बघेली रामलीला
रंगपुर की बघेली रामलीला का अब तक का यह पहला रावण है जिसे लोगों ने इतना पसंद किया। प्राप्त ख्याति के चलते वह अक्सर भूल जाता है दरअसल उसका नाम लंकेश नहीं पूजा राम पाण्डे है। वार्षिक रामलीला के आरम्भ होने से पहले जब एक बार स्थानीय टी0वी0 चैनल ने उस पर कार्यक्रम किया और अखबार के स्थानीय संस्करण में तस्वीर के साथ उसका साक्षात्कार प्रकाशित हुआ तब लोगों ने जाना जो लंकेश के तौर पर चिन्हित होता है उसका वास्तविक नाम पूजा राम पाण्डे है। लोगों ने जाना लेकिन वास्तविक नाम उन्हें याद नहीं रहा क्योंकि लंकेश नाम का प्रभाव प्रबल था। लोग उसे कहीं भी देखते ही कहते देखो लंकेश जा रहा है। वह जब भी बैंक जाता उसका काम प्राथमिकता में किया जाता कि यह रंगपुर का गौरव लंकेश है। रंगपुर की तीन – चार बाइक और दो – कारों के पीछे सुवाच्य अक्षरों में लिखा गया रावण जाहिर करता है यहॉं रावण के कितने फैन मौजूद हैं। उसने एक बाइकर से पूछ लिया – ‘’रावण क्यों लिखा है ?’’
बाइकर ने चमत्कृत होते हुये बताया ‘’रावण बल, बुद्धि, साहस, धैर्य का प्रतीक है। बघेली राम लीला में इन दिनों जो रावण है वह इतना प्रभावशाली है कि मैं उसका फैन बन गया हूँ।‘’
उसकी इच्छा हुई थी कहे बल, बुद्धि, साहस, धैर्य का पुंज तुम्हारे सामने खड़ा है पर बाइकर उसे फरेबी समझ लेगा क्योंकि उसकी पहचान वह खुद नहीं उसका मेकअप है। लेकिन बाइक पर रावण लिखा देखकर उसकी लम्बी भुजाओं में जोश भर गया था। रावण, रामायण का खल पात्र है इसलिये दर्शक आमतौर पर उससे प्रभावित नहीं होते हैं। प्रभावित या भावुक होकर उसे सम्मान राशि देने की उदारता नहीं दिखाते हैं। सम्मान राशि राम, भरत, लक्ष्मण जैसे पूज्यनीय पात्रों को दी जाती है। संचालक माइक पर ससम्मान बताता है – आदरणीय निर्वाण भैया, निवासी सनेही ने राम को एक हजार एक रुपये की सम्मान राशि भेंट की है। बघेली राम लीला मंडली उनका वंदन – अभिनंदन करती है। वह अपने अभिनय और अट्टहास से दर्शकों का ध्यान खींचने में सफल रहा उसके लिये यही पुरस्कार है।
पूजा राम बघेली रामलीला मंडली से 1975 के आसपास जुड़ा। वानर सेना का वानर, निशाचर सेना का निशाचर, अशोक वाटिका का माली बनने से लेकर लंकेश तक का सफर तय करते हुये मंडली उसका जीवन – जगत बन गई है। रंगपुर में बघेली रामलीला मंडली का ऐसा प्रभुत्व है कि अन्य मण्डली पूरी तरह नहीं जम पाती। रामलीला का मंचन आश्रम के विस्तीर्ण भूभाग में होता है। आश्रम का तीन एकड़ का विस्तार किसी किस्म का कब्जा नहीं है। आश्रम की संकल्पना करने वाले अवध बिहारी जब यहॉं बसे भूमि की कोई कीमत नहीं थी। भूमि कम पेड़ – पौधे अधिक नजर आते थे। जिसे जहॉं बसना हो जंगल साफ कर बस जाता था। अब आश्रम का बाजार मूल्य करोड़ों में है। बघेली रामलीला मंडली का आरम्भ अवध बिहारी के पुत्र छैल बिहारी ने किया था। अब छैल बिहारी के पुत्र बॉंके बिहारी महंत की पदवी ग्रहण कर आश्रम प्रमुख की गादी पर बैठते हैं। भारत में राम लीला ग्यारहवीं शताब्दी के पहले से होती आ रही है। बघेली रामलीला ने इस परम्परा को रंगपुर का विशेष अवसर बना दिया है। मंडली से जुड़ने को पूजा राम बहुत बड़ा अवसर मानता है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि से आरम्भ होने वाले शारदेय नवरात्रि के नौ दिन उसे बचपन से लुभाते रहे हैं। चारों ओर बढ़ जाती चहल – पहल उसे ऊर्जा से भर देती। नौ दिन मानो एक अलग दुनिया बना देते हैं। दशहरे के बाद थम जाती चहल – पहल उसे अभाव की तरह लगती। जैसे दिनचर्या में कोई खोट आ गया है। उसके गृहग्राम बहुती में स्कूल के मैदान में रामलीला होती थी। लोग घरों से आसन, बैठकी, बोरा, फट्टा ले जाते। आगे बैठने के लिये दंगल होता। आगे जगह पाने के लिये वह और उसका छोटा भाई सखा राम शाम से अपना बोरा बिछा लेते। कोई उनका बोरा हटा कर अपना बिछाने लगता तो हुमक कर लड़ते। ठंड का आगाज कराती रातें बारह – एक तक हिम शीतल होने लगतीं पर राम लीला का लगाव उठने न देता।
