दरवाजा खोलो बाबा – साहित्य में बदलते पुरुष की दस्तक

 

“पिता जब माँ बनते हैं,

ममता की

नई परिभाषा गढ़ते हैं”

कविता क्या है? निबंध में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल कहते हैं कि, “जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की यह मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्ति की साधाना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है, उसे कविता कहते हैं।“

इस परिभाषा में हृदय की मुक्तवस्था सबसे जरूरी शब्द है | यूँ तो हमारे अवचेतन पर हमारे जीवन, देखे सुने कहे गए शब्द अंकित होते हैं इसलिए हर व्यक्ति एक खास कन्डीशनिंग से निर्मित होता है | परंतु साहित्य में हम अक्सर चीजों को एक दृष्टि से देखने के इतने आदि हो जाते हैं कि दूसरा पक्ष गौढ़ हो जाता है | इसका कारण तमाम तरह के वाद और विचार धाराएँ भी हैं और पत्र -पत्रिकारों में उससे  प्रभावित लेखन को मिलने वाली सहज स्वीकृति भी है |

पर क्या इतना आसान है एक लकीर खींच देना जिसके एक तरफ अच्छे लोग हं और दूसरी तरफ बुरे  | एक तरफ शोषक हों और दूसरी तरफ शोषित | मुझे उपासना जी की कहानी सर्वाइवल याद आ रही है जहाँ शोषित कब शोषक बन जाता है पता ही नहीं चलता| हब सब कहीं ना कहीं शोषक हैँ और कहीं ना कहीं शोषित |

 

हम मान  के चलते हैं कि खास तरह की पढ़ाई के लिए माता -पिता बच्चों पर दवाब बनाते हैं और संपत्ति के लिए बच्चे वृद्ध माता पिता का शोषण करते हैं | जबकि इसके विपरीत भी उदाहरण है | शिक्षा के लिए माँ -पिता से जबरदस्ती लोन लिवा कर  बच्चे ऐश करने में बर्बाद कर देते है | वृद्ध माता पिता अपने बच्चों  का इमोशनल शोषण भी करते है | पुरुषों द्वारा अधिकतर सताई गई है स्त्री पर कई बार शोषक के रूप में भी सामने आती है | कई बार खेल महीन होता है| वहीं पुरुष कई बार पिता के रूप में, भाई के रूप में, पति के रूप में स्त्री का सहायक भी होता है|

 

साहित्य में हर किसी के लिए जगह होनी चाहिए हर बदलाव दर्ज होना चाहिए तभी वो आज के समकाल का सही सही खाका खींच पाएगा |

 

ये सब सोचने-कहने का कारण डॉ.मोनिका शर्मा का नया कविता संग्रह “दरवाजा खोलो बाबा” है | निरंतर विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में अपने विचारोत्तेजक  लेखों द्वारा समाज को सोचने को विवश करती मोनिका जी अपने इस संग्रह में बदले हुए पुरुष को ले कर आई है | पिता, पति, भाई, पुत्र के रूप में स्त्री के जीवन में खुशियों के रंग घोलने, उनको विकास की जमीन देने और हमसफ़र बन कर साथ सहयोग देने में पुरुष की भूमिका पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए | खासकर तब जब वो बदलने की कोशिश कर रहा है |

दरवाजा खोलो बाबा – साहित्य में बदलते पुरुष की दस्तक

मोनिका शर्मा

“19 नवंबर” को मनाए जाने वाले “अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस” में घरेलू कामों में अपने द्वारा किये जाने वाले सहयोग का संज्ञान लेने  की माँग उठी है | ऐसे में साहित्य का इस दिशा में ध्यान ना जाना उचित नहीं |

मोनिका जी पुस्तक “दरवाजा खोलो बाबा” की भूमिका में लिखती हैं कि, “भावी जीवन की हर परिस्थिति से जूझने का साहस, बेटियों को अपने बाबा के आँगन से मिली सबसे अनमोल थाती होती है | आज के दौर में संवेदनशील भावों को जीते भाई जीवनसाथी  और बेटों से मिल स्नेह सम्मान, भरोसे और भावनाओं की इस विरासत को सहेजते प्रतीत होते हैं | यह वक्त की दरकार है की साझी कोशिशों और स्त्री पुरुष के भेद से परे मानवीय सरोकारों की उजास को सामाजिक -पारिवारिक परिवेश में सहज स्वीकार्यता मिले |

पूरे संग्रह चार खंडों में बँटा हुआ है जिसमें पिता, पिता -बेटी, पुरुष मन और प्रश्न हैं..

