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संस्मरणात्मक आलेख ~आस्था का पर्व – अहोई अष्टमी



कुछ यादें अहोई अष्टमी की 


शरद पूर्णिमा की अमृतमयी खीर का आस्वादन करने के पश्चात् दांपत्य प्रेम में प्रेम के इंद्रधनुषी रंग भरने के लिए करवाचौथ ने घर की देहरी पर आहट कर आँगन में प्रवेश किया। उन रंगों में अभी विचरण कर ही रहे थे कि आस्था ओर विश्वास के, परिवार और संतान के कल्याण की कामना को अपने में समाये हुए “अहोई अष्टमी” के पर्व ने हमारे घर-आँगन में अपनी सुगंध बिखराई।


            स्मृतियों के संसार में प्रवेश करती हूँ तो एक बहुत सुखद अहसास मन में हिलोरें लेने लगता है। मेरी माँ को इन पर्व-त्योहारों में बहुत आस्था थी। वे बहुत मन से, पूरी निष्ठा से अपने त्योहारों को परंपरागत रूप में मनाया करती थी। आज की तरह हर चीज़ बाज़ार से लाने का तब चलन नहीं था। सब कुछ घर में बनाया जाता था। उनके इस बनाने के आयोजनों में मैं और पापा शामिल रहा करते थे। आज तो सब अहोई अष्टमी का कैलेंडर लाकर लगते हैं ताकि दीवारों के रंग-रोगन पर आँच न आए। पर तब दीवार पर गेरू से अहोई माता का चित्र बनाया करते थे। माँ के पास एक काग़ज़ पर पेन्सल से बना हुआ चित्र रखा रहता था। मैं उस दिन प्रसन्नता और उत्साह में अपने विद्यालय की छुट्टी कर दिया करती। बड़े मनोयोग से पहले पेन्सल से दीवार पर चित्र बनती, फिर गेरू से रंग भारती। पूरा बन जाने पर माँ-पापा से जो शाबाशी मिलती….वह मेरे लिए किसी अनमोल उपहार की तरह होती थी।


               माँ का उपवास होता था तो उस दिन शाम को मैं ही खाना बनाती। क्या-क्या सब्ज़ियाँ बनेंगी…यह सुबह ही निश्चित हो जाता था। आलू गोभी, कद्दू की सब्ज़ी, छोले, खीरे या बूंदी का रायता और पूरी। मुझे उस दिन खाना बनाने में बहुत आनंद आता। गुलगुले और मीठी मठरी माँ ही बनती। हर वर्ष चाँदी के दो मोती अहोई माता का माला  में डालती जिसे वे पूजा करते समय पहनती। हम तीनों बहन-भाइयों के लिए सूखे मेवों की माला बना कर पूजा के समय पहनाती थी।शाम को चार बजे के बाद माँ के साथ बैठ कर मैं और पापा अहोई अष्टमी की कथा सुनते। उसके बाद पापा ही माँ के लिए ज़्यादा दूध वाली चाय बनाते। हम सब तारों के निकलने की प्रतीक्षा करते रहते।




 जैसे ही तारा दिखाई देता तो मैं दौड़ कर माँ को सूचना देती….तारा निकल गया माँ! चलो अर्ध्य की तैयारी करो जल्दी। दीप जला,अहोई माता की पूजा कर, तारों को अर्ध्य देकर जब हम सब अंदर आते तब माँ के बनाए गुलगुले-मठरी एक धागे में पिरोये रहते। उसका एक छोर माँ और एक छोर पापा पकड़े रहते और माँ हमें आवाज़ लगाती….आओ बच्चों! गुलगुले-मठरी तोड़ लो….और हम तीनों बहन-भाई छीना-झपटी में लीन हो जाते। आज वो दृश्य जब मेरी आँखों के सम्मुख कल्पनाओं में आता है तो बरबस होंठों पर मुस्कराहट तैर जाती है। पड़ोस में अहोई अष्टमी का प्रसाद देने के बाद हम सब मिल कर खाना खाते हुए दिवाली की तैयारियों के बारे में बात करते रहते। जब तक हम बच्चे अपने-अपने पैरों पर खड़े नहीं हुए थे तब तक त्योहारों का एक अलग ही आनंद था। धीरे-धीरे पढ़ाई पूरी होने के बाद अपनी-अपनी नौकरियों में हम सब बाहर निकल गये, फिर विवाह हो गए, सबकी प्राथमिकताएँ बदल गयीं। 




