विभाजन और प्रेम की जीवंत कथा- मैं वापस आऊँगा

 

धीरे-धीरे माउथ पब्लिसिटी से आगे बढ़ती इम्तियाज़ अली द्वारा निर्देशित “मैं वापस आऊँगा” विभाजन की त्रासदी झेलते मन के किसी कोने में सहेजी प्रेम कथा है। हम जहां रहते हैं जरूरी नहीं मन भी वहीं रहे। मन रहने को स्वतंत्र है। सारे कर्तव्य निभाते हुए, एक लंबा जीवन जीते हुए भी। विभाजन की त्रासदी पर रुपा सिंह जी की एक अति लोकप्रिय कहानी “दुख्खा दी कटोरी सुख्खा दी छल्ला” का असर अभी पढ़ने वालों के मन से उतरा नहीं होगा। प्रेम की ऐसी ही अद्भुत, साँस में अटकी हुई गाथा है वेदांग रैना (नसीरुद्दीन का युवा चरित्र निभाने वाले) और शरवरी की। डिमेंशिया के शिकार नसीर उर्फ ईशर वर्तमान की चौहद्दी छोड़ 1947 की स्मृतियों को जीने लगते हैं। बंटवारे से पहले का समय, प्रथम प्रेम की सुवास और बिछड़ जाने का दर्द। लंदन से आए पोते का उनकी अस्पष्ट बातों से प्रेम की गहन अनुभूति की तड़प को समझना और उन्हें उससे मिलाने का प्रयास कथानक का सार है।

विभाजन और प्रेम की जीवंत कथा- मैं वापस आऊँगा

पर फिल्म में प्रेम के रंग के साथ विभाजन की त्रासदी का वीभत्स रंग भी है। इतना वीभत्स की फिल्म देखते हुए दर्शक कराह उठते हैं, “इस सुंदर दुनिया को नफरत की आग में झोंकने वाले दुनिया से उठ क्यों नहीं जाते।” पर शायद वो रक्तबीज हैं, जहां एक बूँद गिरती है वहाँ हजारों उठ खड़े होते हैं और टूट जाती हैं मासूम साँसे, मुक्कमल हुए बिना छूट जाती है प्रेम कहानियाँ, साथ में चलता है ट्रॉमा। जिसके शिकार नसीर हर रोज जोर पुकारते हैं। घर वाले हर बार दौड़कर देखते हैं।  परेशान होते हैं। फिल्म में बार-बार रैडक्लिफ़ रेखा पर सवाल उठाए गए हैं। अभी हाल में वरिष्ठ उपन्यासकार डॉ. अजय शर्मा जी का उपन्यास ‘हिन्दुस्तानी मेमने’ पढ़ा था उसमें भी उन्होंने रैडक्लिफ़ रेखा को संदेह के घेरे में लिया था। जिसे आनन फानन में बनाया गया, बिना सर्वेक्षण के। जिसका खामियाजा बॉर्डर के राज्यों के बहुत झेला।

फिल्म कुछ हद तक बिना कमिटमेंट वाले प्रेम की तुलना उस जमाने के भोले प्रेम से करती है, जो 78 साल बाद भी वैसे ही सुरक्षित है। अगर दिलजीत का करेक्टर देखें तो बात सिर्फ प्रेम की नहीं है। नौकरी हो देश हो, पैशन हो वह कहीं भी स्थिर नहीं है। जैसे उसे बदल-बदल कर बहुत कुछ ट्राइ करना है। क्या प्रयोग के इस सुख में स्थायित्वहीनता का दुख भी छिपा है। जो उसे बेचैन कर रहा है? वस्तुतः दिलजीत की यह खोज जीवन को अर्थ या उद्देश्य देने की खोज है। एक स्थान पर वह कहता भी है कि-

“हम सब के अंदर प्रेम एक जहर की तरह इतना भरा हुआ है कि हम उसे पूरा किसी एक जगह निकाल देना चाहते हैं। एक-एक बूँद तक। फिर चाहें वह कोई व्यक्ति हो, काम या पैशन”

यहीं से उसको भारत वापस आकर पसंद का काम करने की प्रेरणा भी मिलती है। लेकिन दिलजीत का दिल्ली का भव्य घर, आर्थिक स्थिति देखकर इसे हर युवा पर लागू नहीं किया जा सकता। जैसा की कुछ समीक्षक कर रहे हैं। जॉब की कमी, बदलती हुई जीवन शैली (इसमें माता-पिता भी शामिल हैं) विवश करती है घर छोड़कर जहां काम मिल जाए वहाँ जाने के लिए। संबंधों के खालीपन को ढोते हुए। जैसा की कैफ़ी हाशमी की कहानी ‘चाबी’ से गुजरने से लगता है। वहीं फिल्म के एक दृश्य में लंदन निवासी दिलजीत देश प्रेम के नशे में मगन है तो उसका दोस्त यहाँ की गरीबी को रेखांकित करता है। यह पूछने पर कि तुझे देश से प्यार नहीं है। वह कहता है कि, “एन आर आई हो जाऊंगा, तब हो जाएगा” अच्छा तंज है।

अब पुराने जमाने को ही लें तो नसीर के बेटे को इतने अच्छे परिवार के होते हुए भी दुख है कि उनके पिता के उन लोगों को कभी समय नहीं दिया बस पैसे कमाने में लगे रहे। लेकिन सब कुछ गंवा चुके पिता का अपना दर्द है। असुरक्षा उसे और-और कमा लेने की ओर खींचती है। यहाँ तक की मृत्यु शय्या पर पड़े ताया जी के लिए वह चार घंटे को भी अपना काम नहीं रोकते। हर पात्र का मनोविश्लेषण बहुत बारीकी से किया गया है। परिस्थितियाँ व्यक्तित्व का आधार है।

