समकालीन सशक्त कथाकार निर्देश निधि जी की कहानी “चंद्रकांता की बेटी” रिश्तों के बदलते समीकरणों में पर लिखी एक गंभीर कहानी है। अपनी प्रिय पत्नी को खो चुके पिता द्वारा पुत्री से प्रेम के नाम पर अधिकार के दांतों किया गया महीन शोषण है। अपनी बेटी में अपनी माँ के गुण खोजता पिता कब उसके जीवन का नियंता बन जाता है जान ही नहीं पाता। जीवन साथी के आने पर दोनों परिवारों के माता-पिता का अपनी पायदान खाली कर पति -पत्नी का एक दूसरे की प्रथम प्राथमिकता बनने का अवसर देना ही एक नए स्वस्थ परिवार को जन्म देता है। परंतु कहानी में पिता के विषाक्त प्रेम से सब का जीवन अटक गया है। जो शैने-शैने कहानी की नायिका को पति और बच्चों से दूर करता जाता है। क्या नायिका ऐसा होने देगी ?
कहानी संदेश देती है कि बच्चों को जरूरी स्वतंत्रता देनी भी जरूरी है नहीं तो वे अपना स्वतंत्र अस्तित्व नहीं बना पाते केवल माता -पिता की छाया बनकर रह जाते हैं। आइए पढ़ें एक मार्मिक संदेशप्रद कहानी-
‘चंद्रकांता की बेटी’
माँ मैं आज देर से लौटूँगी। हम सारे फ्रेंडज स्कूल से सीधे श्रिया के घर जाएँगे।
उसके देर से लौटने की बात सुनकर मैं टेंशन में आ गई। मुँह से स्वतः निकला,
क्यों ? पापा क्या कहेंगे?
ये आपका हैडेक है माँ, कि नाना जी क्या कहेंगे।
उसने मेरे कंधे पर लगभग झूलते हुए कहा। मैं घबरा गई, कहीं पापा ने सुन तो नहीं लिया! मैंने राहत की साँस ली जब याद आया कि पापा तो कोई कोरियर करने गए हैं।
मैंने अपनी एक ड्रैस रख ली है, शाम के लिए। आज श्रिया का बद्दे है ना मम्मी । पार्टी के बाद वो हमें मूवी भी दिखा रही है ।
वापस कैसे आओगी ? मैंने चिंता में भरकर पूछा ।
उसके डैड और भैया हम सबको छोड़ देंगे। ओके? अब मैं जाऊँ माँ? उसने यह सब एक ही साँस में कहा और मेरे उत्तर कि प्रतीक्षा किये बिना चलती बनी। मैं बस सोचती ही रह गई। ये दिल्ली जैसे महानगर में रहने वाली आधुनिका है, छोटे कस्बे से आई उसीकी मानसिकता को सीने से लगाए फिरती और विवाह होने के बाद भी अपने पापा के कड़े पहरे में कैद, मेरे जैसी ओल्डफ़ैशन्ड बैंक कर्मचारी निवेदिता नहीं। पापा का पहरा? क्या करूँ, इसे तो मैं पहरा भी नहीं कहना चाहती । पापा ने अपना सारा जीवन मुझ तक सीमित करके, मेरे भले के लिए मुझपर ही न्यौछावर कर दिया है । उनके इस समर्पण को पहरा कहकर मैं उनकी अपराधिनी ही बनूँगी!
सबकी तरह मेरी भी एक माँ होगी, जिसे मैंने कभी देखा नहीं। मेरा बचपन तो बस दादी और पापा के साथ ही बीता । दादी का साथ भी बस उतनी ही देर रहता जितनी देर पापा अपने कैनाल वाले ऑफिस से लौट ना आते, ना जाने कैसे ऑफिस में उन्होंने तभी तक रहने का जुगाड़ किया हुआ था जब तक मैं स्कूल में होती। मैं लौटती तो पापा मुझे दरवाजे पर ही मिलते । मेरी यूनिफ़ॉर्म चेंज कराने से लेकर खाना और पढ़ाना तक मेरे सारे काम पापा द्वारा ही कराए जाते । दादी ने बताया पापा मेरी माँ को बेहद प्रेम करते थे, तभी तो उनकी निशानी छोटी सी ऐनी को अपनी साँस की तरह सीने से लगाए रखते थे । ऐनी। यानि मैं, जीवन के आरंभिक रंग उन्हीं की आँखों से देख रही थी। दादी पापा से अक्सर मुझे इतना परजीवी बनाने का विरोध करतीं, पर पापा सब दरकिनार करते चलते।
पापा ने कभी मुझे निवेदिता नाम से नहीं पुकारा। पापा बताते थे कि माँ पढ़ने की बहुत शौकीन थीं। वे जर्मन यहूदी किशोरी, ऐनीफ्रैंक की डायरी पढ़कर उससे इतना प्रभावित हो गईं कि उन्होंने मेरे जन्म से पहले ही तय कर लिया था कि अगर उन्हें लड़की हुई तो वे उसका नाम ऐनी ही रखेंगी । तय उन्होंने यह भी किया कि वे अपनी बेटी को लेखक ही बनाएँगी। पर जब मेरा जन्म होने वाला था तब मुझे या माँ दोनों में से किसी एक को ही बचाया जा सकता था। पापा ने तो खैर अपनी परम प्रिय पत्नी का ही चयन किया था, पर बच मैं गई थी। दादी बताती थीं कि माँ के देहावसान के बाद महीनों पापा घर से नहीं निकले और ना ही मुझे देखा । फिर उन्हें दादी ने समझाया कि अगर वो मेरा ध्यान नहीं रखेंगे तो मेरी माँ की आत्मा को शांति नहीं मिलेगी। उसके बाद तो पापा ने मेरा ध्यान ऐसे रखा कि किसी पिता ने ना रखा होगा। जाहिर है जिसके मुझे फायदे और नुकसान दोनों ही होने थे।
