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स्वर्ण, रक्त और ब्रह्मपुत्र – पुस्तक चर्चा

 

डॉ. ज्योत्सना मिश्र जी की पेंगुइन स्वदेश से आई पुस्तक “स्वर्ण, रक्त और ब्रह्मपुत्र एक बहुप्रतीक्षित पुस्तक थी। इसका कारण ये है कि इसके शोध के दौरान उनके कौतूहल, परिश्रम और जुनून की मैं साक्षी रही हूँ। भारत के हर भूभाग का एक लंबा इतिहास रहा है । इतिहासविदों ने उन्हें समेटा है और साहित्यकारों ने उसे जनमानस तक सहज, रोचक कथाभाषा में पहुंचाया है। ये पुस्तक भी उसका उदाहरण है। इस पुस्तक में अहोम साम्राज्य के 600 वर्षों का इतिहास समाया है। आश्चर्य यह है कि इतने लंबे शासनकाल के बावजूद इस इतिहास के बारे में अधिकतर भारत अनभिज्ञ है। इन 600 वर्षों में करीब 40 राजाओं ने शासन किया, विकास और विस्तार किया । जिसमें “सोने के बागों के देश” के नाम से विख्यात असम के ऊपरी भू भाग में आए मोंगमाओं के अहोम राज्य की स्थापना करने, युद्ध, राजनैतिक दाँवपेंच, आपसी कलह, मुगल आक्रमण, धार्मिकता के आधार पर प्रकृति पूजक सोमदेव से शंकरदेव तक की यात्रा और नववैष्णव धर्म का सूत्रपात, आखिरी राजा पुरंदर के सिंहासन पर आरूढ़ होने पतन और अंग्रेजों के आधिपत्य तक विस्तृत कथा  रोचक और सरल भाषा में सुनाई जाती है।

स्वर्ण, रक्त और ब्रह्मपुत्र

सुनाई शब्द का प्रयोग इसलिए क्योंकि पूरी कथा का सूत्रधार बिजॉय बरमूरा हैं जो अपने पोते पुरंदर को अहोम वंश का इतिहास बता रहे हैं। पुरंदर को उसके पिता ब्रजनाथ की मृत्युदंड की घोषणा के बाद बचाते हुए बिजॉय बरमूरा छिपते-छिपाते बंगाल लाकर वहाँ पाल रहें हैं। उनका सपना है कि एक दिन बड़ा होकर वह गद्दी संभाले। इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु वे उसे अपने इतिहास और परंपराओं से जोड़ रहे हैं।

1228 में असम के ऊपरी भाग में अहोम साम्राज्य की स्थापना किसी विस्तार वादी राजा की महत्वाकांक्षा न होकर एक मोंगमाओं क्षेत्र (वर्तमान के वियतनाम, बर्मा और चीनी हुनान के कुछ क्षेत्र) के ऐसे युवराज सुफाका के विस्थापन की कहानी है, जिसे अपने मामा द्वारा गोद लिया गया । लेकिन जब वृद्धवस्था में उनके स्वयं का पुत्र हो गया तो परिस्थितियाँ बदल गईं। अपने छोटे भाई के प्रति प्रेम और कालांतर में उसके राजा बनने से उन्हें एतराज नहीं था। डर था तो जनता के अपने प्रति प्रेम जनित विद्रोह का। इसीलिए उसने छिपते-छिपाते उस स्थान की जाने का निर्णय लिया जिसके प्रति वह बचपन में “सोने के बागों के देश” के नाम से आकर्षित था। पहले भी कुछ कबीले वहाँ जा-जाकर बसते रहे थे। सुफाका के साथ भी उसकी रानियाँ-बच्चे निकले थे पर धीरे-धीरे कई कबीले आ-आकार जुडते गए । 13 वर्षों की वर्षा, आकाल, रोग,  कबीलाई हमले खासकर नागा कबीलों के हमलों से भरी ये यात्रा आसान नहीं थी सब बाधाओं को पार कर जब वे गंतव्य पर पहुंचे तो वह स्थान भी वैसा नहीं था जैसा कहानियों में सुना था। उसी जमीन पर उन्होंने सम्राज्य की स्थापना की और यहीं से अहोम राजवंश की नींव पड़ी।