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मंच पर हनुमान का आगमन होते ही वह और सखा राम हाथ लहरा कर शक्ति भर कंठ फाड़ जय श्रीराम उच्चारते। पुकार मंच तक पहुँची कि नहीं पहुँची पर दोनों भाईयों को एक – दो बार वानर सेना में वानर बनने का अवसर मिल गया। मुँह में लाल रंग पोत, नकली पूँछ लगा, लाल लँगोट पहन, गद उठा कर एक परिधि में गोल – गोल चक्कर लगाते हुये वानर जय श्रीराम कहते। गोटा किनारी लगे काले वस्त्र पहने अच्छे डील – डौल वाले निशाचर छोटे वानरों को उठाकर मंच के पीछे छोड़ आते। वानर फिर लौटते और गदा युद्ध, मल्ल युद्ध करते। एक बार वानर का मेकअप कर सो जाने के कारण पूजा पूजा राम मंच पर नहीं पहुँचा। मंडली प्रमुख ने उसे मुख पर काला रंग पोत निशाचर बनने की सजा दी। वह निशाचर नहीं बनना चाहता था पर रामलीला का आकर्षण प्रबल था। आकर्षण के कारण रामचरित मानस के दस दोहे रोज बॉंचने लगा। स्तुति, दोहा, चौपाई, सोरठा, सवैया लय से गाते हुये कंठस्थ हो गये। उन्हीं दिनों सुना रंगपुर में दशहरा पर्व की बड़ी धूम होती है। चारों ओर विद्युत प्रकाश की जगर – मगर रहती है। दशहरा मैदान में रावण वध होता है। चल समारोह देखने के लिये लोग दूर गॉंव से आते हैं। रात भर उस निर्धारित पथ के दोनों ओर बैठे रहते हैं जहॉं से झॉंकियॉं निकलती हैं। पूजा राम ने बाबू को मनाया –
‘’बाबू, रंगपुर का दशहरा दिखा दो।‘’
बाबू सहमत हो गया। उसे साइकिल से रंगपुर जाने का ऐसा अभ्यास था कि ग्यारह किलोमीटर की दूरी, दूरी न लगती थी। वह पूजा राम और सखा राम को साइकिल पर आगे – पीछे बैठाये हुये रंगपुर पहुँचा। शहर की छटा निराली थी। जगह – जगह बने देवी दुर्गा के पंडाल खाली पड़े थे क्योंकि चल समारोह में शामिल करने के लिये मूर्तियों को ट्रक, ट्रैक्टर ट्रालियों जैसे वाहनों से दशहरा मैदान ले जाया जा चुका था। रावण वध के बाद राम की शोभा यात्रा निकलती है। राम के रथ के पीछे झॉंकियॉं होती हैं। चयनित झॉंकियों को प्रथम, द्वितीय, तृतीय पुरस्कार दिया जाता है। चल समारोह में देर थी। बाबू आश्रम के समीप स्थित राम – जानकी मंदिर दर्शन करने चले गये। आश्रम में जब नौ दिन रामलीला होती है इस इलाके में चहल – पहल बढ़ जाती है। आज इलाका खाली था क्योंकि लोग रावण दहन देखने के लिये दशहरा मैदान चले गये थे। रंगपुर के सबसे भव्य मंदिर में बिराजी राम, जानकी, लक्ष्मण की मूर्ति पूजा राम को मनोहारी लगी। वह और सखा राम नेत्र मूँद हाथ जोड़ कर संस्कृत में राम की स्तुति सस्वर गाने लगे। समाज में किसे किस रूप में स्थापित होना है इसका निर्धारण नियति करती है। पूजा राम की नियति बघेली रामलीला से जुड़ने की थी। प्रक्रिया बिना अड़चन के इस तरह होती गयी जैसे तयशुदा थी। मंदिर में उपस्थित आश्रम के दो सदस्यों जटा शंकर और बिगुल का ध्यान स्तुति की ओर गया। सधा स्वर, शुद्ध उच्चारण, सरूपमान दो किशोर। राम और सीता का रोल करने वाले लड़के बड़े हो रहे थे। राम, लक्ष्मण, सीता के मुख पर जिस लावण्य और कोमल भाव की दरकार थी बढ़ती आयु उसे कम कर रही थी। मंडली को सरूपमान – कोमल किशोरों की जरूरत थी जिन्हें कार्यशाला में अभ्यास करा कर राम, सीता के लिये निपुण बनाया जाये। त्रिपुण्ड्रधारी बिगुल, बाबू के समीप आया –
‘’ये बालक तो बहुत सुंदर गाते हैं।‘’
बाबू ने ग्रामीण सादगी में हाथ जोड़ दिये –
‘’जी, स्तुति, भजन सब याद किये हैं।’’
‘’दूनौ बालक आपके हैं ?’’
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‘’हौ।‘’
‘’कहॉं रहते हैं ?’’
‘’बहुती। यहॉं से ग्यारह किलो मीटर है। लड़किन को दसहरा का जलूस दिखाने आये हैं।‘’
‘’बहुती में विद्यालय है ?’’
‘’हौ। दूनौ पढ़ते हैं।‘’
‘’बघेली रामलीला का नाम सुने हैं ?’’
‘’नहीं। बहुती में रामलीला होती है। ईं दूनौ एक – दुइ बेर वानर अउर निसाचर बने हैं।‘’
‘’बहुत सुंदर। बेटा तुम्हारा नाम क्या है ?’’
‘’पूजा राम। यह मेरा छोटा भाई सखा राम है। तीसरा भाई आभा राम बहुत छोटा है, इसलिये उसे नहीं लाये।‘’
पूजा राम ने अपनी सरलता में तीनों भाईयों का उल्लेख कर दिया।
‘’तीनों के नाम बहुत सुंदर हैं। जैसे रामलीला के लिये ही रखे गये हैं। हमारी रामलीला में काम करोगे ?’’
पूजा राम ने उम्मीद से बाबू को देखा। बाबू के चेहरे में कोई भाव न था। बोला –
‘’हम बहुती में रहते हैं। रंगपुर में कैसे रहेंगे ? हमसे नहीं होगा।‘’
‘’हमें राम और सीता की जरूरत है। आश्रम में कार्यशाला चलती है। अभिनय करना, संवाद बोलना सिखाते हैं। पहले छोटे रोल देते हैं। तब बड़े रोल देते हैं।‘’
पूजा राम को बहुती में राम बनने वाला लड़का असाधारण लगता था। इच्छा हुई तत्काल पीत वस्त्र धारण कर राम बन जाये लेकिन बाबू निराश कर रहे थे –
‘’बताये तो हम बहुती में रहते हैं।‘’
‘’आश्रम में बालकों के रहने की व्यवस्था हो जायेगी। आठ – दस कमरे हैं। महंत जी के कुछ चेले रहते हैं। इनका स्कूल में नाम लिखा देंगे। आप आते रहना। बहुती कौन दूर है ?’’