बरसों बाद आज ना जाने क्यों मुझे अपना बचपन बेहद याद आ रहा है । जो सामान्य बच्चों की तरह, बच्चों के साथ खेलते हुए नहीं बीता था। जब भी मैं कहीं खेलने जाने की जिद करती पापा तुरंत मेरे खिलौनों वाली कंडी उठाकर मेरे साथ खेलने के लिए हाजिर रहते। कहते कि
आओ ऐनी हम तुम्हारे साथ गुड़िया-गुड़िया खेलेंगे।
बता दूँ कि पापा जब भी मुँह खोलते बहुत ही नरमी से बोलते।उन्हें कभी किसी ने ऊँची आवाज में बोलते नहीं सुना। मुझे पापा के साथ खेलना कभी अच्छा नहीं लगा। मुझे गुड़िया तो उनके हाथ में ऐसे लगती जैसे किसी महाकाय की मुट्ठी में निरीह गिलहरी। जाड़ों की नरम धूप सेकते हुए जब मैं अपनी छत से अपनी हमउम्र पड़ोसी रीना के घर झाँकती तो मन ही मन पापा का हाथ छुड़ाकर उसके घर भाग जाती, परंतु तंद्रा टूटने पर खुद को अपने घर की किलकारी रहित, नीरस छत पर पाकर उस रंग-बिरंगी सुंदर चिड़िया के साथ खड़ी पाती, जिसे तड़के ही ढेर सारा दाना – पानी डाल दिया जाता। उसके नन्हें – नन्हें पंख खुले आसमान में उड़ने का सपना लिए निरंतर फड़फड़ाते रहते परंतु उसके तंग पिंजरे के पट कभी नहीं खुलते। उसे जैसे पेट की मूख से ज्यादा लगती थी आजादी की भूख। पापा को मेरा यह मनोविज्ञान कभी समझ नहीं आया। जब मैं छोटी थी तब पूरे परिवार ने पापा पर दूसरे ब्याह के लिए बहुत जोर डाला, पर उन्होंने यह कह कर साफ माना कर दिया कि,
जो भी आएगी वो मेरी पत्नी बनकर आएगी, ऐनी की माँ नहीं।
नहीं बेटा ऐसा नहीं है, पन्ना धाय का देश है ये, दूसरी औरत के बच्चों के लिए भी अथाह ममता भरी है इस देश की बेटियों के सीने में। दादी ने दिल की गहराई से कहा था। पर पापा ने उत्तर में कभी दादी द्वारा कही गई बात ही दोहरा दी थी।
जिसकी माँ दूसरी होती है, उसका बाप तीसरा हो जाता है। माँ अभी तक तो तुम ये कहती थी। नहीं माँ, मैं अपनी चंद्रकांता की बेटी के साथ ये अन्याय नहीं होने दूँगा ।
अभी तक माँ ना होने के दुःख से अनभिज्ञ रही मैं, माँ के स्वर्गवास से हुई अपूरणीय क्षति को समझने लगी थी। चूँकि स्वाभाविक सामाजिक जीवन मेरे अनुभव से कोसों दूर था अतः मैं एकाकी व्यक्तित्व की स्वामिनी होती जा रही थी किसी से कुछ भी साझा करना मैं नहीं जानती थी। ना भौंतिक, ना मानसिक । बालपन मुझे असहज लगने लगा था। सिर्फ पापा के साथ खेलने के कारण, मुझे खेलने से ही चिढ़न होने लगी थी, सो खीझकर मैंने खेलना बिल्कुल बंद कर दिया था।
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एक दिन घर का काम करते-करते दादी बहुत थक गईं, तो मैंने काम में उनका हाथ बँटा दिया, इस पर पापा दादी से बहुत लड़े। उसके बाद तो लाख मिन्नतों के बाद भी दादी ने मुझे कोई काम छूने तक ना दिया। मेरा खाली समय कहाँ खर्च होता! सो मैंने अपनी दिवंगत माँ की किताबें उठाकर पढ़ना शुरू कर दिया। जो मिला सो पढ़ा । पापा बहुत खुश थे, मुझमें मेरी दिवंगत माँ का शौक पलते देख कर । मेरे हालात ने मुझे बचपन में ही बड़े होने की मजबूरी से आत्मसात करा दिया था।
अब दादी के हाथ-पाँव थक रहे थे, उनके हाथों एक-एक कर घर की ज़िम्मेदारियाँ फिसलती जा रही थीं। नाना जी ने एक बार फिर आग्रह किया कि पापा मझली मौसी से ब्याह कर लें। पर पापा का उत्तर नकारात्मक ही रहा। हारकर नाना जी ने मुझे अपने साथ ले जाने का प्रस्ताव रखा। इस पर पापा बहुत रोए और मैं उन्हीं के पास रह गई।