पिता खंड में उन त्यागों को रेखांकित किया है जो अपने बच्चों, घर -परिवार के लिए एक पुरुष करता है |

मुझे प्रेमचंद् जी का एक वाक्य का भाव याद आ रहा  है, “पिता मटर -पनीर है और माँ दूध-रोटी” थोड़ी देर भी ना मिले तो बच्चे व्याकुल हो जाते हैं | बात गलत भी नहीं है .. दरअसल पिता का त्याग अदृश्य  रहता है | बच्चों की जरूरतें माँ से पूरी होती रहतीं हैं, घर के बाहर पिता भी उस नींव की ईंट है इसका ध्यान कम ही जाता है | इसी पर ध्यान दिलाते हुए  मोनिका जी लिखती हैं..

“कमाने, जुटाने के चिर  स्थायी फेर ने

सारथी बन गृहस्थी का रथ खींचते

एक पुरुष को गढ़ा सनातन यात्री के रूप में”

 

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घर स्त्री से होता है पर उस घर को बनाने में पुरुष भी बहुत कुछ खोता है …

“किताबों के पल्ले  चढ़ते ही

तालों में बंद हो गए

समस्त रुचि रुझान

चिकना-चौरस आँगन पक्का होते ही

फिसल गए जीवन की मुट्ठी से

मैत्री बंध, मेल जोल के पल

चौखट -चौबारों की रंग रोगन की

साज धज के निर्मल निखार से

फीकी पड़ गईं मर्म की समस्त चाहनाएँ”

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दरवाजा खोलो बाबा

स्त्री के शोषक के रूप में दर्ज क्या पुरुष समाज की कन्डीशनिंग का शिकार नहीं है | क्या अपने को अच्छा पुत्र और अच्छा पिता साबित करने का भार उस पर नहीं है | संतुलन उसे भी बनाना है | महीन रस्सी उसके सामने भी है |

 

“बहुत सीमित -समवृत होता है

आकाश पिता की इच्छाओं का

माता -पिता का कर्तव्य पारायण बच्चा होने के

दायित्व बोध की धूरी से

अपने बच्चे के उत्तरदायित्वों के यक्ष तक सिमटा”

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“अपनी कविता “प्रवक्ता” में वो लिखती है..

आँगन के बीचों -बीच

हर बहस, हर विमर्श में

चुप रह जाने वाले पिता

देहरी के उस पार

बन जाते हैं  आवाज

घर के हर सदस्य की”

पिता -पुत्री खंड में पिता पुत्री के बदलते हुए रिश्तों की बात करती हैं | एक जमाना था जब पिता परिवार के सामने अपने बच्चों को प्यार नहीं करते थे, फिर एक उम्र के बड़ी  बेटियों से थोड़ी दूरी बनाते थे | विवाह के बाद अपनी मर्जी से मायके आने का हक बेटियों का नहीं रहता था | इस सब दिशाओं में आज बदले हुए पिता-पुत्री दिखते हैं | अब लड़कियाँ “बकी बरस भेज भैया को बाबुल सावन में लिजों बुलाए” नहीं गाती |अपनी मर्जी और हक से मायके जाती हैं | मोनिका जी अपनी कविता “चिट्ठी” में लिखती हैं..

“नियति परिधि के तयशुदा नियमों से कहीं दूर

अब मैं मन भर मिलूँगी तुमसे

झुर्रियों भरे हाथों को थामकर सुकूँन  पाने

विस्मृत हुआ बहुत कुछ याद करने और याद दिलाने

यात्रा करने आऊँगी बाबा”

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शीर्षक कविता “दरवाजा खोलो बाबा” में इसी बदलते पुरुष की दस्तक है | ये बदलाव पिता के रूप में सबसे पहले होता है | हालांकि  ससुर के रूप में अभी थोड़ा पीछे है|

