पिघली हुई लड़की – मन पर गहरी छाप छोडती संवेदनशील कहानियाँ

 

 

राजपाल प्रकाशन से प्रकाशित  आकांक्षा पारे का नये कहानी संग्रह  “पिघली हुई लड़की” की कहानियाँ कहीं  आम जनजीवन की छोटी –बड़ी घटनाओं को बारीकी से उकेर देती हैं तो कहीं कहीं भ्रष्ट सरकारी तंत्र पर प्रहार करती हैं तो कहीं रेप विक्टिम और एसिड एटैक के दर्द से जूझ रही लड़की के प्रति गहरी संवेदना से भर देती हैं | पाठक को अति गंभीरता से बचाने के लिए नीम –हकीम और हर शाख को हरियाली का हक़ है जैसी हल्की फुल्की  कहानियाँ भी संग्रह का हिस्सा बनती हैं जो पाथाक्कों को ब्रीदिंग स्पेस की तरह महसूस होती हैं | पत्रकार और सशक्त कथकार आकांक्षा पारे जी की लेखनी किसी परिचय की मोहताज़ नहीं हैं | विभिन्न पत्र –पत्रिकाओं में उनकी कहानियाँ छपती ही रहती हैं | ऑनलाइन भी उनकी कहानियाँ उपलब्द्ध हैं और कई महत्वपूर्ण सम्मानों से उन्हें नवाजा जा चुका है |  उनकी कहानी शिफ्ट, कंटोल, ऑल्ट = डिलीट को हंस कथा सम्मान व् उनके कहानी संग्रह ‘बहत्तर धड़कने तिहत्तर  अरमान’ को कृष्ण प्रताप कथा सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है |

 

मैंने हमेशा पाया है कि आकांक्षा जी के लेखन में  कुछ खास बात है जो पाठक अपनी तरफ खींच लेती है | ये बात है सहजता से गंभीर से गंभीर बात कह देना | वो बड़े कठोर व् क्लिष्ट शब्दों के आडम्बर में नहीं पड़ती न ही गैर जरूरी व्याख्यानों में पाठकों को उलझाती हैं |  ह्रदय में उतर जाने वाली आम बोलचाल की भाषा पर उनकी गहरी पकड है |  उनकी कहानियाँ बहुत बड़ी नहीं होतीं पर बहुत जरूरी होती हैं | वो सहजता से आस –पास के दृश्यों से साम्य बनाते हुए चलती हैं और सतह पर ना रह कर मन की गहराई में उतरती चली जाती हैं | उनकी कहानियों से उनके विशद ज्ञान और आस –पास के माहौल के सूक्ष्म निरीक्षण  का पता चलता है | उनका ऑब्जरवेशन बहुत तगड़ा है और छोटी से छोटी घटना उनके मानस  पटल पर अपने फुट प्रिंट के साथ अंकित हो जाती हैं | कहानी लिखते समय एक पत्रकार और कहानीकार का अद्भुत सामंजस्य देखने को मिलता है | वो स्वयं कहती हैं कि कहानी पर सच्ची घटना का मुल्लमा चढ़ते ही कहानी झूठी  हो जाती है | तो यूँ समझ लीजिये कि ये एक सच्ची घटना पर झूठी कहानी है | अगर कहानीकार के पास कल्पना ही ना हो तो वो किस बात का कहानीकार …|”इस संग्रह में सच्ची घटनाओं को अपनी कल्पना से मांज कर कहानी लिखने वाला उनका अंत: कहानीकार रूप निखर कर सामने आया है |

पिघली हुई लड़की – मन पर गहरी छाप छोडती संवेदनशील कहानियाँ

सबसे पहले मैं बात करना चाहूंगी कहानी ‘सुरक्षा चक्र” की | ये कहानी अपनी तरह की अनोखी कहानी है | इस कहानी का नरेटिव आत्माएं हैं | ये बात अपने आप में सिहरन उत्पन्न कर देती है | आखिर क्या दर्द था कि आत्माओं को अपनी कथा कहनी पड़ी | ये दर्द था स्त्री की देह में जन्म लेना | इंसान से ज्यादा उन्हें बस देह समझे जाना | ये  आत्माएं स्त्री देह होने का दंड भोगती  लड़कियों की आत्माएं हैं  | ये सभी आत्माएं  अपने जीवन काल में रेप विक्टिम रही हैं | कहते हैं आत्मा को दर्द नहीं होता पर शरीर से मुक्त इन आत्माओं पर भी दर्द की गहरी खिंची हुई लकीरे हैं |