जब मैं तेरह बरस की थी दादी चल बसीं। अब आनी थी असली मुश्किल। दादी की आरिष्टि वाले दिन सब अपने-अपने घर लौट गए। अब मैं और पापा थे बस । घर काट खाने को दौड़ रहा था दादी के बिना। मैं अपने शारीरिक और मानसिक, दोनों परिवर्तनों से एक साथ, अकेले ही जूझ रही थी। पिता-पुत्री के बीच की सीमाएँ सभी की तरह हम भी नहीं तोड़ सकते थे। पूरा साल मैं और पापा अकेले रहे । साल भी वही था जिसमें किसी लड़की को अपने जीवन के सबसे बड़े परिवर्तनों से गुजरना होता है। उसके बाद तो कभी बड़ी , कभी मँझली, तो कभी छोटी बुआ थोड़े-थोड़े दिनों के लिए हमारे घर आती-जाती रहीं । फिर छोटी मौसी की शादी के बाद नानी बड़ी मामी के ऊपर गृहस्थी छोड़कर हमारे पास आ गईं । मैंने और पापा ने राहत की साँस ली । दो बरस यह राहत की यह साँस यथावत बनी रही ।
पापा के इतना केयरिंग होने और हर वक्त मेरे साथ रहने के बावजूद ना जाने कैसे एक निश्चित दूरी बन गई थी मेरे और उनके बीच। हमारा रिश्ता अजीब सा हो गया था, हमारे बीच एक सघन औपचारिकता भर गई थी, मैंने अपने मन की बात पापा से कहना लगभग बंद कर दिया था, कम से कम मेरी तरफ से तो यही था । क्योंकि पापा मेरे मन की मानते भी कम ही थे। समय के चरित्र में सबसे अच्छी बात यही होती है कि अच्छा हो या बुरा किसी के साथ कोई भेदभाव किये बिना हठ योगी सा बस बीतता चला जाता है। मैंने दसवीं और बारहवीं दोनों ही कक्षा प्रथम श्रेणी में भी बहुत अच्छे प्रतिशत से उत्तीर्ण कर ली थीं । पापा बहुत खुश थे, पर मेरे लिए सब कुछ यांत्रिक था, रसहीन और नीरस। नाना जी की तबियत बिगड़ने और छोटी मामी की डिलीवारी ड्यू होने की वजह से नानी को अपने घर जाना पड़ा ।
पापा के हिसाब से अब मैं हॉस्टल में रहने के योग्य हो गई थी । पापा ने मुझे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में ऐडमीशन दिलाया और छात्रावास में छोड़ आए। बुआ की लोकल गार्जियनशीप में। इलाहबाद में बुआ का ससुराल वाला पुश्तैनी घर था। छात्रावास के कार्यालय में मुझसे फोन पर रोज़ बात करने की परमीशन और लाल-लाल आँखें लेकर पापा घर लौट आए। पहले तो पापा बिना झिझक पड़ोसी अग्रवाल अंकल के घर से फोन करते, फिर जल्दी ही दौड़-भाग करके अपने घर में ही फोन लगवा लिया। हर सप्ताहांत पापा इलाहबाद ही आ जाते । एक रविवार ही लड़कियों के साथ आउटिंग के लिए मिलता था, उसी में पापा आ जाते । मेरे ग्रेजुएशन के पूरे समय पापा आते-जाते रहे । मैं हमउम्र लोगों से यहाँ भी दूर ही रह गई । मुझे बैंक एन्ट्रेंस की तैयारी कराने के लिए पापा ने एक साल की विदाउट पे लीव ले ली। मैं पहले भी बता ही चुकी हूँ कि मेरा और पापा का रिश्ता निरी औपचारिकता से भर गया था। हमारे बीच सिर्फ जरूरी बातें ही रह गई थीं करने को। यहाँ तक औपचारिक कि अगर मैं कभी किसी के साथ उन्मुक्त हँसी हँस रही होती और पापा आ जाते तो मैं तुरंत एक सफल रंगकर्मी की तरह शांत स्थिर चित्त वाली लड़की होने का ड्रामा करती । जिसका मुझे पूरी तरह अभ्यास हो गया था ।
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फर्स्ट अटैम्प्ट में ही मेरा सलेक्शन बैंक प्रोबेशनरी अफसर के लिए हो गया। पहली पोस्टिंग संयोगवश मुझे इलाहबाद ही मिली अब मुझे वीमेन्सवर्किंग हॉस्टल मे छोड़ा गया। एक बार फिर बुआ को मेरा ध्यान रखने की हिदायत देकर पापा घर वापस लौट गए। सप्ताहांत में तब भी आते रहे।
मेरी नौकरी लगने के बाद पापा मेरे लिए सुयोग्य वर ढूँढने में जुट गए। वह वर जो मेरे नहीं पापा के अनुसार चल सके । शादी ? मैं तो बस अपनी ही तरह की हो गई थी, अपनी ही जिद। अपने सबसे जिद्दी होने को मैं दूसरों से बड़ी शान के साथ बताती। पर गृहस्थी तो वह अखाड़ा है जहाँ बड़े – बड़े महाबलियों ने भी मात खाई।
मेरी पहली पोस्टिंग के दौरान ही निलय मेरी ज़िंदगी में आए। कैसे आ गए! मैं आज तक हैरान हूँ । शायद संयोग ही होगा या जोड़ियाँ वाकई आसमान में बनती होंगी । वरना पापा के घेरे में कैद नीरस लड़की मैं, किसे आकर्षित कर सकती थी भला। पापा के साथ औपचारिकता के रहते उन्हें खुद बताने का तो प्रश्न ही नहीं था। वैसे भी उनकी जादुई आँख ताड़ लेती कि मुझे, मतलब उन्हें क्या चाहिए था अगर उस पर निलय खरे उतरते तो ठीक, अन्यथा पापा उन्हें ठंडे बस्ते में डालकर भूल जाते । मैंने बुआ से निलय की वकालत करने का बहुत आग्रह किया। विशेषकर यह बताने को मना किया कि निलय मेरी पसंद हैं । बुआ के निलय को अपने पुराने परिचित का बेटा, जो बचपन से देखा-भाला था बताने पर भी पापा निलय से दसियों बार मिले। अपनी हिडेन आई से उनके सीक्रेट आउट कराने के लिए । पर पापा को ऐसा कुछ नहीं मिल सका। जीवन में पहली बार मेरे अपने मन की बात हुई।
