एक क़दम बढ़ा पर्यावरण संरक्षण की ओर…..

 

पर्यावरण सुधार ले,पहला क़दम उठाय,
घर का कचरा छाँट कर,अलगअलग निपटाय।

दिल्ली के गाज़ीपुर के कूड़े के पहाड़ और जगह जगह कूड़े कचरे के ढ़ेर देख कर मैं हमेशा एक सोच में पड़ जाती थी कि कूड़े के निपटान के सही तरीके हम क्यों नहीं अपनाते। पर्यावरण सुरक्षा के प्रति हम क्यों सचेत नहीं रहते।इंदौर शहर भारत का सबसे स्वच्छ शहर है तो बाकी लोग यह क्यों नहीं कर सकते।मेरी मित्र शशि अग्रवाल पर्यावरण के प्रति बहुत सजग है। उन्होने रसोई के गीले कूड़े से कामपोस्ट बनानी शुरू की थी और औरौं को भी प्रेरित किया था। जल्दी ही मैं उनकी मुहिम से जुड़ गई साथ ही पॉलीथीन व प्लास्टिक का कम से कम उपयोग करने की कोशिश करने लगी।

प्लास्टिक थर्माकोल को ,रिसाइकिल को भेज,
कामपोस्ट घर में बना, लौटे धरती तेज।

 

 

दिल्ली मेंं IPCA नाम की कंपनी प्लास्टिक रीसायकिल करने का काम करती है हम लोगों ने अपना हर तरह का प्लास्टिक कचरा उन्हे देना शुरू किया।उनकी गाड़ी हमारे इलाके में सप्ताह में एक बार आती है और हम उन्हे सब पैकिंग मटीरियल थर्माकोल वगैरह दे देते हैं। इस तरह हमारे घरों निकलने वाले कूड़े मे 99% कमी आई है और अपने गमलों के लिये अपनी आवशयकता से अधिक काम्पेस्ट मिलने लगी।

काग़ज़ अरु अख़बार सब ,फेरी वाला लेय
उसके ,बदले वह तुझे ,पैसे दुइ दे देय।

 

सामूहिक रूप से काम्पोस्ट बनाने और प्लास्टिक रीसाइकिल को देने की दो मुहिम लेकर हमने काम आरंभ किया था।प्लास्टिक का कचरा अलग करके देने केे लिये 25,30 परिवार साथ आये परन्तु व्यक्तिगत रूप से काम्पोस्ट बनाने को कोई तैयार नहीं हुआ। किसी ने सहयोग नहीं दिया। मैनेजमैंट कमैटी को IPCA की पहल के बारे में शशि अग्रवाल ने अवगत करवाया पर वहाँ से कोई सहयोग नहीं मिला,जबकि IPCAने ऐरोकाम्पोस्टर निशुल्क देने का प्रस्ताव दिया था।

डायपर और पैड को,अलग बाँधियो मान,
लपेटियो अख़बार में,रखना उनका ध्यान।

एक साल ऐसे ही चलता रहा। हम लोग लगे रहे। मैनेजमैंट बदला हमने फिर मुद्दा उठाया तो यह काम हम ही को करने के लिये कह दिया गया और सहयोग देने की बात कही गई। हमें भी अनुभव नहीं था। हमने सफ़ाई कर्मचारियों को राज़ी किया। 50 लिटर के 3 बिन हम ख़ुद ले आये। सोचा था कि इनमें काम्पोस्ट बनेगी पर वो तो एक दिन में ही भर गये कुछ कूड़ा छंटा हुआ आ रहा था बाकी सफाई कर्मचारी छाँट रहे थे। हम अपनी कोशिश में लगे रहे कि हमे कूड़ा छंटा हुआ मिलता रहे।आँशिक रूप से हमें सफलता भी मिली और मैनेजमैंट का सहयोग भी मिला।अब हमने एक पिट मेंं गीला कूड़ा डालना शुरू किया और अब तक हमारे दो पिट भरकर मिट्टी से समतल किये जा चुके हैं।

 

घर के कूड़े का किया, अगर सही निपटान,
कूड़े के पहाड़ का, ना होगा निर्मान।

पिछले वर्ष के अंत में दिल्ली नगर निगम ने कुछ इलाकों को नामांंकित किया जिन्हे कूड़े के निपटान का प्रबंध स्वयं करना था। रसोई के गीले कूड़े से काम्पोस्ट बनानी थी और बाकी सूखा कूड़ा उठाने के लिये किसी एजैंसी से अनुबंध करना था।इन इलाकों में हमारा इलाका भी शामिल था।पहले किसी ने ध्यान नहीं दिया जब निर्धारित समय सीमा समाप्त हो गई तब नगर निगम ने नोटिस भेजे और जुर्माने का मुतालबा भी किया।

अचानक सब सोसायटी सकते में आ गईं और मेयर तथा अन्य अधिकारियों से मैनेजमैंट के अध्यक्ष मिले। हम तो आँशिक रूप से ही सही इस काम में पहले से ही लगे हुए थे,फिर भी अब शत प्रतिशत लोगों की भागेदारी होना अनिवार्य था,जो बहुत आसान नहीं था।

हमारी सोसयटी ने IPCA से ही अनुबंध किया जो पहले से हमारा प्लास्टिक पॉलीथीन रीसाइक्लिंग के लिये ले रहे थे।IPCA ने हमारी सोसायटी में दो ऐरोकाम्पोस्टर बिन लगा दिये हैं और जो कूड़ा काम्पोस्ट में नहीं जा सकता वो वह प्रतिदिन उठाते है।

एक अकेला चल पड़ा,जुड़ जायेंगे लोग,
काम नही मुश्किल ज़रा, मिल जाये सहयोग।

 

अब हमे सोसायटी के हर सदस्य को कूड़ा छँटनी करके देने के लिये तैयार करना था। कई नोटिस लगाये सरकुलर घुमाये, व्हाटस्अप मैसेज किये तो काफ़ी हद तक कूड़ा घरों से छँटकर आने लगा। कुछ लोगों को फिर भी समझ नहीं आ रहा था कि अब यह अनिवार्य है, बचने का कोई विकल्प उनके पास नहीं है।ऐसे लोगों को उनके घरों में जाकर समझाया तो इस काम में सफलता मिली।

अपने सफ़ाई कर्मचारियों को भी कूड़ा लेते समय और काम्पोस्टर में डालने का प्रशिक्षण दिया गया। बचा हुआ कूड़ा बड़े बडे बोरों में बाँधकर रखा जाता है जिसे lPCA छंटाई करके, रीसायकिल करके उपयोगी चीज़े बनाती है।अब सब संभल गया है पर अचानक कोई समस्या आजाती है तो मिल बैठ कर सुलझा लेते हैं पर हमारा ज़रा सा भी कूड़ा किसी कूड़े के ढ़लाव पर नहीं जाता।

सोसायटी का मैनेजमैंट अब पूूूरी तरह साथ है।सफ़ाई कर्मचारी भी मेेेेहनत से काम कर रहेें है।सबका शुक्रिया।

हमने कदम बढ़ा दिये आप आइये साथ,
नेक काज है ये बहुत, मिलते जाय हाथ।

बीनू  भटनागर

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