темп на довгому трейловому підйомі

जरूरी है मनुष्य के भीतर बेचैनी पैदा होना

कुछ नया जानने , कुछ अनोखा रचने की बेचैनी ही वजह से ही विज्ञानं का अस्तित्व है |कब आकाश  पर निकले तारों को देख कर मनुष्य को बेचैनी हुई होगी की जाने क्या है क्षितिज के पार | तभी जन्म लिया ज्योतिष व खगोल शास्त्र ने | और खोल के रख दिए ग्रहों उपग्रहों के अनगिनत भेद | यह बेचनी ही तो थी जो उसे पानी से बिजली और बिजली के दम पर ऊँची – ऊँची अट्टालिकाओं में पानी चढाने की सहूलियत देती चली गयी | यह सच है की विज्ञानं की बदौलत मानव आज ” अपने एनिमल किगडम ” से ऊपर उठ कर सफलता के अंतरिक्ष पर बिठा दिया | विज्ञानं की बदौलत प्रगति के तमाम सोपानों को हासिल करने के बावजूद आज के आदमी की मानसिकता में बहुत बड़ा अंतर नहीं आया है.

आज भी वह उन मूल्यों का बोझ ढो रहा है, जो वैयक्तिक और सामाजिक चेतना पर आवरण डालने वाले हैं. वह आज भी उन परंपराओं में जी रहा है, जो केंचुल की भांति अर्थहीन हैं और गति में बाधा उपस्थित करने वाली हैं.

वह आज भी सोच के उस बियावान में खड़ा है, जहां उसका पथ प्रशस्त नहीं है और मंजिल तक पहुंचाने वाला नहीं है. ऐसी स्थिति में हम धरती पर जनम रहे, पनप रहे सारे गलत मूल्यों के साथ संघर्ष करने का संकल्प जगा सकें तो ऐसा क्षण भी उपस्थित हो सकता है जो मनुष्य के भीतर एक बेचैनी पैदा कर दे, उथल-पुथल मचा दे और ऐसी मशाल जला दे जो विचारों का सारा कलुष धोकर उसके सामने दिव्य उजाला बिछा दे.जब तक आदमी की सोंच या आदमियत में फर्क नहीं आएगा तब तक यह सफलता केवल भौतिक है | पर अपने मन में जमे हुए विचारों के खिलाफ संघर्ष ही उसे ” किंगडम ऐनिमेलिया से इतर देवताओं के समकक्ष लाकर खड़ा कर सकता है |

जरूरी है तीव्र इक्षा शक्ति और बेचैनी , जो सदैव ही नए विचारों , नए अनुसंधानों को जन्म देती रही है |आइये सारे गलत मूल्यों के साथ संघर्ष करने की इस मशाल को जलाए | जन जन के मन में बेचैनी पैदा करें …. और नए बेहतर विश्व का निर्माण करें |

ओमकार मणि त्रिपाठी
प्रधान संपादक – अटूट बंधन एवं सच का हौसला

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