पूजा राम ने अधीरता में बाबू की भुजा झिंझोड़ डाली ‘’बाबू, मुझे रामलीला अच्छी लगती है।‘’
पूजा राम के उत्साह में बिगुल को सम्भावना दिखी –
‘’आप आश्रम की व्यवस्था देख लो। संतुष्ट हो जाओ फिर विचार करो।‘’
पूजा राम को यह आकस्मिक प्रस्ताव अवसर लग रहा था लेकिन बाबू के लिये असमंजस था।
‘’अभी तो इन्हें जलूस दिखा दें। फिर आयेंगे।‘’
‘’ठीक है। आश्रम, मंदिर के पास ही है। नेता, मंत्री, अफसर महंत जी का आशीर्वाद लेने आते रहते हैं। आप जब भी आओ मेरा नाम बता देना। मैं इंतजाम बना दूँगा। मेरा नाम बिगुल है। यह जटाशंकर है। चलता हूँ। हमें दशहरा मैदान पहुँचना है।‘’
बिगुल पूजा राम और सखा राम के शीश पर हाथ फेर कर चला गया। पूजा राम का जी कर रहा था जोर से चीख मार कर आनंद व्यक्त करे। बाबू ने चाट – फुलकी खिलाकर आनंद को चरम पर पहुँचा दिया।
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जुलूस देखने के लिये वे जिस चौराहे पर बैठे थे वहॉं जुलूस रात बारह पर पहॅुंचा। सबसे आगे राम का विजय रथ था। रथ में आरूढ़ राम, सीता, लक्ष्मण, हनुमान की निराली शोभा थी। पूजा राम मोहित हो गया। यदि वह राम बने तो रथ में बैठने का रोमांच पा सकता है। राम बनना कितना अच्छा लगता होगा। रथ के पीछे क्रमानुसार झॉंकियॉं आ रही थीं। ट्रक, ट्रैक्टर ट्रालियों के आगे आवंटित नम्बर समिति और मुहल्ले का बैनर लगा था। धीमी गति से बढ़ रही झॉंकियों के आगे तेज संगीत की धुन पर लोग नाच रहे थे। भीड़ में बिछुड़ जाने के भय से बाबू दोनों भाईयों का हाथ मजबूती से जकड़े हुये थे। पूजा राम की इच्छा हुई बाबू का हाथ झटक कर गजब का जोश दिखाते हुये झॉंकी के आगे नाचे पर भीड़ देख कर साहस नहीं हो रहा था। बहुती पहुँच कर पूजा राम ने उपद्रव किया। बघेली रामलीला में काम करेगा। रंगपुर के स्कूल में पढ़ेगा। बाबू, पूजाराम का मन बहलाने के लिये बहुती की रामलीला मंडली के प्रमुख शास्त्री जी से मिला। शास्त्री जी ने अच्छा सम्बल दिया –
‘’बघेली रामलीला मंडली का बहुत नाम है। शासन – प्रशासन सहयोग देता है। बड़े – बडे़ लोग चंदा देते हैं। मंडली रंगपुर में तो वार्षिक रामलीला करती ही है, आमंत्रण पर बाहर भी रामलीला करने जाती है। वैसे रामलीला नौ दिन की होती है पर आमंत्रण के आधार पर मंडली तीस दिन की रामलीला भी करती है। कई प्रसंगों का विस्तार से मंचन होता है। मैं महंत जी से परिचित हूँ। बॉंके बिहारी जी धार्मिक व्यक्ति हैं। जब भी रंगपुर जाता हूँ आश्रम में ठहरता हूँ। पूजाराम और सखा राम को अच्छा मौका मिल रहा है। तुम रंगपुर जाते ही रहते हो। घंटा, दो घंटा सुस्ताने की ठौर मिल जायेगी। छ: एकड़ के काश्तकार हो। तीन बच्चों की काश्तकारी में बसर न होगी। रंगपुर के अच्छे स्कूल में पढ़ कर बच्चों का भविष्य बन जायेगा। नौकरी पा जायेंगे। चाहो तो मैं साथ में चल सकता हूँ ……….
बाबू ने मानस बना लिया।
पूजा राम, सखा राम को लेकर शास्त्री जी के साथ आश्रम आया। बिगुल उन्हें ससम्मान महंत जी के कक्ष में ले गया। स्वच्छ करीने वाले कक्ष में बिराजे महंत का चेहरा तर भोजन के सेवन से चमक रहा था। भंगिमा में आत्मीयता, वाणी में मधुरता थी। मलिन जान पड़ते बाबू को दिलासा दी –
‘’…………… हम तो दस वर्ष की आयु से आश्रम के काम – काज में लग गये थे। आज देखिये गादी पर बैठे हैं। रामलीला आश्रम का उद्देश्य ही नहीं, संकल्प बन गई है। हम चाहते हैं रामलीला की परम्परा सुचारू चलती रहे। कार्यशाला में कितने कलाकार आये, गये गिनती नहीं है। ………… आश्रम में कुछ विद्यार्थी रहते हैं। आश्रम के काम – काज में मदद करते हैं। रामलीला में भाग लेते हैं। आप कमरे और कार्यशाला देख लो ………..अच्छा लगेगा ……… शास्त्री जी का सब देखा – भाला है।‘’
पूजा राम और सखा राम आश्रम में रहने लगे। बिगुल ने सरस्वती विद्यालय में प्रवेश दिला दिया। सखा राम का चित्त पढ़ाई में, पूजा राम का चित्त मंडली में अधिक लगता। वृहद परिसर को देख कर बौराया रहता। विशाल मैदान में रामलीला के मंचन के निमित्त बने सीमेन्टेड चबूतरे में अंगद की तरह पैर रोप कर खड़ा हो जाता – लंकेश उठा मेरा पैर। परिसर में केला, अमरूद, पपीता, आम, चीकू, जामुन के कई वृक्ष थे। जामुन के वृक्ष पर चढ़ कर एक पकी जामुन नीचे टपका देता – माता, मैं हनुमान। प्रभु श्री राम की चिन्हारी लाया हूँ। उसे मंच सज्जा, प्रकाश सज्जा, सिल्क के पर्दे, गेंदे के फूल की सजावट, तबला, हारमोनियम, ढोलक के संगीत का चस्का हो गया। मंडली में लगभग साठ कलाकार थे। अधिकतर स्थानीय होने के कारण कार्यशाला में अभ्यास के लिये आते और लौट जाते। कम ही आश्रम में रहते। तीन – चार माह पहले वार्षिक रामलीला की रिहर्सल होने लगती। बड़े बक्सों में रखी पोशाकें, मुकुट, नकली केश, गहने, हथियार साफ किये जाते। अभिनय और संवाद को निखारा जाता। आरम्भिक दो – तीन वर्ष तक पूजा
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राम और सखा राम को वानर के रोल मिले। फिर पूजा राम को भरत का रोल मिला। उसे स्कूल का सबक याद नहीं होता था पर संवाद सरलता से कंठस्थ कर लेता। चौपाईयॉं बॉंचता। कॉंपी में संवाद लिखता। दर्पण के सामने बोलता। मुख मुद्रा बनाना और संवाद बोलना सीखता। नकली घुँघराले बाल लगा, मुकुट और राजसी वस्त्र पहन, मेकअप कर दर्पण में देखता तो लगता अक्स पूजा राम का नहीं भरत का है। अक्स पर न्योछावर हो जाता। मेकअप किस तरह साधारण को असाधारण बना देता है।