बहुत मुश्किल से किसी त्योहार पर सब इकट्ठे हो पाते थे। ले-देकर माँ-पापा दोनों उसी निष्ठा, विश्वास, उत्साह से त्योहारों के रंगों को जीते रहे। अब ये सब बातें एक याद बन कर रह गयीं हैं। आज माँ-पापा दोनों नहि हैं। अब जब मैं इन त्योहारों को मनाती हूँ तो उसी उत्साह को जीने का प्रयत्न करती हूँ क्योंकि बेटी विवाह के बाद ससुराल में है और बेटा अपने बिज़नेस के कारण नोएडा में है। हम भी अब अधिकतर दो ही रह जाते हैं। यूँ बेटा कोशिश तो करता है की त्योहार के अवसर पर हमारे साथ रहे।


                परिवर्तन शाश्वत है। प्रकृति के उसी नियमके अनुसार सभी त्योहारों में भी परिवर्तन आया है। इस बदले हुए रूप में भी त्योहार आकर्षित तो करते ही हैं,आनंद और उल्लास भी मन को प्रसन्नता देते हैं। फ़िट रहने की प्रतिबद्धता में गुलगुले, मठरी, पूरी,हलवा आदि शगुन के रूप में ही बनते और कम ही खाए जाते हैं। शारीरिक श्रम कम होने के चलते यह प्रतिबद्धता भी आवश्यक लगती है। पहले फ़ोटो का इतना चलन नहीं था। फ़ोटोग्राफ़रों के यहाँ विचार बना कर जाते और एक- दो फ़ोटो खिंचवा कर आ जाते थे और यह भी बहुत महँगा सौदा लगता था। आज मोबाइल के कैमरों ने फ़ोटो खिंचना इतना सरल बना दिया है कि हम जीवन के मूल्यवान क्षणों को आसानी से सहेज कर रख सकते हैं। फ़ेसबुक पर लिख कर जब साथ में हम फ़ोटो भी पोस्ट करते हैं, व्हाट्सअप पर अपने मित्रों से शेयर करते हैं तो भी बहुत प्रसन्नता होती है।


             इस बदले हुए रूप में भी हमारे इन त्योहारों की अस्मिता बनी हुई है और बच्चे प्रयत्न करके जब किसी भी त्योहार पर आते हैं तो उस समय प्रसन्नता के रंग और गहरे हो जाते हैं। यही हमारे इन त्योहारों की सार्थकता है।


           पहले अहोई अष्टमी का व्रत बेटों वाली स्त्री ही करती थी। बेटियोंवाली स्त्री चाह कर भी यह व्रत नहीं रख पाती थी। रखने की बात कहते ही परंपराओं की दुहाई देकर उसे रोक दिया जाता था, पर अब समाज में परिवर्तन दिखाई देने लगा है। जब यह व्रत संतान की कल्याण की भावना से किया जाता है तो जिनकी बेटियाँ हैं वे भी अब इस व्रत को रख कर अहोई अष्टमी मनाने लगी हैं। स्वयं मेरी माँ ने मेरी छोटी भाभी को, जिनकी दो बेटियाँ हैं, यह व्रत रखवाया था। यह अलग बात है कि मेरी माँ के तारों के संसार में चले जाने के बाद उन्होंने यह व्रत रखना छोड़ दिया। आज जब बेटी-बेटे के भेदभाव से ऊपर उठ कर माएँ संतान के अच्छे स्वास्थ्य, दीर्घ आयु और कल्याण की कामना से अहोई अष्टमी का व्रत रखती और यह त्योहार मनाती हैं तो इन त्योहारों की सार्थकता और भी बढ़ जाती है।यह होना किसी भी समाज के लिए शुभ संकेत है।


डॉ . भारती वर्मा बौड़ाई 





फोटो जनसत्ता से साभार 


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