कहानी की शुरुआत संस्कृत के परसिद्ध श्लोक से होती है …” नैनं छिन्दन्ति ..” से होती है | जिसे शस्त्र  काट नहीं सकते, आग जला नहीं सकती वो आत्माएं भी एक दूसरे के आँसुओं से भीग रही हैं | वो  उस लोक से भी अपने लिए न्याय की गुहार कर रही हैं | कहानी लिखने का काल निर्भया का है और कहानी नाटक शैली में लिखी गयी है | आत्माओं को उम्मीद है कि निर्भया  के प्रति जन मानस  में जगी संवेदनाएं स्त्री के प्रति होने वाले यौन अपराधों को रोकेंगी | कुछ ठोस निर्णय होंगे, कुछ ठोस कानून बनेंगे पर आशा के विपरीत शिकार लड़कियों की संख्या बढती ही जा रही हैं | किसी का अपराधी ममेरा भाई था | भाई होने की वजह से बस इतना रहम हुआ कि वो दोस्तों को नहीं लाया, अकेले ही काम तमाम कर दिया | एक स्त्री के घर घुसकर ठाकुरों ने.. तेरहवीं के बाद ही पति के दूसरे विवाह की बातें शुरू हो गयीं | दिक्कत तो तब होती जब वो जीवित रह जाती | इन पंक्तियों में कितना दर्द है …

“हम औरतें नहीं, बस योनि है | हम बाजार में खड़ी हैं तो भी बदनाम और बाज़ार में घसीट दी जाएँ तो भी | बदनामी हमारी नियति है |”

 

 

आकांक्षा जी पाठक के मन में गहरी संवेदना जगाने के साथ –साथ निर्भया  के नाम पर एक जुट हुए विरोध प्रदर्शन  कर रहे लोगों के समूहों के चेहरे  से एक –एक कर नकाब खींचती चलती है ….और सामने आता है सच का विद्रूप चेहरा | कोई उस पीड़ित स्त्री के के लिए नहीं लड़ रहा | पुलिस के लिए ये नया ‘मामला ‘है | सब इस ‘मामले’ में अपने –अपने निज स्वार्थ के लिए झंडा लेकर अपने –अपने शिकार ढूंढ रहे  हैं | शिकार ..सत्ता के, नंबरों  की सफलता के , सम्मान के | एक गरीब विक्टिम की गन्दी गलियों में अपनी कार से उतर कर जाने से इंकार करने वाली स्वयंसेवी संस्था की महिला उसकी माँ को सालाना  फंक्शन में आमंत्रित करना चाहती है ताकि उसका कद कुछ ऊंचा हो सके | कुछ विद्यार्थियों का एजेंडा इस ‘मामले’ में विरोध कर रहे अपने शिक्षक को चेहरा दिखाना भर है | तो कुछ अपनी विचारधारा के प्रति इतने आसक्त हैं कि दूसरी विचारधारा वालों की लड़कियों के विरोध प्रदर्शन में जाना ही नहीं चाहते | विचारधारा की ताकत दिखाने का इससे बेहतर अवसर क्या होगा ? कोई साइलेंट जलूस निकाल कर इस ‘हॉट टॉपिक’ के बहाने वीमेन कमिशन की अध्यक्ष को घेरने की जुगत में है | इनमें वो महिलाएं भी हैं जो बॉय फ्रेंड के साथ बस  में चढ़ी लड़की को भी दोषी मान रहीं हैं | ऐसी भी जो साड़ी पहनने वाली और मासूम बच्चियों के केस को दरकिनार करके महिलाओं के कपड़ों पर दोष की अँगुली रख देने पर आमादा है | ये सब पढने के बाद पाठक  एक गहरी वेदना से जूझता है |

 

आत्माओं के माध्यम से कुछ सुझाव आकांक्षा जी सुझाती हैं पर अंत प्रश्नों की एक नुकीली कील मानस  पर ठोंक देता है | इस कहानी का मुकम्मल अंत भी कई प्रश्नों को  उठाता है | ये सभी प्रश्न बहुत जरूरी है | आज स्त्री सुरक्षा  एक गंभीर विषय है |स्त्री कब तक सड़क पर चौराहे पर , खेत में खलिहान में पुरुष की वासना की  शिकार होती रहेगी | बाहर के अपराधियों से तो बच जाए पर घर में छुपे भेडीयों से कैसे बचेगी | सुरक्षा के तमाम उपाय  घर में विश्वास जीते पुरुषों के बीच कहाँ काम आते हैं | वो जो अपने बन कर वार करते हैं उनका क्या किया जाए ? हमें इस विषय पर गंभीर मंथन करना ही होगा |एक बेहद ही संवेदनशील, सुलझी हुई गंभीर कहानी | जिसको पढने बके बाद देर तक सीने में कुछ गडा  हुआ लगता रहेगा |

