वंदना बाजपेयी के मुक्तक

 

मुक्तक छंद विधा में एक लोकप्रिय विधा है ।

मुक्तक का शब्दार्थ ही है ’अन्यैः मुक्तमं इति मुक्तकं’ अर्थात जो अन्य श्लोकों या अंशों से मुक्त या स्वतंत्र हो उसे मुक्तक कहते हैं. अन्य छन्दों, पदों से प्रसंगों के परस्पर निरपेक्ष होने के साथ-साथ जिस काव्यांश को पढने से पाठक के अंतःकरण में रस-सलिला प्रवाहित हो वही मुक्तक है-

 ’मुक्त्मन्यें नालिंगितम…. पूर्वापरनिरपेक्षाणि हि येन रसचर्वणा क्रियते तदैव मुक्तकं

’’मुक्तक’ वह स्वच्छंद रचना है जिसके रस का उद्रेक करने के लिए अनुबंध की आवश्यकता नहीं। वास्तव में मुक्तक काव्य का महत्त्वपूर्ण रूप है, जिसमें काव्यकार प्रत्येक छंद में ऐसे स्वतंत्र भावों की सृष्टि करता है, जो अपने आप में पूर्ण होते हैं। मुक्तक काव्य या कविता का वह प्रकार है जिसमें प्रबन्धकीयता न हो। इसमें एक छन्द में कथित बात का दूसरे छन्द में कही गयी बात से कोई सम्बन्ध या तारतम्य होना आवश्यक नहीं है। कबीर एवं रहीम के दोहे; मीराबाई के पद्य आदि सब मुक्तक रचनाएं हैं। हिन्दी के रीतिकाल में अधिकांश मुक्तक काव्यों की रचना हुई। इस परिभषा के अनुसार प्रबंध काव्यों से इतर प्रायः सभी रचनाएँ “मुक्तक“ के अंतर्गत आ जाती है !

आधुनिक युग में हिन्दी के आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसारः -‘मुक्तक एक चुना हुआ गुलदस्ता है ।

प्रस्तुत हैं वंदना बाजपेयी की मुक्तक 

स्मृतियों के अँध कूप में, यूँ गिरती क्यों, घबराती क्यों ?

लौटेंगे न फिर जो लम्हे उन्हें बीन ले आती क्यों ?

सुख- बोध यायावर साथी, थामें दुख मानस देहरी

समय वीथियों की उलझन में नाहक आज गँवाती क्यों?

 

भाव सिंचित कर निलय ने अनुस्मरण के कोष खोले
दीप्त हो जल बिंदुओं से मौन पीड़ा नेत्र बोले
है छुड़ाती हाथ जब निष्ठुर समय की तीव्र धारा
उर नगर में आन खिलते काल कवलित बीज हौले
मन सुरों को साधने में जब निपुणता आएगी
जिंदगी तू काफ़िये से इक गज़ल बन जाएगी
एक सी लगने लगेगी गम-खुशी की संगतें
‘वंदना’ मन बीच रब की रोशिनी तब पाएगी
क़ाफूर होंगें गम ख़ुशियों की बयार में
ये एक भ्रम तो था तुम्हारे इंतज़ार में
अच्छा किया उम्मीद की ठुकराई अर्जियां
खुद ही जुटाये हौसले फिर जग बज़ार में
वंदना बाजपेयी
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