बेटियों की अपेक्षाओं और उपेक्षाओं के

दुनियावी दस्तूर की पीड़ा से बचाने की ठानते ही

बदल गए नये जमाने के बाबा

अब पराई हुई बेटियों के लौट आने से

बरजते नहीं

लाडलियों का मन बाँचते, दर्द बांटते हैं”

खंड तीन -पुरुष मन

इस खंड में मोनिका जी उस समाज और कन्डीशनिंग की बात करती है  जिसने पुरुष की क्रूर  छवि बनाई | अगर देखा जाए तो सिमोन जब कहतीं हैं कि स्त्री पैदा नहीं होती बनाई जाती हैं | तो इसका उल्टा भी उतना ही सच है कि पुरुष बनाए जाते हैं | लड़के रो नहीं सकते, झगड़ सकते है, हाथ उठाया सकते हैं पर  उसे कमजोर दिखना नहीं है तक समाज द्वारा दिया गया रोल है | आज जेंडर रोल की बात होती है | जिसमें समाज की भूमिका है | आधी आबादी को क्रूर  दिखाए जाने के चलन पर भी बात होनी चाहिए | देखा जाए तो दोनों इन अवधारणाओं का दंड भोग रहे हैं | कविता “पुरुषत्व की अवधारणा” में मोनिका जी लिखती हैं …

“पुरुषत्व की अवधारणा

जाने क्यों

और कैसे गढ़ी गई

कि तमाम मानुषिक भावों के विचार से परे

प्रताड़ना का प्रतिमान बना

रच  दी गई बर्बर छवि आधे समाज की”

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आज बेटियाँ ही नहीं बेटे भी पराए हो जाते है, जब वो आजीविका कमाने घर द्वार छोड़ कर जाते हैं तो उन्हीं भी माँ का आँचल, पिता का दुलार वैसे ही याद आता है पर वो ऊपर से कठोर हो कई बार मायके को याद करती पत्नी को दिलासा देते हैं | पुरुषत्व की ये  अवधारणा ही सबसे पहले उनकी कोमलता छीनती है ..

“संबंधों की चौसर पर सदा

शंकित ही रहा उनका मन

और कर्तव्य की सलाइयों पर

स्वयं को बुनते उधेड़ते

घुटे दम के दम पर कमाते हुए धन

खो गया हृदय का स्पंदन “

 

चौथा  खंड -प्रश्न

इस खंड में मोनिका जी बहुत सही और सटीक प्रश्न उठाती हैं | ये प्रश्न आज की स्त्री के प्रश्न हैं | क्या बदलती स्त्री के साथ उतना बदल पाया है पुरुष, या पिता, भाई, पुत्र के रूप में बदला हुआ पुरुष जीवनसाथी के रूप में भी बदला है? क्या स्त्री विमर्श -पुरुष विमर्श के स्थान पर सम्मिलित विमर्श नहीं होना चाहिए?

“बदल रही स्त्री के

बदलते मन को समझने के लिए

अपना संशोधित संस्करण कब लाओगे तुम”

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जीवन की रणभूमि में

 पौरुषिक अहंकार के

पैने  हथियारों का बोझ उठाए रखने के फेर में

भुला ही बैठे

कि एक -दूजे से नहीं लड़ना था यह युद्ध”

 

अंत में यही कहूँगी कि श्वेतवर्णा प्रकाशन से प्रकाशित मोनिका शर्मा जी के संग्रह “दरवाजा खोलो बाबा” की 103 पृष्ठों में समाहित करीब 64 कविताएँ नए तेवर की हैं| बदलते हुए पुरुष को देखने का नया नजरिया प्रस्तुत करती हैँ | घर -परिवार के लिए पुरुष द्वारा किये गए त्याग  को रेखांकित करती हैँ, समाज को समता  मूलक बनाने पर जोर देती हैं | वहीं बदलती हुई स्त्री के बदलते सपनों और संभावनाओं के साझीदार बनने का अहवाहन भी करती हैँ | शिल्प के घट -जोड़ में बिना पड़े हुए सरल -सहज भाषा में लिखी ये कविताएँ कशी हुई हैं और मन को छूती है, भाव बोध को जागृत करती हैं | एक नए दृष्टिकोण के साथ “दरवाजा खोलो बाबा” के लिए साहित्य और समाज  का दरवाजा खुलना ही चाहिए |

बहुत बहुत शुभकामनाएँ

वंदना बाजपेयी

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