शीघ्र ही निलय से मेरा विवाह हो गया और शीघ्र ही मैंने जाना कि मैं लगभग, प्रतिद्वंदियों सरीखे दो पुरुषों के बीच खड़ी थी । एक पिता, जिसने सारा जीवन मेरे पालन-पोषण पर होम कर दिया था, निर्विवाद रूप से मुझपर उसका पूर्ण अधिकार था। दूसरा पति जो सिर्फ मेरे साथ अपना जीवन बिताने चला आया था। मुझे उन दोनों के बीच अदृश्य सी खींचतान का आभास होने लगा था। समस्या उठ खड़ी हुई थी। किसी भी समस्या का समाधान मुझे तो आता ही नहीं था, उसके लिए तो पापा थे। पर इस बार पापा खुद समस्या का हिस्सा थे। पत्नी का महत्व तो पापा को जरूर पता होना चाहिए था। उन्होंने अपनी पत्नी की बेटी को उसकी इच्छानुसार पालने में अपनी अब तक की उम्र गुजार दी थी। पर निलय? उन्होंने तो मुझसे सिर्फ और सिर्फ मेरी वजह से प्यार किया, मेरे साथ आए । खींचतान की प्रत्याशित समस्याओं में से पहली समस्या अप्रत्याशित रूप से जल्दी ही सामने आ गई। तब, जब निलय ने हनीमून के लिए कश्मीर जाना तय किया। कश्मीर के हालात उतने बेहतर थे नहीं कि वहाँ यूँ धूमने जाया जा सकता। निलय ठहरे खतरों से खेल जाने वाले । पर उन्हें यह पता होना चाहिए था कि मैं पापा की स्वर्गवासी पत्नी चंद्रकांता की अनमोल धरोहर थी उनके पास, कश्मीर में घूम रहे हिंसक आतंकवादियों के हाथों ढेर हो जाने का सस्ता सामान नहीं। हमारे वहाँ जाने के विरोध में पापा ने पहले रौद्र रूप लिया और फिर अनशन ले लिया। मेरी ससुराल में भी सबको पता चल गया था। अजीब स्थिति हो गई थी।
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डोर बैल बजी तो मेरी तंद्रा टूटी, घड़ी देखी। अरे! इतनी देर से मैं अपने अतीत के गलियारे में ही घूम रही थी। दरवाजे पर पापा थे । मैंने तो ना लंच ही बनाया था, ना दूसरा ही कोई काम किया था। मेरा उड़ा-उड़ा चेहरा देखते ही पापा ने पूछा।
तबीयत तो ठीक है ऐनी
हाँ पापा, ठीक है ।
अतीत को परे झटकते हुए मैंने तुरंत उत्तर दिया। पापा के खाने का समय हो गया था। आज रमा भी आई नहीं थी। मैं जल्दी से किचिन में गई। हाथ खाना बनाने के लिए चल रहे थे पर दिमाग फिर अतीत में चला गया था । याद आया हमारे कश्मीर जाने के प्लान पर पापा का रौद्र रूप । पापा ने हमारे एयर टिकिट कैंसिल कराने बाद ही खाना खाया था। तब मैंने निलय को ही समझाया था कि वे पापा की जिद मान लें । वे मान भी गए थे । पर आज मैं सोचती हूँ कि मेरा और पापा का हर सुख और दुख का चौबीस वर्षों का लंबा साथ था । मैं उनके अपने खून से पैदा हुई, उनकी अपनी बेटी हूँ। फिर भी पापा कितने पराए हैं कि मैं उनसे उनकी जिद छुड़वाना तो दूर उसे छोड़ने का आग्रह तक नहीं कर पाई। चंद ही महीनों से मिले निलय पर मेरा इतना भरोसा और अधिकार हो गया था कि मैंने उन्हें मिनटों में मना लिया।
आज रमा नहीं आई ऐनी? पापा के प्रश्न ने मुझे वर्तमान में ला दिया ।
नहीं पापा, आज नहीं आई। मैंने उत्तर दिया । जितना सवाल उतना ही जवाब,तोलकर। क्योंकि पापा को ज्यादा बोलना भी पसंद नहीं।
अरे ! तो सारा काम तुम्हें ही करना पड़ा होगा । लाओ अब हम कुछ करा दें ।
नहीं पापा हो जाएगा । मैंने भारी-भरकम औपचारिकता के बोझ से लदा उत्तर दिया । जल्दी – जल्दी खाना बनाया, पापा को खाना खिलाया और अपने कमरे में जाकर लेट गई। लेटते ही अतीत का गलियारा यादों की रोशनी में पुनः चमक उठा ।
याद आया जब दीप मुश्किल से दो या ढाई बरस का होगा, पापा ने मुझसे लेखन की फरमाइश शुरू कर दी। मैंने अपनी असमर्थता जताते हुए कहा था,
पापा जॉब है , फिर अभी दीप भी तो कितना छोटा है। लेखन के लिए समय ही कहाँ है?
