गुड़िया का ब्याह —

गुड़िया का ब्याह ---

बेटों के लिए मन्नत माँगी जाती है और बेटियाँ पैदा हो जाती हैं …अनचाही सी | इसीलिए तो माता -पिता जल्दी से जल्दी इस अनचाही संतान के हाथ पीले कर उसके बोझ से मुक्त होना चाह्ते हैं | कितना भी कहा जाए कि युग बदल गया पर आज भी ये हमारे गाँवों की सच्चाई है |ऐसी ही तो थी गुड़िया …कोमल नाजुक , परी सी पर जिसके सपने घर की खिडकियों को खोल आकाश में उड़ जाना चाहते थे | पर उसके सपनों में बाधक कोई और नहीं उसके खुद के माता पिता बने …

गुड़िया का ब्याह —

ईश्वर की कृपा से मेरे घर में शिक्षा दीक्षा पर कोई बाधा न थी ।माता पिता शिक्षक थे ,प्रिंसिपल हो कर रिटायर हुए ।घर में बड़ा सुखद वातावरण था हमारा परिवार शिक्षा और ललित कलाओं के प्रति घोर आस्था रखता था । हमें कभी कोई बन्धन महसूस ही नहीं हुआ ।परंतु यहां उन कन्याओं की बात हो रही है जो अत्यन्त मेधावी होते हुए भी कुछ न कर सकी उनके सपने बाल्यावस्था में ही चूर चूर कर दिए गए । इस संदर्भ में मेरे बचपन की एक घटना साझा करना चाहूंगी जो मुझे आज भी वही पीड़ा देती है जो उसने तब दी थी जब घटित हुई थी ।
मेरे माता पिता जी का तबादला सतना से सीधी का हुआ और हम वहां पहुंचे ।सीधी एम पी का कोटा सा गांव था तब ये साठ के दशक की बात है ।
दो चार दिनों में हम व्यवस्थित हुए और मेरा स्कूल जाना शुरू हो गया । मै छ ठी क्लास में थी ,मेरी सबसे दोस्ती हो जाती थी पर अंतरंगता किसी किसी से ही होती थी । गुड़िया मेरी क्लास में थी और हम पड़ोसी भी थे ।हमारे स्वभाव में बड़ी समानता थी ।वो भी पढ़ने में कुशाग्र ,मित भाषी और विनम्र थी ।बस हमारी दोस्ती पक्की होती गई  हम साथ ही होमवर्क करते, खाते पीते और खेलते थे । आर्थिक रूप से कुछ कमज़ोर थे गुड़िया  के घर वाले। मां बड़े स्नेह से मेरे साथ ही उसे खिला पिला देती ,शुरू में संकोच करती थी फिर शनै:शनै: वो हमारे घर की सदस्य ही बन गई थी। हम जाने कितने सपने देखते साझा करते ।वो डॉक्टर बनना चाहती थी और मै सिंगर मैं तो बन भी गई पर वो …….
अकस्मात कुछ ऐसा घटित हुआ के सब उलट पलट हो गया ।कई दिनों से गुड़िया का बाहर निकलना ही बन्द हो गया ।मैंने मिलना चाहा तो हर बार किसी न किसी बहाने से मिलने न दिया गया । मैं परेशान और चिंतित थी ,आखिर क्या हुआ है गुड़िया को ?
मां से पूछा वो बोली बेटा कुछ होगा तू पढ़ाई में मन लगा बेटा ।पर मां की उदासी से ये तो समझ गई कि कुछ तो है जो मां जानती है ।मेरा कहीं मन नहीं लगता था , मैं व्याकुल थी मेरा बाल मन छटपटा रहा था कैसे गुड़िया से मुलाकात हो जाए इसी फ़िराक में रहती थी।
एक दिन अवसर मिल ही गया वो घर पे अकेली थी  मैं पहुंच गई चुपके से देखा आंगन में सिल बटे में गुड़िया टमाटर की चटनी पीस रही है ।अरे ये क्या उसने तो साड़ी पहन रखी है ।उसका चेहरा मुरझाया हुआ था ।मैंने उसके पास बैठते हुए कहा अरे तू साड़ी में ,तेरी तबियत ठीक है न,स्कूल क्यों न आई ,मुझसे भी नहीं मिली इतने दिन से ,हुआ क्या है तुझे ?
गुड़िया ने भीगी पलकों से मुझे देखा ,पल भर को बिजली की तरह मुस्कान चमकी और लुप्त हो गई बोली — रंजू मै बिल्कुल ठीक हूं ,देख मैंने साड़ी पहनना सीख लिया है और घर के काम काज भी सीख गई हूं ।देख कितनी सुंदर साड़ी है 
मै बोली  अरे ये सब छोड़ इम्तिहान सर पर है कितना होमवर्क बढ़ गया है तेरे लिए चल साथ में करते है ।
गुड़िया — हां  ,मुझे तो सब पता है पर तुझे कुछ नहीं पता ।सुन कल मेरी सगाई होने वाली है और चार दिन में ब्याह ।तू आएगी न मुझे बिदा करने और वो फफक कर रो पड़ी ।मै स्तब्ध थी , बड़ी देर तक हम रोते रहे फिर मैंने कहा , गुड़िया तू मना कर दे ,विरोध कर तुझे तो डॉक्टर बनना है न मै मां पापा से कहूंगी तेरे बाबा को समझाएंगे ।उसने ज़ोर से मेरा हांथ पकड़ लिया बोली …. शांत हो जा सब कर चुकी हूं ,ये देख विरोध का परिणाम पल्लू हटा कर उसने पीठ पर बेंत से पड़े नीले निशानों को दिखाया और मेरी पीठ पर मैंने असहनीय दर्द महसूस किया ,जो आज भी कभी के ही महसूस करती हूं ।
उस रात मां के आंचल में सिमट कर सोई और खूब रोई । मां से पूछा ,मां आप लोग मेरे साथ ऐसा कभी नहीं करेंगे न?  वादा करिए । मेरे माता पिता ने वो वादा निभाया भी ।
वो रात भी आ गई जब मां के आंचल से लिपटी गुड़िया को जबरदस्ती खींचते हुए बलात डोली में डाल कर एक अधेड़ पुरुष के साथ विदा कर दिया गया ।गुड़िया का ब्याह हो गया उस दिन देश एक उम्दा डॉक्टर से वंचित रह गया । एक मासूम बच्ची के सपने को कुचल दिया गया ।और वही दूसरी बच्ची मैं अंदर से टूट गई ,मुझे सामान्य होने में वक्त लगा पर उस चोट के दाग़ अब भी हरे हो जाते है जब इक्कीसवीं सदी में भी इन घटनाओं की पुनरावृत्ति देखती हूं।
क्या आज भी कन्याएं मारी नहीं जा रही हैं ?
उनके सपने तोड़े नहीं जा रहे है ?
आज भी गुड़िया की अस्मिता को पद दलित नहीं किया जा रहा है ?
क्या हमारा समाज इन कुत्सित ,ओछी मानसिकता से पूर्णतः  मुक्त हो पाया है ?
क्या ये स्थिति हम बना सके हैं 
यत्र नर्यास्तू  पूज्यते
रमनते तत्र  देवता  
यदि आज भी नहीं तो कब ??
रंजना प्रकाश ,
दिल्ली ,द्वारका  
लेखक -रंजना प्रकाश
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