उसने भरत की भूमिका ऐसी दक्षता से निभाई कि राम का असर मंद पड़ जाता। दर्शक भरत को सम्मान राशि भेंट करते। उसका कमाल देख कर उसे राम की भूमिका दे दी गई। उसके रूप में मंडली को इतना अच्छा राम मिल गया कि बिगुल को अपनी खोज पर गर्व होता। राम की भूमिका व्यापक थी। वे भगवान ही नहीं जन नायक भी हैं। राम जन्म, गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण, पुष्प वाटिका, सीता स्वयंवर, राम – जानकी विवाह, वनवास, केवट द्वारा गंगा पार कराना, शबरी के जूठे बेर खाना, शुपर्णखॉं की नाक कटना, सीता हरण, लक्ष्मण का मूर्च्छित होना, हनुमान का संजीवनी लाना, कुम्भकर्ण, मेघनाद वध, राम – रावण युद्ध, रावण वध, राम राज्याभिषेक। पूजा राम ने राम बनने के लिये बहुत मेहनत की। राम के चरित्र को समझने के लिये राम चरित मानस बॉंचता। राम की शालीनता को व्यक्त करने, संतुलित चाल से चलने। विनम्र संवाद बोलते चेहरे में कृपाभाव रखने, तीर – कमान चलाने का ऐसा अभ्यास किया कि राम बनना उसे खिलवाड़ की तरह लगता। वह राजकुमार और तपसी दोनों रूप में आकर्षक लगता। राम का विशेष श्रृंगार होता। माथे पर तिलक, भाल को घेरती हुई दोनों ओर कनपटी तक कई रंगों की नन्हीं बिंदकियॉं लगाई जातीं। दर्पण में रूप निहारता तो लगता लंका विजय नहीं विश्व विजय कर लिया है। उसका अभिनय देख कर दर्शक भक्तिमय हो जाते। सबसे अधिक अभ्यास उसने राम – रावण युद्ध का किया। ऐसा आवेशित हो जाता जैसे वास्तविक रावण को ललकार रहा है। दशहरे में रावण वध की धूम होती। दहन देखने के लिये लोग सूर्यास्त से जुहाने लगते। विशिष्ट नागरिकों के लिये एक ओर कुर्सियॉं लगाई जातीं। सांसद, विधायक, स्थानीय नेता, कलेक्टर, एस0पी0, अन्य अधिकारी बैठते। कुछ अधिकारी सपरिवार आते। आश्रम के गार्ड, वॉलेन्टियर, पुलिस बल तैनात रहता। वह कुर्सियों पर बैठे विशिष्ट जनों को गौरव से देखता। सबका ध्यान उस पर केन्द्रित रहता। दहन के पहले राम – रावण युद्ध होता। रावण गदा, तलवार, तीर का प्रयोग करता। वह इधर – उधर घूम – घूम कर रावण की नाभि के चौगिर्द तीर मारने का प्रयास करता। रावण मरने का अभिनय करते हुये भूमि पर चित्त हो जाता। निशाचर उसे उठा ले जाते। रावण दहन के बाद चल समारोह आरम्भ होता। राम, सीता, लक्ष्मण, हनुमान का रथ सबसे आगे होता। रथ के पीछे झॉंकियॉं चलतीं। जुलूस नगर निगम तिराहा, पुराना पावर हाउस, लाल बिहारी मार्ग, फूलचंद चौक, गणपत मार्ग, शास्त्री चौक, कोतवाली चौक, जय स्तम्भ होते हुये सेमरिया चौक पहुँचता। यहॉं से रथ आश्रम की ओर चला जाता। झॉंकियॉं विसर्जन के लिये आठ किलो मीटर टमस नदी जातीं। अगले दिन राम राज्याभिषेक के साथ वार्षिक रामलीला का समापन होता। सम्मानित लोग परम्परानुसार राम का तिलक कर आरती उतारते। कुछ लोग चरण छूते। उसे तलवों में गुदगुदी महसूस होती। लगता गगन छू लिया है।
उसके साथ दो साल तक गोप सीता बना। इस दौरान गोप का कद, पूजा राम से लम्बा हो गया। लम्बे कद के कारण गोप, सीता के लिये उपयुक्त न रहा। बिगुल ने सखा राम को बुलाया –
‘’सखा राम, तुम पूजा राम से अधिक सरूपमान हो। सीता बनो।‘’
सखा राम की रुचि पढ़ाई में थी। देखता था पूजा राम देर रात तक राम लीला करता है। दिन में सोता है। शाम चार बजे से सजने लगता है। स्कूल नहीं जाता। रामलीला के लिये बाहर जाता है तब कई दिन स्कूल नहीं जाता। सखा राम को लगा उसके सामने कोई इम्तिहान खड़ा हो गया है –
‘’गुरू जी, मैं पढ़ना चाहता हूँ। रिहर्सल में कई महीने लग जाते हैं।‘’
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‘’सीता का रोल किस्मत से मिलता है। जो सुंदर हो उसे ही दिया जाता है।‘’
‘’नहीं कर पाऊँगा।‘’
‘’अधिक नहीं करना है। राम के पार्श्व में बैठे रहना है। सीता हरण के अलावा सीता के संवाद बहुत कम हैं।‘’
‘’नहीं कर पाऊँगा।‘’
बिगुल ने सखा राम को प्रवर्त करने का भार पूजा राम पर डाल दिया। पूजा राम ने यथार्थ कहा –
‘’सखा तुम सीता नहीं बनोगे तो हो सकता है मंडली वाले मुझे भी बाहर का रास्ता दिखा दें। मैं रामलीला और आश्रम नहीं छोड़ना चाहता। बहुती में मोटा अनाज खाते थे, यहॉं अच्छा खाना मिलता है। अच्छा स्कूल है। वैसे भी एक – दो साल में तुम्हारा कद बढ़ जायेगा। सीता बनने के लायक नहीं रहोगे।‘’
‘’ये दो – तीन साल पढ़ाई के लिये बहुत जरूरी हैं भाई।‘’
‘’पढ़ाई हो जायेगी।‘’
सखा राम, सीता बन कर ऐसा लावण्यमय लगता था कि रावण बनने वाले पैंतीस साल के जीवन जिसने अपना नाम जीवन से जानी कर लिया था ने सीता स्वयंवर के मंचन के पहले कहा था ‘’सखा राम यदि मेरी शादी न हुई होती और तुम कन्या होते तो मैं शर्तिया तुमसे शादी करता।‘’
सुनकर सखा राम अन्यमनस्क हो गया। जबकि बिगुल ने हँसते हुये कहा –
‘’फर्राटा साइकिल चलाते हुये स्कूल जाते हो। धीमे चलो। दुर्घटना हो गई तो इतनी जल्दी दूसरी सीता नहीं मिलेगी।‘’
मंचन देर रात तक चलता। कलाकार दिन में सोते। जिस दिन सखा राम का रोल न होता स्कूल चला जाता लेकिन व्यस्तता के कारण होम वर्क पूरा न कर पाता। क्लास में नींद आती। क्लास में उसे सोता देख सर ने भर्त्सना की –
‘’क्लास में सोते हो। रात में क्या करते हो ? क्लास के बाहर जाकर सो जाओ।‘’
कह न सका सीता बनता हूँ। सहपाठी सीता माता कह कर उपहास करेंगे। चुपचाप क्लास से बाहर चला गया।
चल समारोह में रथ पर बैठ कर आशंकित रहता सहपाठी पहचान न लें। दो सहपाठियों ने पहचान लिया। वह दिन उसके लिये मनमुताविक बिल्कुल नहीं था। आश्रम पहुँच कर उसने सुबह देर तक अपनी नींद पूरी की। बिगुल ने बुला कर कहा –