छत्तीस घंटों का दिन तो किसी को भी नहीं मिलता ऐनी, हाँ लोग चौबीस घंटों के छत्तीस घंटे बना जरूर लेते हैं।
तभी पता चला लेखक बनाए भी जाते हैं। मुझमें लेखन क्षमता रही तो जरूर होगी खैर। परंतु, अगर पापा जोर ना देते तो शायद मैं लेखन ना भी करती।
तुम तो लिखो-पढ़ो बस, दीप को हम देखेंगे। हम वी आर एस ले रहे हैं ।
पापा ने मुझे सूचित किया। उनकी इस सूचना से मुझे डर सा लगने लगा था । अगर निलय को पापा का हमारे साथ रहना अच्छा ना लगा तो ? मेरे डर की परवाह किये बगैर, पापा वी आर एस लेकर हमेशा के लिए हमारे किराए के छोटे से घर में हमारे पास आ गए। जल्दी ही पापा ने अपना एक प्लॉट बेचकर हमारे लिए एक मकान खरीद दिया। अब पापा का घर पर पूरा-पूरा अधिकार स्थापित हो गया। मैं ऑफिस जाती, पापा दीप और घर दोनों का ध्यान रखते । रमा को एक टाँग पर खड़ी रखते ताकि मेरा पल भर भी जाया ना हो जाए । निलय का घर के निर्णयों में कोई रोल नहीं रह गया था। मेरे ऑफिस से आते ही दीप मेरी तरफ भागता, पापा उसे थोड़ी ही देर मेरे पास छोड़ते । रमा से मेरे लिए चाय मेरे स्टडी रूम में ही भिजवा देते और आदेश देते,
ऐनी जाओ तुम अपना लेखन कर लो । लेखन, ठीक वैसे जैसे पापा मुझसे स्कूल का होमवर्क कराते थे।
मैंने कविता , कहानी, ,संस्मरण जो भी लिखा पापा ने उसे हाथों – हाथ पब्लिश करा दिया । मेरी गृहस्थी होने के बावजूद पापा मुझे उससे अलग करके मुझे अपनी स्वर्गीय पत्नी की इच्छानुसार ढालने में लगे हुए थे । जब तक निलय ऑफिस से लौटते मैं स्टडी में जा चुकी होती । कई बार तो हमारे लौटने का एक ही समय होता तब भी पापा मुझसे दीप को ले लेते और मुझसे स्टडी रूम में चले जाने की अपेक्षा रखते। वे यह भूल जाते कि निलय का भी, मुझ पर और मेरे समय पर कुछ तो अधिकार है ही। दीप जब दो साल चार महीने का था, तब सिक्ता का जन्म हुआ। दीप बहुत सीधा सरल बच्चा रहा, पर सिक्ता शुरू से ही बहुत तेज-तर्रार थी । उसने मेरा समय अधिकारपूर्वक ले लिया था । वो पापा की गोद में तब तक रोती रहती जब तक वो उसे मेरे पास नहीं ले आते । इसीलिए उसके बचपन में मेरा लेखन ना के बराबर ही हुआ।
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पापा को शुरू से ही रात में किसी के घर जाना और किसी का अपने घर आना भी, कतई पसंद नहीं था। उनके घर में होते नौ बजे तक सबका अपने बिस्तर पर चले जाना जरूरी होता। आधुनिक व्यस्त जीवन शैली में सामाजिक गतिविधियों के लिए वास्तव में दिन छोटा पड़ जाता है । अगर सामाजिक बनकर रहना है तो रात का आश्रय लेना ही पड़ता है। परंतु पिछली पीढ़ी के पापा के कड़े नियमों में ऐनी के लिए छूट की कोई गुंजाइश नहीं। अकेले तो क्या पति के साथ भी नहीं । सामान्य अवसरों को तो छोड़ ही दें अगर हमें किसी शादी-ब्याह में भी जाना होता तो पापा निलय से साफ कह देते।
इतनी रात में ऐनी को मत ले जाइए, आप अकेले ही चले जाइए।
निलय चुपचाप चले जाते । अगर किसी दोस्त के घर से लौटने में देर हो जाती तो निलय के मेरे साथ होते हुए भी पापा मुझसे कहते,
ऐनी रात होने से पहले घर आ जाया करो, हमें जीवन के नियम कभी नहीं तोड़ने चाहिए। यह सब पापा बहुत ही मधुर आवाज में कहते ।
विचित्र स्थिति हो जाती। मैं हमेशा निलय की ऋणी रहूँगी, उन्होंने कभी पापा को जवाब नहीं दिया, ना मुझे ही कोई उलाहना दिया। अब तो शायद मैं स्वयं भी पापा का बहाना लेकर न जाने कितनी सामाजिक उद्दंडताएँ करती हूँ, मसलन जब कहीं मेरा जाने का मन नहीं होता तब मैं पापा की नाराजगी का सत्यापित बहाना लेकर जाने से साफ-साफ मना कर सकती हूँ । जिस बात को मानने से मुझे थोड़ी सी भी परेशानी होती है या मेरा समय जाया हो जाने का अंदेशा मात्र भी होता है तो मैं पूरी हृदयहीनता के साथ बेहिचक मना करने में जरा भी संकोच नहीं करती।
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इलाहबाद में रहते कई बरस हो चुके। अब हमारे ट्रांसफर होने तय थे। निलय का ट्रांसफर ऐटा हुआ और उसी बरस मेरा लखनऊ। हम पति-पत्नी होने के नाते एक ही शहर के लिए एप्लाई कर सकते थे, परंतु शायद निलय का धैर्य जवाब दे गया था, पापा के कड़े नियमों के आगे। इसलिए उन्होंने लखनऊ आने का प्रयास ही नहीं किया। पापा की बातें सुनने, सहने का मुझे बचपन से अभ्यास था पर निलय का कितना खून जलता होगा यह मैं तब नहीं समझ पाती थी। पर अब समझ पाती हूँ क्योंकि पापा के नियम मेरी गृहस्थी पर भारी पड़ रहे हैं । सच तो यह है कि गृहस्थी भी पापा की ही रही, मैं तो बिना जिम्मेदारी का जीवन जिये जा रही थी बस। कल भी और आज भी। जैसे मैं आज ही सारा अतीत जी लेने वाली थी। वह तो अच्छा हुआ मेरी आँख लग गई ।