 

“ ठेकेदार की आत्मकथा” हमारे देश के भ्रस्टाचार के सिस्टम पर प्रहार करती है | कहानी का नायक अमेरिका में पढ़ा उच्च शिक्षित नौजवान है | जो अपने दोस्तों के समझाने के बावजूद अपने देश भारत में काम करना चाहता है | इसके लिए वो एक प्लांट  लगाता है उसमें करोणों की मशीनें लगवाता है | उसका टेंडर पास होते ही वो रेलवे का ठेकेदार बन जाता है | लेखिका साफ़ करती है कि कांट्रेक्टर नहीं ठेकेदार | यानि कि इज्ज़त में पलीता लगाना | जो काम सरकारी अफसरों को बखूबी आता है | विभाग में आते ही  शुरू होती है रस्सा –कसी  और  छोटे साहब से  लेकर बड़े साहब को खुश रखने का जो भ्रष्ट तंत्र है आकांक्षा उसकी तुरपन खोलती चलती हैं | पूरे सिस्टम में सबके कमीशन बंधे हुए हैं | सबको खुश करना टेढ़ी खीर है | छोटे साहब को खुश किये बिना या उनकी अनुमति के बिना बड़े साहब से मिलने चले जाओ तो चढ़ावा बढ़ जाता है | सबको ना जाने किन दिव्य यंत्रों से पता चल जाता है कि वो कहाँ गया किसी मिला, क्या बात की | भ्रष्ट तंत्र में इन मुखबिरों की भी कुछ कमाई होती ही होगी |  ठेकेदार से बात करने की सबकी भाषा अभद्र है | विरोध करने की कोई गुंजाइश नहीं | जरा सी जुबान खुली नहीं कि लाखों के बिल रोक दिए जाते हैं | इन सब से ऊपर यूनियन लीडर, और सांध्य दैनिक वाले  जो रातों –रात उसके खिलाफ बेवजह आरोपों की  खबर छाप कर उसे अपनी जेब ढीली कर देने पर विवश कर देते हैं | जिन लोगों के परिवार सरकारी नौकरी से जुड़े हैं उन्हें इस भ्रष्ट  कुछ –कुछ भनक जरूर होगी | पर ये सिस्टम ऐसा है की कोई एक उससे निकल भी नहीं सकता | बहरहाल इस कहानी को पढने के बाद पाठक सर पकड कर जरूर बुद्बुदायेगा, “हे ईश्वर ! मेरे देश को इस भ्रष्टतंत्र से बचा लो |” इस कहानी की खास बात ये है कि एक स्त्री ने इस कहानी को लिखा है और पूरी संजीदगी के साथ लिखा है |

 

नीम-हकीम’ कहानी मजेदार है जो पुराने घरेलु नुस्खे बताने वालों के धंधे-पानी पर प्रहार करते यू ट्यूब चैनल और व्हाट्स एपिया  ज्ञान को बहुत ही रोचक अंदाज में प्रस्तुत करती है | दादी माँ की सलाह भी अब कौन सुनता है, जब वैध का बेटा ही अपने पिता की डायरी से चुरा चुरा कर यू ट्यूब पर ज्ञान बाँट रहा है | इस कहानी में आकांक्षा जी ने इतने घरेलु नुस्खे बताये हैं कि कई पर पाठक जरूर अटकेंगे …अच्छा ये भी तरीका है… कर के देखते हैं |अब नुस्खो से प्यार वाली भारतीय मानसिकता से इनकार तो नहीं कर सकती ना !! |