‘’शोभा यात्रा में तुम्हारा व्यवहार सहीं नहीं था। सपन (हनुमान की भूमिका में रथ पर सवार था) ने बताया तुम पूजा राम से कह रहे थे बरसात में सड़क बहुत खराब हो गई है। रथ में धक्के लग रहे हैं। सुनो, शोभा यात्रा में वार्ता मत करो। असर कम होता है। श्रद्धा कम होती है। तुम्हें गरिमा बनाये रखते हुये सामने देखना चाहिये। तुम पर लोगों की नजर होती है। लोग प्रणाम करते हैं।‘’
उसे लगा बगावत कर संयम भूल कर इसी क्षण आश्रम तज दे। बिगुल पाबंदी लगा कर उसे बंदी की तरह रखना चाहता है। पूजा राम ने बिगुल को भरोसा दिया –
‘’आगे से गलती नहीं होगी।‘’
सखा राम व्याकुल मन लिये स्कूल पहुँचा। सहपाठी स्वागत में तैयार मिले –
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‘’सीता माता साइकिल पर सवार चली आ रही हैं।‘’
फिर तो विद्यालय परिसर में कहीं न कहीं सीता माता सुनाई दे जाता। यह सबकी नजरों से ओझल हो जाना चाहता। चाहता रातों रात कद बढ़ जाये तो सीता न बनना पड़े।
भगवान ने अरज सुन ली।
बिगुल ने सूचित किया –
‘’सखा राम, तुम्हारा कद पूजा राम के बराबर हो गया है। सीता को सुकुमारी लगना चाहिये। तुम लक्ष्मण बनोगे।‘’
सखा राम ने स्पष्ट कहा ‘’लक्ष्मण नहीं बनूँगा।‘’
‘’पहले जो राम बनता था, मंदोदरी बनने लगा है। तुम्हें तो लक्ष्मण बना रहा हूँ।‘’
‘’मुझे कॉलेज में एडमीशन लेना है। पढ़ाई और रामलीला एक साथ नहीं हो पाती।‘’
‘’अरे ? रामलीला से लोग ऐसी लगन लगा लेते हैं कि छोड़ना नहीं चाहते। जो लोग किसी रोल के लायक नहीं रहते मंच सज्जा, कलाकारों के मेकअप जैसे काम करने लगते है।‘’
‘’मुझे पढ़ाई पूरी कर नौकरी करनी है। अकेले बाबू कब तक घर सम्भालेंगे ?‘’
सखा राम ने मंडली छोड दी।
स्नातक के बाद डाक विभाग में बाबू बन गया
पूजा राम ने राम की भूमिका आठ साल की।
ये वर्ष शगुन की तरह थे।
मानो चिरकामना पूरी हो रही हो। नहीं सोचता था मोह भंग की स्थिति बनेगी। बिगुल वही कह रहा था जो अब तक कहता रहा था पर पूजा राम को लगा अफवाह बता रहा है –
‘’पूजा राम अब तुम राम नहीं बनोगे।‘’
‘’क्यों गुरू जी ?’’
‘’तुम्हारी उम्र बढ़ गई है। रामचन्द्र का चेहरा मुलायम होना चाहिये कि लोगों में उनके प्रति आदर के साथ दुलार का भी भाव जागृत हो।‘’
उसे साफ लगा पदवी छीनी जा रही है। सखा राम लम्बे कद के कारण सीता बनने के योग्य नहीं रहा, यह चेहरे की मुलामियत खत्म होने के कारण राम नहीं बन सकता –
‘’अच्छा तो कर रहा हूँ गुरू जी।‘’
‘’उम्र के बढ़ने को नहीं रोका जा सकता। जो इन दिनों मंदोदरी बनता है, पहले राम बनता था। तुम जैसे कलाकार को मंडली खोना नहीं चाहती। कैकेयी बनोगे।‘’
पुरुष से स्त्री।
जन नायक से खलनायिका।
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जिसे जन मानस का धिक्कार ही मिलता है। रामलीला देखने आई भावुक स्त्रियॉं वनवास प्रसंग पर कैकेयी को धिक्कारते हुये रोती हैं। राम के बाद कैकेयी बनना अवनति ही नहीं अपमान है। वर्चस्व पर प्रहार।
‘’मैं स्त्री पात्र नहीं बनना चाहता।‘’
‘’महत्वपूर्ण रोल है। कैकेयी न होती तो राम कथा आगे न बढ़ती। कैकेयी बनो फिर कुछ सोचते हैं।‘’
इच्छा हुई सखा राम की तरह मंडली छोड़ दे पर रामलीला उसका मकसद बन गई थी। उसने नये सिरे से तैयारी की। मुख पर स्मित कृपा भाव रखता था। अब आक्रोश, घृणा, ईर्ष्या के भाव रखने का अभ्यास किया। स्त्री रूप में हीनता आई लेकिन कौशिल्या, सुमित्रा, मंथरा बने पुरुषों ने हौसला दिया कि अभिनय, अभिनय होता है। राम का करो या कैकेयी का।
उसने कैकेयी बन कर दो वरदान मॉंगे – महाराजा मेरे पुत्र भरत का राज तिलक और राम को चौदह वर्ष का वनवास।
मेघनाद बन कर रावण को आश्वस्त किया – पिता श्री मैं कुम्भकर्ण काका के वध का प्रतिशोध लूँगा।
तभी मंडली को बड़ी क्षति हो गई। रावण बनने वाले जानी का सड़क दुर्घटना में निधन हो गया। जानी की कद काठी, स्वर, अट्टहास पूरी तरह रावण के अनुकूल था। वार्षिक रामलीला को दो माह शेष थे। बिगुल को हठात पूजा राम का ख्याल आया। पूजा राम रामलीला को अपना अभीष्ठ मानता है। छोटे रोल में इसकी प्रतिभा, सम्भावना नष्ट हो रही है। प्रतिभा का भरपूर उपयोग राम की भूमिका में हुआ। अब रावण की भूमिका में होना चाहिये। मनमुताबिक कद काठी, वजनदार आवाज है। अट्टहास सीख लेगा।
‘’पूजा राम तुम रावण बनोगे।‘’
बिगुल की पेशकश ने पूजा राम को विमूढ़ कर दिया। राम के किरदार से मानसिक रूप से विलग नहीं हुआ है। कैकेयी, मेघनाद के किरदार से जुड़ा नहीं है अब रावण। रावण को सिर्फ और सिर्फ भर्त्सना मिलती है।
‘’गुरू जी मुझसे न होगा।‘’
‘’तुम्हीं से होगा। राम के रोल में आयु सीमा होती है। रावण के लिये नहीं होती। तुम किस्मत वाले हो कि राम के अनुरूप थे। रावण के भी अनुरूप हो। तुम राम-जानकी मंदिर में मुझे मिले इसे संयोग मानता हूँ वरना तुम्हारा टैलेन्ट लोगों तक न पहुँचता।‘’
‘’मैं रावण जैसा अधम नहीं बनना चाहता।‘’
‘’रावण की यह गलत व्याख्या है। किसी दिन महंत जी से उसके चरित्र को समझ लो। रावण के प्रशंसक बन जाओगे।‘’
सन्ध्या आरती के बाद बिगुल उसे महंत जी के कक्ष में ले गया। महंत जी ने उसके भय, भ्रम, भ्रांति का निवारण किया –
‘’पूजा राम तुम्हें रावण का चरित्र समझाता हूँ। राम – रावण युद्ध दो संस्कृतियों का युद्ध था। मंच पर मेकअप तुम्हारी पहचान होती है। लोग तुम्हें नहीं पात्र को पूजते या कोसते हैं। मेकअप के बिना तुम राम या रावण नहीं पूजा राम हो। रावण का अभिनय राम से कठिन है। वही कर सकता है जो सच्चा कलाकार है …………
‘’पर गुरू जी ………..