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फोन की घंटी बजी तब आँख खुली, देखा तो शाम के पाँच बजे थे। फोन दीप का था। दीप पुणे ए एफ एम सी से अपनी डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहा है। वह अपने पीजी में सलेक्शन की खुशखबरी दे रहा था। वह कह रहा था, माँ डैड का फोन नहीं लग रहा, उन्हें बता देना। सिक्की को भी बताना, अच्छा माँ मैं रखता हूँ। मैं जानती थी, पहले उसने अपने पिता को ही फोन किया होगा। क्योंकि दोनों बच्चे हमेशा चंद्रकांता की बेटी ऐनी की अपेक्षा अपने पिता के ही अधिक समीप रहे । उन्हीं से संभव था विचारों का आदान-प्रदान तो। मैं तो पापा की बेटी अभी यह जिम्मेदारी उठाने योग्य अपने आप को बना ही नहीं पाई थी। तभी के तभी निलय को फोन मिलाया। खुशखबरी थी सो स्वाभाविक रूप से वे खुश हुए। दीप पाँच दिन के लिए घर आ रहा था , फिर तो उसे पीजी की पढ़ाई में जुट जाना था।
आज मुझे दीप पर बहुत लाड़ आ रहा है। उसका सलोना बचपन मैंने अपने ऑफिस और लेखन के हवन कुंड में स्वाहा जो कर दिया था। पापा की महत्वाकांक्षाओं पर न्योछावर करके बेजान पन्नों पर शब्दों के बूटे बनाकर टाँक दिया था । पापा की गोदी में मुझसे अलग जाते हुए जब वह सुबक-सुबक कर आँसू भरी आँखों से मुझे देखता तो मैं उसके आँसुओं को हमेशा ही अनदेखा कर देती । जो मैं याद करूँ तो, मेरे हृदय में माँ की ममता का अथाह समंदर कभी नहीं उमड़ा । सच तो यह है कि पुत्र को जन्म देने के बाद भी मुझमें एक माँ कभी जन्म ले ही नहीं पाई थी। ममता को धता बताकर मैं अपना मशीनीकरण करके पापा का मिशन कंप्लीट करने में जुट गई थी। अब तो लेखन मुझे भी भाने लगा था। चारों तरफ फैलता अपना नाम किसे बुरा लगता है! यह मेरा कन्फेशन है कि मैं माँ तो क्षणांश में ही थी, संपूर्णता में तो मैं लेखिका और बैंक कर्मी ही थी। अब यह अपराधबोध सालता है। अपने अपराध बोध को परे हटाते हुए मैंने सिक्ता को फोन किया। दीप को पी जी मिलने की खुशखबरी देने के बहाने उसे जल्दी घर आने की हिदायत दी। उत्तर में उसने चिंता न करने की बात दोहराई।
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रात के दस बज चुके सिक्ता अभी आई नहीं है। पापा बार-बार पूछ रहे हैं पर शायद उस पर इतने नाराज नहीं है जितने उस स्थिति में मुझसे, अपनी पत्नी चंद्रकांता की बेटी एनी से हो सकते थे। मेरे बार-बार फोन करने से चिढ़ कर सिक्ता ने फोन उठाना बंद कर दिया। मैं पापा को यह बात नहीं बता सकती थी। यह सच है कि आधुनिकता और स्वतंत्रता के नाम पर हम अपने बच्चों को स्वच्छंद नहीं छोड़ सकते, परंतु चंद सावधानियों के साथ इस युग के बच्चों को स्वतंत्र छोड़ना भी जरूरी है वरना उन्हें माँ-बाप से पराए होते देर नहीं लगती। पापा के साथ रहकर यह तो मैं ठीक से जान ही गई थी। जब मैं यह जान ही गई थी, जब मुझे पता ही था कि सिक्ता ठीक जगह पर है और सुरक्षित लौट आएगी, तो इतना हो-हल्ला क्यों कर रही हूँ मैं! शायद मैं यह सब पापा को दिखाने के लिए कर रही हूँ या मैं स्वयं भी ऐसी ही हो गई हूँ! निश्चय नहीं कर पा रही। मेरे विचार पापा की पीढ़ी तक ही सीमित हैं। इस तरह मेरे बच्चों को अपने से दो पीढ़ी पीछे की माँ को झेलना पड़ता है। कल दीप और निलय आ रहे हैं और आज यह लड़की घर में कलह करवा कर ही छोड़ेगी।
ग्यारह बजे सिकता आई। उसके डोर बेल बजाने से पहले ही पापा ने दरवाजा खोल दिया। श्रिया और उसका भाई सिक्ता को पहुँचाने आए थे। पापा ने उनकी नमस्ते नहीं ली। उन दोनों को जैसे कुछ फर्क ही नहीं पड़ा। इस पीढ़ी के बच्चे किसी की नाराजगी पर अपना खून जलाने की जरूरत नहीं समझते। पापा की मर्जी ना चलने पर घर, घर न होकर विषाक्त द्वीप सेंट हैलेना बन जाता है। जिसमें पापा की नाराजगी का विष हवाओं में घुला रहता है । घर में रहने वालों का दम धीरे-धीरे घुटता जाता है । पापा मुझे कुछ कहते इससे पहले ही मैं सिक्ता के कमरे की तरफ मुड़ गई। पर पापा से यह कहे बगैर नहीं रहा गया कि बच्चों को इतनी आजादी कभी नहीं देनी चाहिए जो समय का ध्यान भूल जाएँ। शायद पापा नहीं जानते आजकल के बच्चे आजादी छीन लेते हैं, किसी के देने-दिवाने का इंतजार नहीं करते । चोट लग जाने के डर से पापा ने मुझे कभी साइकिल तक पर चढ़ने की आजादी नहीं दी, आज घर में वाहन होते हुए भी मैं दूसरों की मौहताज हूँ।