खास बात ये है कि अहोम राजाओं में अपने इतिहास को लिखने की परंपरा रही है। उनका इतिहास “बुरंजी” में संग्रहीत है। ये परंपरा सुफाका के समय से ही रही है। लेकिन उससे पहले का इतिहास नहीं मिलता। सातवीं से बारहवीं सदी के इतिहास की जानकारी ह्वेन सांग के दस्तावेजों से मिलती है।  असम नामकरण के बारे में भी कई किवदंतियाँ हैं। प्रमुख मान्यता के अनुसार किसी जोशीले अहोम ने युद्ध घोष के उन्माद में कहा ‘आ चाम यानि अविजित अपराजेय और कालांतर में यह असम हो गया। असम नाम के विषय में लेखिका कुछ अन्य कथाओं का भी जिक्र करती हैं। वैसे ही ताई  और शान शब्दों के उनके प्रयोग के आधार पर बारीक अंतर को भी बताती हैं। वहीं भूमिका से लेकर असम प्रदेश से संबंधित कई पौराणिक सूत्र भी देती चलती हैं। फिर चाहें वह नरकासुर का हो, शिशुपाल का हो या कभी शिव द्वारा भस्म किया गया कामता राज्य।

 

स्त्रियों के प्रति इतिहास कैसे समान व्यवहार करता है जानकार दुख होता है फिर चाहें जनता द्वारा स्वीकार की गई कामता की रजनी हो, स्त्री स्त्री द्वेष की शिकार छोटी रानी हो। परित्यक्त ब्लाससेंग हो या फिर मात्र एक नागा की प्रशंसा करने वाली सुहंगमूंग की रानी हो। अलग अलग काल में ब्याह कर आईं कामता की ही दो राजकुमारियों रजनी और भजनी के नाम की साम्यता सुख भी देती है। राजनीति और धर्म की साँठ-गाँठ, हिन्दू दर्शन और सोमदेव वाले प्रकृति दर्शन की भिन्नता और साम्यता का विश्लेषण  धर्म और दर्शन के मर्म तक पहुँचने में सहायता करती है। वहीं ये जानना भी रुचिकर लगा कि जिन राजाओं के शासन काल में युद्ध नहीं हुए उनके इतिहास में कुछ खास नहीं रह गया।  दिहिंगिया, सारींगिया, टीपामिया, तुंगखूंगीया और नामरूपिया जनपदों के साथ पहाड़ियों और नदियों के नाम किस युद्ध और संधि के बाद पड़े समृद्ध करता है। मेरे मन में प्रश्न भी उठता रहा कि हम इतिहास पढ़ते हैं कि एक छोटी मछली के कारण भी बड़ा युद्ध हो सकता है…  पर उससे सीखते भी हैं। या ये सब मानव की मूल प्रवृत्ति है जो आदि-अनादि है।

 

निजी अनुभव की बात करूँ तो जब पुस्तक मेरे हाथ में आई तो मूलतः असम के अहोम साम्राज्य के 600 वर्षों के इतिहास को धीरे- धीरे स्वाद लेकर पढ़ा। नए नामों और नई जानकारियों के साथ उस समय के भारत, बर्मा, स्याम देस, चीन के कुछ अदृश्य नक्शे मन में बनते रहे। राजाओं और नागा  कबीलों के युद्धों तत्कालीन दृश्य उभरते रहे। पुस्तक की खास बात यह रही कि सुकाफा, सुत्युफ़ा, सुबिनका, सुखंगफा, स्तूका आदि नामों की साम्यता के पाठकीय निदान का  के तौर पर एक फ़्लो चार्ट शुरू में ही दे दिया गया है ताकि कहीं पढ़ते हुए कन्फ्यूजन हो तो पीछे पलट कर देखा जा सकता है। लेखिका अंत में संदर्भ सूत्र भी देती हैं, जो उनके विशाल अध्ययन को प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करता है।

अंत में यही कहूँगी कि “स्वर्ण, रक्त और ब्रह्मपुत्र” के रूप में ज्योत्सना जी ने बाद काम किया है। जो असम,  अहोम साम्राज्य  और मानवीय प्रवृत्तियों को समझने में सहायक रहेगा।

ढेरों बधाई और शुभकामनाएँ

वंदना बाजपेयी

वंदना

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