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‘’पर का समाधान बताता हूँ। रावण ने राम कथा को रोचक बना दिया है। यह विरोधाभास न होता तो राम कथा आगे न बढ़ती। राम के बाद दूसरा प्रमुख पात्र रावण ही है …………. सुनो रावण ब्राम्हण, विद्वान, वीणावादक, छंद रचने वाला कवि था। दूर दृष्टि रखता था। ब्राम्हणत्व को याद रखता था। तुमने राम चरित मानस कई बार पढ़ी है। रावण के हाव – भाव, शासन काल, अर्थ व्यवस्था को समझते होगे। उसकी महानता को समझो इसलिये प्रसंग सुनाता हूँ। नाक कटने के बाद जब शूपर्णखां लंका आई रावण की सभा लगी थी। शूपर्णखां ने सभा में आर्तनाद करते हुये नाक कटने, खर – दूषण के मारे जाने की सूचना दी। रावण ने तत्काल सभा बर्खास्त कर दी। रात में उसे नींद नहीं आई कि खर – दूषण जैसे विशालकाय, शक्तिशाली योद्धाओं को नारायण के अतिरिक्त कोई नहीं मार सकता। राम निश्चित ही नारायण के अवतार हैं। राम के हाथों मरने से मोक्ष प्राप्त हो सकता है पर वे अकारण नहीं मारेंगे। उनसे बैर करना पड़ेगा कि वे मारने को बाध्य हों। रावण ने बैर करने के लिये सीता हरण किया। लंका पर आक्रमण करने के लिये राम सेतु निर्माण कर सेना सहित लंका पहुँचे। वे रावण की शक्ति को जानते थे। विभीषण से बोले ‘युद्ध में क्या मेरी विजय हो सकती है ?’ विभीषण बोला ‘विजय के लिये रावण का वध करना होगा। वह इतने दिव्यास्त्रों से सज्जित है कि उसका वध नहीं हो सकता।‘ राम ने कहा ‘मेरे पास भी दिव्यास्त्र हैं।‘ विभीषण अड़ा रहा ‘रावण के पास ब्रम्हास्त्र है। विजय पानी है तो विजय सार यज्ञ कराना होगा।‘ ‘यज्ञ कौन करायेगा ? मेरे पास संसाधन नहीं हैं।‘ ‘ब्रम्हा करा सकते हैं पर वे मर्यादा से बँधे हैं। धरती पर नहीं आयेंगे। रावण प्रथम प्रशंसित महर्षि पुलस्त्य का नाती है। यज्ञ करा सकता है। उसका दिमाक दस दिमाक के बराबर सक्रिय है।‘ ‘वह पराजित होने के लिये यज्ञ नहीं करायेगा।‘ ‘वह शिव का परम भक्त है। ब्राम्हणत्व का महत्व समझता है। प्रार्थना करने पर आचार्य बनने को सहमत हो जायेगा।‘ ‘प्रस्ताव लेकर किसे भेजें ?’ ‘जामवंत को। ये ब्रम्हा के पोते हैं। लंकेश इनका आग्रह नहीं टालेगा।‘ …………..जामवंत जब लंका पहुँचा रावण की कचहरी लगी थी। युद्ध के पहले जरूरी मसले निपटाना चाहता था। रावण ने जामवंत को प्रणाम किया ‘कैसे आना हुआ ?’ जामवंत बोला ‘मैं लंकेश से नहीं ब्राम्हण रावण से अपनी बात कहूँगा।‘ ‘विश्राम करो, कचहरी के बाद मिलता हूँ।‘ कचहरी के बाद जावंत ने उद्देश्य कहा ‘प्रभु राम विजयसार यज्ञ करना चाहते हैं। आप पुरोहित बनो।‘ मनोनुकूल प्रस्ताव रावण ने स्वीकार कर लिया। ‘अस्वीकार करना पुरोहित को शोभा नहीं देता। यज्ञ कराना मेरा धर्म है।‘ ‘मुहूर्त निकालो।‘ ‘सुबह साढ़े पॉंच बजे का मुहूर्त है।‘ ‘यज्ञ में लगने वाली सामग्री की सूचि बना दो।‘ ‘तपस्वी समुचित सामग्री एकत्र नहीं कर पायेंगे। सामग्री मैं लाऊँगा। यजमान का अनुष्ठान पूर्ण हो यह दायित्व पुरोहित का भी होता है।‘ कोई भी यज्ञ पत्नी के बिना पूर्ण नहीं होता। चूँकि यजमान अविवाहित, विधुर, परित्यक्त, सन्यासी नहीं है इसलिये पत्नी का होना आवश्यक है। मैं सीता को लाऊँगा।
इतना कह कर महंत कुछ क्षण चुप रहे। पूजा राम को देखा। वह दत्त होकर प्रसंग सुन रहा था। बोला –
‘’सीता देवी आईं ?’’
‘’हॉं। रावण ब्राम्हणत्व को कभी नहीं भूलता था। सीता के पास अशोक वाटिका जब भी गया मंदोहरी, बहुओं, दासियों को ले गया। अकेले कभी नहीं गया। सीता को लेने मेघनाद को भेजा। समुद्र के किनारे यज्ञशाला बनी। राम ने बालुका से शिवलिंग बनाया। तेजस्वी रावण यज्ञ स्थल पर जिस दिशा से आया उसके ब्राम्हणत्व के तेज से वह दिशा प्रकाशमान हो गई। मेघनाद, सीता को ससम्मान रथ पर लाया। रावण, राम से बोला ‘धर्म पत्नी को पार्श्व में बैठाइये। मैं सामग्री लाया हूँ।‘ रावण ने यज्ञ कराया। दिव्यास्त्र प्रकट हुआ। रावण बोला ‘यजमान इसे ग्रहण करो। इसके संहार से निशाचर सेना व्याकुल हो जायेगी।‘ दूसरा दिव्यास्त्र प्रकट हुआ। ‘इसके संहार से मेरी विद्या नष्ट हो जायेगी। तीसरे दिव्यास्त्र से मेरा वध होगा।‘ यज्ञ पूर्ण होने पर राम बोले ‘आचार्य दक्षिणा में क्या लेंगे ?’ रावण बोला
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‘इस समय आप वनवासी हैं। दक्षिणा मॉंग कर संकट में नहीं डालूँगा।‘ मॉंग लीजिये। जब सम्भव होगा दे दूँगा।‘ ‘हॉं, पुरोहित को दक्षिणा देने का विधान है। मेरे अंतिम समय में यजमान मेरे सम्मुख उपस्थित रहें। यही मेरी दक्षिणा होगी।‘ समझे पूजा राम ? राम – रावण युद्ध दो संस्कृतियों का युद्ध है। राम जानते थे रावण महान है। वे उसकी महानता को यज्ञ के माध्यम से सबके सम्मुख प्रकट करना चाहते थे। रावण सचमुच महान था। अपनी मृत्यु का इंतजाम कर लिया लेकिन ब्राम्हणत्व को नहीं छोड़ा।‘’
महंत चुप हो गये।
कक्ष में सम्मोहन।
महंत ने मंत्रमुग्ध पूजा राम से आहिस्ता से पूछा –
‘’क्या सोच रहे हो ?’’