पापा की तसल्ली के लिए मैं सिक्ता को डाँट लगाने उसके कमरे में घुस गई। वह अपना नाइट सूट पहनने जा रही थी मैंने गुस्से भरी आवाज में उससे कहा,
‘यह कोई समय है आने का? भले घर की लड़कियाँ इतनी रात गए तक घर से बाहर नहीं रहती।’
‘रात-रात-रात ! क्या रात -रात लगा रखा है मम्मी ? खा जाती है क्या रात, किस जमाने की बात करती हो आप? ये दिल्ली है, आपका बिना बिजली वाला टाउन नहीं, जिसमें दिन ढले ही रात हो जाती हो। एक बात और बता दूँ श्रिया मुझसे ज्यादा भले घर की है। उसकी माँ शहर के कितने ही ऑरफंस और हैंडिकैप्ड की दिन रात हैल्प करती हैं। वह भी रिटर्न की सोचे बगैर। आपके जैसी भली नहीं हैं कि सिर्फ सैलरी लेने के लिए बैंक का जॉब करती हों।
मैं बता दूँ, जब से सिक्ता ने होश संभाला है तबसे हम दिल्ली में ही रहे हैं।
सिक्ता तुम तो नाना जी के रूल्स जानती हो। मैंने नाराजगी से ही कहा।
हाँ जरूर जानती हूँ, पर फॉलो करना जरूरी नहीं समझती। उसने फैसला सुनाया।
सिक्ता मैं पापा की अनदेखी नहीं कर सकती। मैंने अव्यवस्थित सी आवाज में शायद अपनी व्यथा कही ।
किसी बात की हद होती है माँ। आप लगभग फिफ्टी की तो हो ही गई होगी ना, कब तक आप नाना जी की बेटी बनी रहोगी? बेटी के रोल से बाहर निकलो अम्मा । एक माँ आपका इंतजार कर रही है। दो पीढ़ी पीछे की बातें अब नहीं ढोई जातीं मुझसे। कम से कम एक पीढ़ी तो आगे आओ, प्लीज।
वह मेरे आगे हाथ जोड़े खड़ी थी। मैं डर गई, अगर पापा ने यह सब सुन लिया तो? पर वह नहीं डरती। उसने पूछा,
नाना जी को मैरिज करने से आपने रोका था ?
नहीं मैं क्यों रोकती।
मतलब, ये उनका अपना डिसीजन था, कोई त्याग-व्याग नहीं । माँ आप किस एहसान में दबी हो?
मैंने उसे समझाना चाहा कि हर घर के कुछ नियम होते हैं, जिन्हें मानना जरूरी होता है। उसने भी मुझे बताया,
आपके घर के नियम आप पर भारी पड़ेंगे मम्मा। जब आप किसी की शादी-ब्याह या किसी दूसरे सैलिब्रेशन में नहीं जाती तो आपके यहाँ भी कोई नहीं आने वाला। इसे चीपनेस कह लो या स्मार्टनेस पर लोग चलते नाप-तोल कर ही हैं।
फोन की घंटी बजी। किसी तरह बहस खत्म हुई, पर बहस अभी खत्म नहीं, शुरू हुई थी। मैं और निलय वैसा ही करते रहे जैसे पापा ने कहा, पर अब…
फोन निलय का था अपने आने की सूचना दे रहे थे। उनके आने-जाने से मेरे रुटीन पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि मेरा तो मिनट-मिनट कीमती है। वैसे भी लेखन-पाठन तो ऐसा कुआँ है जिसमें कितना भी समय गिरा दो भरता ही नहीं। कितनी ही बार मेरे और निलय के बीच अनबन हुई है, इन्हीं व्यस्तताओं की वजह से। पर जीत हमेशा मेरी जिद की हुई। जिसमें पापा की इच्छा के कार्यों को हमेशा वरीयता दी गई । पर आज मैं सोचती हूँ कि क्या हक था मुझे किसी की पत्नी बनने का? निलय वर्षों से अकेले रह रहे हैं। कभी-कभी आते हैं और मेरी जिद के आगे हारकर चले जाते हैं। उन पर अन्याय है यह। अब मैं कुछ-कुछ समझने लगी हूँ परंतु आज भी पापा के बनाए नियमों को चैलेंज करने का साहस नहीं है मुझमें।
सिक्ता ठीक ही कहती है कि मेरी जिद के हंटर किसी भी नाजुक रिश्ते की नरम काया सह नहीं सकती। जिस जिद का मैं अपने मित्रों के बीच सगर्व महिमामंडल करती थी उसने मेरे बहुत से रिश्तों की बलि ले ली है। उसी जिद ने समाज में मुझे अकेले खड़ा कर दिया है। मेरे दोनों बच्चे भी अपने पिता के ही अधिक निकट हैं । यह सब सोचते-सोचते दिमाग थक गया और मैं फिर से सो गई। सुबह आँख खुली तो याद आया, समीक्षा वाली किताब फाइनल करनी है। दीप और निलय के आने पर बहुत सारा टाइम ‘यूँ ही’ निकल जाता है। पर आज शाम तक का पूरा टाइम है।
दिन जैसे सुपरसोनिक जेट पर सवार सूँ से निकल गया। शाम के लगभग पाँच बजे निलय आए। एक डेढ़ घंटे बाद ही दीप भी आ गया। आते ही उसने फरमाइश रखी कि उसे मेरे हाथ की शाही पनीर की सब्जी और हरे धनिए की हींग, दही वाली चटनी खानी है। पापा ने उसे मेरे समय की कीमत बताई और कहा रमा मुझसे तो बहुत अच्छा खाना बनाती है। दीप कुछ बोला तो नहीं पर वहाँ बैठ भी नहीं सका। वो चुपचाप हमारे बीच से उठकर चला गया। पापा शायद जानते नहीं कि माँ जैसा खाना तो सिर्फ माँ ही बना सकती है। अब तो ऐसा लगने लगा है जैसे मेरा घर एक सितार है और परिवारजन उसके तार। पापा ज्यादा झंकार के चक्कर में तारों को ज्यादा, ज्यादा और ज्यादा उमेठते जा रहे हैं। बस अब तो यही देखना बाकी रह गया है कि तार टूटते हैं या उमेठने वाले की उंगलियाँ घायल होती हैं। मैं दोनों में से कुछ भी देखना नहीं चाहती। अपने जीवन में आने वाली सारी समस्याओं को सुलझाने का काम मैं हमेशा से पापा पर ही छोड़ती रही हूँ, पर अब? अब कोई रास्ता नहीं सूझता क्योंकि इस बार तो समस्या सुलझाने वाला खुद ही अझेल समस्या बन कर खड़ा था ।