संग्रह की पहली कहानी “कुछ इश्क था, कुछ हम थे और कुछ थी यायावरी” अपने पिता के प्रति गलत धारणा  के कारण नफरत पाले रखने वाले एक पुत्र की कहानी है | इस नफरत  के कारण उसकी जिन्दगी में बहुत से बदलाव आते हैं और जीवन की धरती प्रेम सुधा से वंचित शुष्क रेगिस्तान में बदलने लगती है | ये कहानी मनोवैज्ञानिक पहलुओं को उजागर करती है | “एम ई एक्सप्रेस” अकेलेपन से जूझते बुजुर्गों की कहानी है जिसे बिलकुल नए अंदाज में प्रस्तुत किया गया है | ये कहानी अकेलेपन से जूझते बुजुर्गों के लिए एक तंत्र के विकास पर जोर देती है जो न केवल उनकी सुरक्षा का ध्यान दे बल्कि जीवन की संध्या में उनके अकेलेपन और मनोरंजन की आवश्यकताओं की भी पूर्ति करे | अभी कुछ समय पहले मैंने मुंबई में ऐसे ‘डे केयर’  के बारे में सुना था जो केवल बुजुर्गों के लिए होता है | काम पर जाने वाले बेटा –बहु बुजुर्गों को दिन भर के लिए वहां छोड़ देते हैं और शाम को वापस ले आते हैं | ताकि अकेले उनके साथ कोई दुर्घटना न हो जाए या उन्हें अकेलापन न लगे | पर इसमें पैसखार्च करना पड़ता है | और जैसा की कहानी में कहा गया है …

“तुम लोग नौकरियाँ करते हो और माँ –बाप को भूल जाते हो | फिर हमारे जैसे लग जब तुम्हारे घर आते हैं फिर तुम इल्जाम लगाते हो …|”

 

तीन’ कहानी वस्तुत: अलग –अलग समय की उन तीन लड़कियों की कहानी है जिन्होंने विद्रोह किया | कहानी भूत और वर्तमान में साथ –साथ चलती है | ये एक ऐसी माँ और बेटी की कहानी है जो डरी हुई हैं, विद्रोह नहीं करती तब भी विद्रोहिणी नायिकाएं इनके पास मदद मांगने के लिए चली आती हैं | पहला विद्रोह  बुआ का था जो तथाकथित रूप से भाग जाने के बाद  परिवार से बेदखल की जा चुकी है | फिर भी उसका संपर्क उसकी माँ से है | वो माँ से कहती है कि

“ मैं तुम पर विश्वास करती हूँ | क्योंकि तुम कायर हो, विश्वासघाती नहीं |”

कहानी में बेटी  की भी यही स्थिति है | दो अलग अलग परिस्थितियों में स्त्रियाँ उससे मदद मांगने आती हैं | वो भी माँ की तरह परोक्ष रूप में डरती है | पर इस डर में छिपे हुए बहुत सूक्ष्म तंतु हैं |  ये माँ –बेटी डरपोंक या कायर औरतें नहीं हैं | ये वो सशक्त औरतें हैं जो विद्रोहिणी स्त्रियों की तब मदद करती हैं जब उन्हें बहुत जरूरत होती हैं | प्रचलित धारण के विपरीत यहाँ स्त्री,  स्त्री की शक्ति के रूप में खड़ी होती है | दरअसल कभी –कभी बहुत छोटी सी मदद ही जीवन की दिशा और दशा बदल देती है | किसी को हाथ बढ़ा कर गड्ढे से बाहर निकाल दो फिर देखिये वो मीलों दौड़ सकता है | मदद करने वाली ये कमजोर औरतें कहीं न कहीं ताकतवर हैं और समाज को बदलने में इनका बहुत योगदान है | इस कहानी में ऐसा बहुत कुछ है जिसपर गंभीर स्त्री विमर्श किया जा सकता है | अत्याचार सहती स्त्री के ये दास्तानें  पाठक की चेतना को झकझोरती है |

 