‘’रावण के प्रभाव और प्रताप ने घेर लिया है।‘’
‘’मानसिक तैयारी करो इसीलिये कथा सुनाई। राम का रोल बहुतों को मिल सकता है जबकि रावण के लिये कद्दावर होना चाहिये।‘’
‘’महंत जी इस प्रसंग का मंचन क्यों नहीं होता ?’’
‘’रावण को महान दिखाने का रिवाज नहीं है। लोग स्वीकार नहीं करेंगे। जो प्रचलित है उसे ही स्वीकार करते हैं।‘’
पूजा राम ने रावण की चेष्टाओं को सीखने के लिये मेहनत की। विपरीत व्यवहार सीखा। तब राम की शालीनता सीखी थी अब रावण की उग्रता सीखी। राजहंस की तरह संतुलित चाल से चलता था अब तबला, मंजीरे से संगत कर भूमि पर कदम रोपते हुये पैर पटकता चलता। मुख पर स्थित मुस्कान रखता था अब अट्टहास करता। बॉडी लेंग्वेज से कृपा और करुणा व्यक्त होती थी अब हुंकार भरकर पराक्रम और अहंकार व्यक्त करता। पीत वस्त्र पहतना था अब काले कपड़े पहनता। नौ सिर वाला वजनी कनटोप धारण करता। रावण के चरित्र का प्रतीक बन गये अट्टाहास का ऐसा अभ्यास किया कि अट्टहास उसकी प्रसिद्धि बन गया। गत्ते की तलवार, हल्के वजन के गदा को ऐसे उठाता मानो बहुत बड़ा भार उठा रहा है। राम का मेकअप सादा और शालीन होता था अब भारी मेकअप करता। चेहरे में दर्प और दुष्टता दिखाने के लिये काजल या काली पेंसिल से भौंह को मोटी बनाता, ऑंखों को विशाल और बर्बर दिखाने के लिये मोटा काजल लगाता। आधे चेहरे को घेरती हुई घनी मूँछ लगाता। व्यवहार में अहंकार को कायम रखने के लिये लोगों से बहुत कम बोलता। भारी आवाज में संवाद बोलने के अभ्यास के कारण लोग उसे अहंकारी समझ लेते। रावण के चरित्र को जीते हुये उसे खुद भी लगने लगा वह पूजा राम नहीं लंकेश है।
सीता स्वयंवर, शूपर्णखॉं का आर्तनाद, सीता हरण, अंगद और हनुमान का लंका आना, कुम्भकर्ण, मेघनाद वध, राम – रावण युद्ध में ऐसा अभिनय किया कि कई लोग रावण के प्रशंसक बन गये। सीता स्वयंवर में जॉंघ में हाथ मार, हुंकार भर धनुष को ऐसे दबाता जैसे किसी के पैर दबा रहा है। दर्शकों की हँसी के बीच किसी की आवाज आती – रावण धनुष तोड़ने का बूता तुझमें नहीं है। राम को तोड़ने दे। सीता हरण में ललकार कर कहता – सीता तू मेरे कब्जे में है। किसी की आवाज आती – सीता मैया का अपहरण कर नरक में जायेगा अधम। राम – रावण युद्ध में चुनौती देता – राम बात न कर, रण कर। कहीं से आवाज आती – मरना तो तुझे है रावण। अहंकार किसी का नहीं बचता। रावण दहन के बाद उसकी भूमिका खत्म हो जाती। कुछ बार मेकअप उतार कर मूर्ति विसर्जन देखने टमस नदी गया। कुछ उत्साही लोग मूर्ति को थाम कर पानी में उतर जाते। हर साल एक – दो लोग डूब जाते। विसर्जन होते – होते भोर
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होने लगती। वह लौट कर सो जाता। अगले दिन रोजमर्रा वाले वस्त्र पहन कर राम राज्याभिषेक देखता। कोई न पहचानता क्योंकि वह लंकेश नहीं पूजा राम होता।
उसने रावण की भूमिका लगभग तीस साल की। वह मंडली का वरिष्ठ सदस्य था। राम, सीता, लक्ष्मण बनने वाले कलाकार उसका आदर करते थे। बाद के वर्षों में दर्शकों की संख्या में गिरावट आने लगी। जब रंगपुर में टी0वी0 आया तब से गिरावट का क्रम शुरू हो गया था। रामानंद सागर के रामायण सीरियल ने सभी वर्ग को ऐसा खुश कर दिया था कि प्रसारण के समय सड़कें वीरान हो जाती थीं। रामायण को वैसी भव्यता में देखने के बाद लोगों को रामलीला फीकी लगने लगी। इंटरनेट, मोबाइल, कम्प्यूटर आने पर सार्वजनिक स्थल पर जाने को लोग वक्त बर्बाद करना समझने लगे। बढ़ते टी0वी0 चैनलों ने घर में भरपूर मनोरंजन का प्रबंध कर दिया। नवरात्रि में युवा गरबा खेलने में मुब्तिला रहते। रामलीला का रुख वही करते जिनके पास मनोरंजन के साधन नहीं हैं। लेकिन रामलीला आज भी बदस्तूर होती है। कोरोना के कारण दो वर्ष नहीं हो सकी। पूजा राम को लगा था कभी न खत्म होने वाली फुर्सत से घिर गया है। जैसे दो साल उसके जीवन में आये बिना ही बीत गये। दो सालों में कई लोगों की खुशमिजाजी खत्म हो गई थी। रावण, कुम्भ कर्ण, मेघनाद के पुतले बनाने वाले हिंन्दू मुस्लिम कारीगर काम न मिलने से गॉंव चले गये। पूजा राम बहुती चला गया। अम्मा, बाबू जैसे ही पुरखे बने पुश्तैनी घर की पृष्ठभूमि बदल गई। उसने विवाह नहीं किया। सखा राम और आभा राम के विवाह हो गये। सखा राम अपने परिवार को लेकर माणिकपुर में रहता है। आभा राम पत्नी मोलिया और बच्चे के साथ बहुती में रहता है। खेती – काश्तकारी का हिसाब – किताब देखते हुये आभाराम ने बाबू की आसंदी सम्भाल ली। बताने लगा –
‘’भाई, मैं हर साल दस – बीस हजार का अमरूद बेच लेता था। इस बार अमरूद में कीड़े पजा गये हैं। कोरोना मनई को ही नहीं पेड़ पौधों, पशु – पक्षी को भी रोग लगा रहा है।‘’
‘’ठीक कहते हो। रामलीला न होने से मैं तो जैसे अपंग हो गया हूँ। पता नहीं कोरोना कब जायेगा।‘’
‘’लोग कहते हैं अब बहुत कुछ अनियमित होने वाला है।‘’
आभाराम ने ठीक कहा था।
बहुत कुछ अनियमित होने वाला है।
दो साल बाद वार्षिक रामलीला हुई। पॉंच अक्टूबर दो हजार बाईस को दशहरा की जगर – मगर वापस लौटी। रावण का पच्चीस फीट लम्बा पुतला बना। पुतले में फटाकों का प्रयोग वर्जित था लेकिन बिगुल ने फटाकों का प्रयोग कराया कि फटाकों की तेज ध्वनि से लोगों का मनोरंजन होता है। दो साल बाद रावण दहन हो रहा है। जोर – शोर से हो। दहन से पहले राम – रावण युद्ध हुआ। लाल वस्त्रधारी वानर जय श्रीराम, श्याम वस्त्रधारी निशाचर जय लंकेश का घोष करते हुये आपस में युद्ध कर रहे थे। राम और रावण अपना कौशल दिखा रहे थे। राम के तीर रावण के गदा, तलवार, तीर को विफल कर रहे थे कि तेज बारिश होने लगी। पूजा राम को आभा राम की बात याद आई – बहुत कुछ अनियमित होगा। लोग भागने लगे। युद्ध रोक दिया गया। पुतले भीग गये। रंगपुर के इतिहास में पहली बार हुआ कि भरपूर पेट्रोल डाल कर रावण दहन करना पड़ा। एक – डेढ़ घंटे में बरसात यूँ थम गई मानो रावण दहन को व्यर्थ करने के लिये ही हुई थी। पूजा राम को लगता है अनियमित बरसात उसे संकेत देने के लिये हुई थी कि तुम्हारा काम खत्म होने वाला है। बिगुल ने उसे बुलाया और इत्मीनान से कहा –
‘’पूजा राम अब तुम रावण नहीं बनोगे।‘’
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फैसला पूजा राम के वर्चस्व पर प्रहार था। यह तो कहते थे रावण की भूमिका इतनी योग्यता से आज तक किसी ने नहीं की।
‘’क्या हुआ गुरू जी ?’’
