नहीं पाते। छोड़ने से कई
प्रकार के लक्षण जैसे- बेचैनी
, घबराहट होने
लगती है। इस कारण लोग इसके आदी हो जाते है
, उसी प्रकार
जैसे लोग शराब या अन्य पदार्थों के आदी हो जाते है और जब कोई किसी पदार्थ का आदि
हो जाए तो उसका नियमित सेवन उसकी बाध्यता हो जाती है
|फिर सब
कुछ जानते समझते हुए भी व्यक्ति अपने आप को उस नशे के चुंगल से मुक्त नहीं कर पाता
|मेरा मन व्यग्र है | काश की इन भटके हुए लोगों को वापस लाया जा सके | काश की
हमारे अपने प्रियजन इसके गंभीर परिणामों को न भुगते |काश की इस नशे का लती किसी का
भाई बेटा  पति अपने अंतिम दिन कैंसर
हॉस्पिटल में न  गुज़ारे | ख़ुशी की बात है
कि कुछ नशा मुक्ति केंद्र हैं जो बड़े ही प्यार से वैज्ञानिक तरीकों द्वारा इन
मासूमों को वापस सहज सरल जीवन में ले आते हैं | पर इसमें मरीज की संकल्प शक्ति का
बहुत योगदान होता है ,अन्यथा नशे की लत से निकलना संभव नहीं |यहाँ मैंने जानबूझ कर
मरीज शब्द प्रोयोग किया है ,क्योकि मेरे विचार से नशे के चुंगल में फंसने वाले सब
मरीज ही हैं ……….. मन के मरीज ,भावनाओं के मरीज ,कमजोर जिजीविषा के मरीज |
इनमें से कितने हैं जो नशा मुक्तिकेंद्र में जा कर अपनी संकल्प शक्ति जगा पाते
होंगे | शायद कुछ …. आंकड़े भी यही कहते हैं | बाकी के लिए कहीं न कहीं किसी न  किसी अस्पताल का बिस्तर तय हैं …..और तय है एक
दर्द भरी मौत | काश की इनके नशा करने के शुरूआती दिनों में ही इन्हें  इस काल कोठरी से वापस खींचा जा सके |
                 अगर समस्या है तो समाधान भी
अवश्य होगा | बेहतर हैं की नशे की आदत की शुरुआत ही न हो या हो गयी हो तो शुरू में
ही इसे सुधारा जा सके |पर कैसे ? किस तरह ? अपने प्रश्न का उत्तर खोजने मैं कमरे
में टहलने लगती हूँ |वहीं  मेरा  बारह वर्षीय बेटा नीद में कुनमुनाता है |मैं
स्नेह से उसके सर पर हाथ फेरती हूँ | बेटा गहरी नींद में है फिर भी मेरे हाथ फेरने
पर वो मुस्कुराता है |  गहरी नींद में भी
उसे अहसास होता है स्नेह का | सहसा मैं मुस्कुरा उठती हूँ ….. शायद यही मेरे
प्रश्न का उत्तर है | नींद की अपनी एक दुनिया है ,जैसे की नशे की अवस्था की एक
दुनिया हैं …… इस दुनिया के भीतर इस दुनिया से बिलकुल अलग | एक अहसास स्नेह का
,एक प्यार भरे हाथ का स्पर्श ,कुछ भावनाओं से भरे 
मीठे शब्द
| बस इतना ही जरूरी है…….. या शायद …इसी की
कमी है | कुछ प्रतिशत को छोड़ कर नशा करने वाला निराश व्यक्ति कहीं न कही खुद से
घृणा करने लग जाता है| कभी –कभी चाहते हुए भी नशा नहीं छोड़ पाता है ,असफल प्रयासों
से  उसकी मनहस्तिथि और कमजोर हो जाती है |
अगर उसी समय उसको परिवार से निरंतर ताने उलाहने मिलते हैं तो वो उस अपमान को फिर
नशे से ही भूलाने की कोशिश में लग जाता  हैं और  नशे की आदत छोड़ना और मुश्किल हो जाता है | पर ये
तस्वीर बदली जा सकती है जब ये कदम तम्बाकू –सिगरेट की तरफ उठ रहे हों तभी उनको
किन्ही दो स्नेह भरे हाथों का सहारा मिल जाए ,दो मीठे शब्द मिल जाए ,अपने वजूद का
हल्का सा अहसास मिल जाए तो इन  क़दमों को
वापस नशा मुक्त जीवन की तरफ मोड़ा जा सकता है |
                          अंत में बस इतना ही
कहना चाहूंगी कि नशा केवल एक व्यक्ति को नहीं खाता ,पूरे परिवार को खाता है | मेरे
विचार से जितना जरूरी है तम्बाकू के नशे को रोकने 
के लिए जन जागरण अभियान …….. ये चार्ट ,ये स्लोगन ,ये लेख ये
मार्चपास्ट हैं  उतना ही जरूरी है निराशा
,अवसाद या किसी  कारण से तम्बाकू की तरफ
मुड गए लोगों की नशा मुक्त सामान्य जीवन में  वापसी …….. तभी शायद कैंसर हॉस्पिटल के बेड
नंबर १ ,२ ,३ पर कोई यंत्रणा भोगता मरीज नहीं होगा ,बेड नंबर ५ के बगल में
रोती  हुई पत्नी नहीं होगी | ये हो सकता है
….जब स्नेह से भरे दो हाथ थाम लेंगे उन हाथों को जो बढ़ रहे हैं किसी गुटखे किसी
सिगरेट  की तरफ | हमारी आपकी और समस्त
मानवता की तभी जीत है जब कोई नशे के आदि दो हाथ गुटखा तम्बाकू दूसरी तरफ फेंक कर
कहेंगे ………..”नो टू टुबैको “ और गा उठेंगे ……….
कह दो कि न  पुकारे ,ये सर्द स्याह रातें
लौट आई हैं बहारे अब मेरे
गुलिस्तान में
एक कोशिश है ……… कर
के देखते हैं         
       

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