स्त्री विमर्श पर एक अन्य कहानी “मणिकर्णिका” लेखिका की बहु चर्चित कहानी है | निकट में प्रकाशित होने के बाद कई लोगों ने इसके बारे में लिखा था | ये कहानी बिना गाजे –बाजे, झन्देऔर शोर के सशक्त स्त्री को स्थापित करती है | एक तरह यह कहानी स्लम के जीवन को दर्शाती है तो दूसरी तरफ मेट्रो कल्चर को | ये कहानी चार कमजोर वर्ग से आने वाली लड़कियों की कहानी है | जो बाइक चलाना सीख रहीं हैं | कोई दुपहिया, तिपहिया  वाहन चलाना केवल वाहन चलाना नहीं होता | ये पर निर्भरता को घटाता है | आत्मविश्वास को जगाता है | इस आत्मविश्वास की वजह से वह उस भय का सामना कर पाती हैं जो भीड़ भरी बसों में चढ़ते –उतरते करने की सोंच भी नहीं पाती थीं | इस से बेहतर एक सशक्त स्त्री की परिभाषा क्या होगी…सचमुच “मणिकर्णिका”|   “लेफ्ट ओवर “कहानी, मेरी प्रिय कहानियों में से एक है | ये कहानी बेरोजगार युवक की दास्ताँ है जो प्रौढ़ हो जाने के बाद एक बेकरी शॉप में काम कर रहा है, जहाँ हर वीरवार को लेफ्टओवर  सेल लागाई जाती है | इस दिन हफ्ते भर पुराने केक औने –पौने दामों में बेंच दिए जाते हैं | भीड़ और काम बढ़ने की वजह से ये दिन उसे पसंद भी नहीं है | जैसे उसे मोटी लडकियां नहीं पसंद हैं | बेरोजगारी और लड़कियों के प्रति ख़ास पसंद की वजह से उसकी इस उम्र तक शादी नहीं हुई है | जैसे –जैसे लेफ्ट ओवर केक और उसकी जिन्दगी में लेखिका साम्यता बना कर आगे की कहानी गढ़ती हैं , पाठक उसके आकर्षण में बंधता चला जाता है | कहानी का अंत पाठक के मन को हौले से छूते  हुए गहन शिक्षा दे जाता है | कहानी ‘हर शाख को हरियाली का हक़ है’ शहरी जीवन में उधड़ते रिश्तों के कारण समाज के प्रश्नों से बचने के लिए ओढ़े गए अकेले पन  को दर्शाती है तो ‘एक बात कहूँ’ जाति प्रथा पर प्रहार करती है |

 

संग्रह की सबसे आखिरी और सबसे प्रमुख कहानी “पिघली हुई लड़की” की | तेज़ाब एक ऐसा शब्द जिसको कहने पर भी एक ताप सा महसूस होता है | उसे जब किसी बेगुनाह मासूम  लड़की के ऊपर फेंक दिया जाता है तो ये सिर्फ उसके शरीर को ही नहीं झुलसाता उसकी आत्मा को भी झुलसा देता है | जैसा की नाम से स्पष्ट है ये कहानी एसिड विक्टिम पर है | दो सहेलियां जो किशोर हैं, साथ –साथ स्कूल जाती हैं | उनमें से एक लड़की के ऊपर एसिड फेंका जाता है |  वजह वही पुरानी … एकतरफा प्यार को स्वीकार करने से लड़की का इनकार | लड़कियों के पीछे लड़के का पड़ना, लड़कियों की दहशत, अपनी पढ़ाई को कायम रखने की जद्दोजहद और … वो एक या दो पैरा जिसमें पिघलती हुई लड़की का मार्मिक वर्णन है | कोई कितना भी मजबूत ह्रदय वाला पाठक हो इन पंक्तियों पर  अपने आँसू नहीं रोक पायेगा | कहानी को थोड़ा सकारत्मक अंत देते हुए आकांक्षा जी ने पाठक को थोड़ी राहत दी है | आज जब छपाक फिल्म चर्चा में है तो इस कहानी का आना ये सिद्ध करता है साहित्य फिल्म से पहले ही विडम्बनाओं को सामने लाता है |  संवेदनशील मन को झकझोरने वाली ये कहानी सिर्फ पढने की नहीं है ..यह सोचने –विचारने की है | खुली बहस की है | समाज के इस अमानवीय रूप को बदलने की है |

 

कुल मिला कर कथ्य, शिल्प और शैली की दृष्टि से आकांक्षा पारे जी का यह कहानी संग्रह अवश्य पठनीय है | जिसका उल्लेख साहित्य जगत में  ‘पिघली हुई लड़की, सुरक्षा चक्र, ठेकेदार की आत्मा और लेफ्ट ओवर आदि महत्वपूर्ण कहानियों के रूप में हमेशा होता रहेगा | और जैसा मैंने पहले कहा कि संवेदनशीलता  के साथ बारीक ऑब्जरवेशन इन कहानियों की विशेषता है | यह  विशेषता इस संग्रह में भी देखने को मिलेगी | एल्लेख्क का काम होता है संवेदनाएं जगा कर समाज को बदलने के लिए प्रेरित करना | अपने इस संग्रह में आकांक्षा जी पूरी तरह से सफल हैं | राजपाल प्रकाशन से प्रकाशित 124 पेज के इस संग्रह में 11 कहानियाँ है | 175 रुपये के इस संग्रह का कवर पेज आकर्षक व् विषयानुकूल है |

पिघली हुई लड़की –कहानी संग्रह

लेखिका –आकांक्षा पारे

प्रकाशक –राजपाल एंड संस

पृष्ठ -124

मूल्य -175 रुपये ( पेपर बैक )

समीक्षा –वंदना बाजपेयी

वंदना बाजपेयी

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