‘’वह बल और ठसक खो रहे हो जो रावण के चरित्र के लिये जरूरी है। उम्र के अनुसार भूमिका बदलती रहती है। जो कुम्भकर्ण बनता था अब कमर झुका कर बूढ़ी त्रिजटा बनता है। जो अंगद बनता था रावण बनेगा।‘’
‘’मेरे लिये क्या बचा है ?’’
‘’बड़े कलाकार हो। तुम्हें छोटे – मोटे रोल नहीं दूँगा। कार्यशाला में कलाकारों को अभिनय सिखाओ। मंच पर चौपाई गाओ। संवाद अच्छे लिखते हो।‘’
वह कमरे में अँधेरा किये बैठा रहा। संवाद वह लिखेगा लेकिन वाहवाही उसे मिलेगी जो मंच पर संवाद बोलेगा। मंच के पीछे की मेहनत पर किसी की दृष्टि नहीं जाती। उसने अपनी आजान बाहुओं को टटोला। न लम्बाई कम हुई है, न गठन। वह पहला रावण है जिसने लोगों का दिल जीता है। लोग वाहन में रावण लिखते हैं।
मोह भंग।
निष्कासन।
आश्रम का दाना – पानी, कपड़ा – लत्ता, ओढ़ना – बिछाना अब भाग्य में नहीं है। बिगुल को इत्तला दिये बिना बहुती चला आया। यहॉं भी धारणायें बदली हुई थीं। घर में न रहो तो अधिकार खत्म हो जाता है। सबंधी फरेब रचने लगते हैं। संबंध गलतफहमी की तरह हो जाते हैं।
आभा राम उसका भाई नहीं मोलिया का पति जान पड़ता था। पूजा राम तड़के जैसे ही खेत जाने को उद्धत हुआ आभा राम ने निषेध कर उसे अतिथि बना दिया –
‘’भाई, आराम करो। कुछ दिन को तो आये हो।‘’
‘’अब यहीं रहूँगा। बहुत हुई रामलीला। राम और रावण बनने के बाद मुझसे केवट या त्रिजटा न बना जायेगा।‘’
मोलिया को यही संशय था कि पूजा राम बसने आ गया है। दो दिन न टिकता था, अब माह पूज रहा है। वह अरुचि दिखा कर उसकी विश्रांति भंग करने लगी। पूजा राम अभिप्राय समझ रहा था पर कोई राह – ठौर सूझ न रही थी। ओसारी में लगी मसहरी में पड़ा राम की कालिमा को निहार रहा था। आभा राम का आठ साल का बेटा लाला आकर खटिया में बैठ गया –
‘’सो गये ताऊ ?’’
‘’नहीं। सबक कर लिया लाला ?’’
‘’हौ। ताऊ तुम रंगपुर क्यों नहीं जाते ?’’
‘’क्यों पूछ रहे हो ?’’
‘’अम्मा कहती है क्यों नहीं जाते। क्या यहॉं लंका दहन करोगे ? रावण नहीं बनाते हैं तो वैद सुषेण बन जाओ। लछिमन को शक्ति लगे, इलाज कर देना।‘’
‘’सो जाओ लाला। सुबह स्कूल जाओगे।‘’
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मंडली वाले रावण नहीं बनने दे रहे हैं। यहॉं पूजा राम बन कर रहने नहीं दिया जायेगा। शगुन वाले दिन देखे अब जेठ को भयाहू (छोटे भाई की पत्नी) से दूरी बना कर रहना चाहिये जैसे निर्देश के साथ ओसारी में उठना – बैठना करना पड़ रहा है। वह जिस परिवार का सदस्य था अम्मा – बाबू के पुरखा बनते ही वह परिवार खत्म हो गया। आभा राम का परिवार उसे सदस्य नहीं अतिथि मानता है जिसे अब चले जाना चाहिये। रामलीला में राम नाभि में तीर मारते थे, मोलिया कलेजे में मारती है। दुआर पर श्वान की भॉंति पड़े रहने से बेहतर है मंच पर चौपाई गाना। तीस साल रावण बना पर उसकी महानता पर गौर न किया। उसने राम का आचार्य बन अपनी मृत्यु का इंतजाम बनाया। मैं कार्यशाला में कलाकारों को मेकअप करना, अभिनय करना क्यों नहीं सिखा सकता ? रावण नहीं बन सकता पर उसकी महानता को जी सकता हूँ।
पूजा राम आश्रम लौट आया। सेवायें देकर मण्डली को प्रखर करने लगा। दिल्ली की रामलीला की प्रशस्ति सुनता था पर व्यापक संसाधन न होने से उस रामलीला से मुकाबला सम्भव नहीं था। उसने अपने स्तर पर अच्छा यत्न किया। हास – परिहास के लिये फिलर की तरह एक – दो जोकर रखे। स्थानीय कवियों को एक – दो गीत या गजल गाने का मौका देता – जिंदगी एक किराये का घर है, जिसे एक दिन बदलना पड़ेगा।
मौत तुझको जो आवाज देगी, घर से बाहर निकलना पड़ेगा …………..
जैसी पंक्तियों को दर्शकों की सराहना मिलती।
बिगुल की उम्र हो गई है। बीमार रहता है।
पूजा राम निदेशक बन गया है।
उसके निर्देशन में बघेली रामलीला मंडली की ख्याति बढ़ रही है।
………………………….
सुषमा मुनीन्द्र

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