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एक बात और गौर करने लायक है कि दिलजीत साँझ जिसका पैशन स्टैन्ड अप कॉमेडियन बनने का है। शुरू में उसकी कॉमेडी बहुत फ्लॉप है। वहाँ वह कॉमेडी को भविष्य की निराश से जोड़ता है। लेकिन बाद में वह भारत आ कर डार्क कॉमेडी करता है। जिसमें अतीत के दुख-दर्द पर तंज हैं।यहाँ उसे सुनने वाले लोग मिलन शुरू हो जाते हैं। लेखन से जुड़े लोगों के लिए ये बात गौर करने योग्य है

गहरी व्यंग्य रचना किसी विसंगति या दर्द से उपजती है।

 

अगर कलाकारों के अभिनय की बात की जाए तो सभी ने अच्छी ऐक्टिंग की है। वेदांग रैना और शरवरी ने भी शानदार अभिनय किया है। उनके प्रेम में एक सच्चाई दिखाई देती है जो किरदार को विश्वसनीय बनाती है। शरवरी स्क्रीन पर आते ही उसे जैसे रोशन कर देती हैं। उनके किरदार में मासूमियत भी है और भावनात्मक गहराई भी। दोनों की  केमिस्ट्री अच्छी लगती है। फिर भी कई जगह एक्टिंग दिखती है जो काम सिर्फ आँखों से होना चाहिए था उसमें अदा आ जाती है। पुराने जमाने की हीरोइनों में भी हम इस अदा का पुट देखते हैं। जबकि गुपचुप वाला प्रेम बिहारी के दोहे की तरह होता है-

‘कहत, नटत रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात।

भरे भौन मैं करत हैं, नैननु ही से बात॥

फिल्म में अगर किसी ने जरा भी एक्टिंग नहीं की है तो वह नसीरुद्दीन शाह हैं। उन्होंने ईशर सिंह के किरदार को निभाया नहीं, जिया है। भूलती हुई यादें, अधूरी बातें, खोया हुआ प्यार और आखिरी बार अतीत को छू लेने की बेचैनी, सब कुछ उनके चेहरे पर दिखाई देता है। कई दृश्य ऐसे हैं जहां  बिना संवाद बोले भी वह दर्शकों को भावुक कर देते हैं। प्रेम की इससे बड़ी गहराई क्या होगी कि जिससे बिना बताए देश छोड़ दिया उसे बिना बताए दुनिया नहीं छोड़नी है।

दिलजीत दोसांझ ने अपने किरदार को सहजता से निभाया है, लेकिन सच यह है कि फिल्म का सबसे भावुक और प्रभावशाली हिस्सा नसीरुद्दीन शाह और वेदांग रैना के हिस्से में गया है। दिलजीत  कहानी का जरूरी हिस्सा तो हैं पर यादगार नहीं। फिल्म निर्देशन में इम्तियाज अली की सबसे बड़ी ताकत हमेशा से भावनाओं को पकड़ना रही है और यहां भी वही दिखाई देता है। एक दृश्य में जब वेदांग को उसके परिवार की महिलाओं के बारे में बताया जा रहा है वहाँ कैमरा सिर्फ बताने वाले के कान पर है, जैसे उसे वो चीखें अभी भी सुनाई दे रहीं हों। फिल्म के सबसे मार्मिक दृश्य में वे खून की एक बूँद नहीं दिखाते पर चेहरे के भाव और आवाज से वो दर्द महसूस करा देते हैं कि घर आने के बाद भी दर्शक उससे निकल नहीं पाता है। वहीं बुजुर्ग नसीर का टीवी देखते हुए रिपोर्टर, ऐंकर बात करना अपने घर के बुजुर्गों की याद दिला देता है। वह बंटवारे को आंकड़ों या इतिहास की किताबों की तरह नहीं दिखाते। वह महसूस कराते हैं कि अचानक से बिछड़ना कैसा लगता है। किसी अपने का अचानक छूट जाना कैसा लगता है।

 

इम्तियाज अली और ए आर रहमान की प्रसिद्ध जोड़ी द्वारा रचा गया इस फिल्म का संगीत कहानी का हिस्सा बनकर आता है। बैकग्राउंड साउन्ड कई दृश्यों को उकेरने में मददगार है। गाने फिल्म को भावनात्मक गति देते हैं। कुछ गाने सुनने के बाद याद भी रह जाते हैं पर वे इसे उस मुकाम तक नहीं ले जाते जहां जहाँ में ठहर जाएँ। सिनेमेटोग्राफी बहुत शानदार है। सरगोधा की गलियां, पुराने घर, खेत और उस दौर का माहौल स्क्रीन पर बहुत प्रभावी तरीके से उभरकर आता है। कई स्थानों पर प्रतीकात्मकता का प्रयोग भी अच्छा लगता है।

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फिल्म एडिटिंग से और कसी जा सकती थी। फिल्म का पहला हिस्सा थोड़ा खिंचा हुआ लगता है कई बार लगता है कि फिल्म अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए जरूरत से ज्यादा इधर-उधर घूम रही है। लेकिन दूसरे हिस्से में कहानी भावनात्मक तौर पर मजबूत होती जाती है और अंत तक आते-आते गहरा असर छोड़ती है और फिल्म दर्शक के मन-मस्तिष्क में चलने लगती है। अंततः यही कहूँगी कि यह एक अच्छी परिवार के साथ देखने लायक फिल्म है। जहां अहसासों को जीया गया है । पुराने जमाने के सिनेमा की तरह एक याद रह जाने वाला सिनेमा।

वंदना बाजपेयी

वंदना

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