*
उस दिन रमा के साथ मैंने भी खाना बनवाया। पापा दिन की आखिरी जिम्मेदारी निभाने, यानी हमें सो जाने के लिए कहने आए। मैं उठ गई। पापा को शुभ रात्रि कह कर सिक्ता,दीप और निलय, तीनों देर रात तक बातें करते रहे और अगले दिन तीनों देर से उठे। अगला सारा दिन पापा का मूड खराब रहा। न जाने कितनी ही ऐसी बातें थी जिनमें मेरे और निलय के सिवा किसी की दखलंदाजी की गुंजाइश नहीं थी पर पापा ने उनमें भी अपनी ही जिद चलाई थी। पर इस पीढ़ी के बच्चों में सहनशीलता प्राकृतिक तौर पर ही कम है उनके लिए तो हर बात को उनके तर्कों पर खरा उतरना जरूरी है, वरना वे उसे नहीं मान सकते।
एक के बाद एक पाँचों दिन ना जाने कब बीत गए। पाँचों दिन निलय, दीप और सिक्ता, तीनों हर समय साथ रहे । यूँ तो लेखन क्षेत्र में मैं और मेरी लेखनी दोनों, खासा डंका बजा रहे हैं, पर मैं घरेलू फ्रंट पर अकेली ही छूट गई हूँ।
दीप को वापस जाना था। निलय उसे ट्रेन में बैठा कर वापस आ गए । दो दिन बाद वे स्वयं भी चले गए। सिक्ता अपनी बारहवीं कक्षा और निफ्ट के एंट्रेंसस एग्जाम्स की तैयारी में व्यस्त हो गई। दो-तीन माह का क्या वे भी हवा के साथ सर्र से उड़ गए। सिक्ता बारहवीं कक्षा में अच्छे अंक लाने के साथ-साथ निफ्ट में भी सेलेक्ट हो गई थी। पापा को यह कोर्स सख्त नापसंद है। फैशन को उनकी नजर में अच्छा दर्जा कभी नहीं मिल पाया। पढ़ाई के लिए तो हरगिज नहीं! सिक्ता को उससे फर्क नहीं पड़ता। वह आत्मविश्वासी आधुनिका अपनी मर्जी की मालिक है। कुछ ही दिनों में उसकी क्लासेस शुरू हो गईं। यह उसका प्रोफेशनल कोर्स है। और वह भी सौ प्रतिशत उसकी पसंद का। वह अपने काम में कुछ ज्यादा ही रम गई । कई बार अपना प्रोजेक्ट कंप्लीट करने में शाम और रात हो जाने से भी उसे कोई एतराज नहीं है । बस यही बात पापा के लिए असह्य है। रोज पापा का मूड खराब रहने लगा। उन्होंने सिक्ता से तो कुछ नहीं कहा पर मुझे उसे टाइम से आने के लिए रोज-रोज कहने लगे थे। मैं दोनों के बीच में बुरी तरह झूल गई । सिक्ता अपनी जगह सही थी यह जानते हुए भी मैंने उसे रोज-रोज डाँटना शुरू कर दिया । पापा मुझे कहते और मैं सिक्ता से। पर पापा को कुछ ना कह पाने की मजबूरी मेरे सिर पर झुंझलाहट और गुस्सा बन कर सवार हो गई। उस दिन जब वह प्रैक्टिकल की तैयारी में घर लौटने में ज्यादा लेट हो गई तो पापा ने मुझे और मैंने उसे बहुत बुरी तरह लताड़ा था। हमेशा अपना तर्क तैयार रख मोर्चा साधने वाली सिक्कू ने उस दिन मुझ से शब्द मात्र भी नहीं कहा। वह चुपचाप किसी को फोन करने चली गई और देर तक बात करती रही। अगले दिन वह अपने इंस्टिट्यूट भी नहीं गई। सारा दिन अपने कमरे में ही अपने सामान के साथ क्या उठा-पटक करती रही, मैंने गुस्से में पूछा भी नहीं। यह क्या ? शाम को अचानक निलय आ गए!
दिल्ली में अपना घर होते हुए भी सिक्ता ने छात्रावास में रहने का निर्णय ले लिया था। उसके पिता उसकी समस्या पूरी तरह समझ गए थे। उनका अपनी गृहस्थी को अपनी तरह चलाने का सपना, इस घर की देहली पर सिर पटक-पटक कर मर गया था। उस मृत सपने को आँखों के जल में विसर्जित कर, होठों को सिले हुए मजबूर होकर उन्हें भी तो एक दिन हमसे अलग जाकर रहने का निर्णय लेना पड़ा था। सिर से उतरते पानी में डूब कर मर जाने से बेहतर समझा था उन्होंने, हाथ-पाँव मारकर अपने आप को बाहर निकाल लेना। वे अपनी बेटी को तो किसी कीमत पर डूबने देना नहीं चाहते। उसके हॉस्टल जाने की खबर मेरे दिमाग की धरती से किसी शक्तिशाली उल्का की तरह टकराई थी। मैंने बुरी तरह रोना शुरू कर दिया था। परंतु मेरे वे आँसू उस नए विचारों की नदी के निश्चित और तेज बहाव के रुख को मोड़ नहीं सके। मैं और पापा एक बार फिर अकेले थे। पापा सिक्ता के चले जाने से तो खुश नहीं थे खैर, पर अपनी पत्नी चंद्रकांता की बेटी के साथ जरूर खुश थे।
निर्देश निधि

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