व्यर्थ में न बनाये साहित्य को अखाड़ा



                                   

      ये विवाद सदा से चलता रहेगा कि कौन सा साहित्य बेहतर है ” गहन या लोकप्रिय”………  अपनी विद्वता सिद्ध करने के लिए या अपनी हताशा छिपाने के लिए साहित्यकारों में यह एक मुद्दा बना ही रहता है। पर मैं इस विवाद को सिरे से नकारती हूँ ………  दरसल साहित्य के रचियताओ ने साहित्य कि परिभाषा ही बिगाड़ दी है।  साहित्य कि एक मात्र सार्थक परिभाषा तुलसीदास जी ने दी थी जब वो कहते हैं ” कीरति भनिति भूति भलि सोई सुरसरि सम सब कहँ हित होई।। “

                                                    मेरे विचार से    साहित्य जनता तक अपनी बातो को,विचारों को  पहुचाने का माध्यम है अगर वो  महज पांडित्य प्रदर्शन का माध्यम बन कर रह गया तो  केवल लाइब्रेरियों में सज कर रह जाएगा,आम जनता न उसे समझ पाएगी न स्वीकार कर पाएगी।  फिर भी अगर  साहित्यकारों का यही उदेश्य है तो कुंठा क्यों ?वस्तुत : मैं प्रभात रंजन जी कि इस बात से सहमत हूँ कि आज का साहित्य आलोचकों को संतुष्ट करने के लिए लिखा जा रहा है. जो उसे क्लिष्ट और दुरूह बना रहा है ,साथ ही आम जनता कि पहुँच से बहुत दूर भी।  ऐसा साहित्य केवल साहित्य वर्ग में ही सराहा जाता है और कुछ त्रैमासिक , अर्धवार्षिक , वार्षिक साहित्यिक लघुपत्र -पत्रिकाओ में ही सिमिट  जाता है।” व्यापक रूप से न सराहे जाने न पढ़े जाने का क्षोभ साहित्यकारों कि बातों से साफ़ झलकता है.। इस निराशा के लिए  साहित्यकार और आलोचक और उनके द्वारा बनाये गए प्रतिमान दोनों  जिम्मेदार हैं  । 
                                                                                जहाँ तक मेरा मानना है गहन बात को सुगुमता से कह देना एक कठिन काम है ……….अह एक कला है और यही लोकप्रियता का पैमाना भी ।  अक्सर मुझे अपनी एक गणित कि शिक्षिका ध्यान में आती है जिन्हें गणित का ज्ञान बहुत था। हम सब उनके फार्मूलों को पकड़ने का प्रयास करते थे पर सदा असफल हो जाते। तभी किसी कारण वश एक दूसरी शिक्षिका कुछ दिन के लिए आई ,उन्हीने वही गणित हम सब के लिए सरल बना दी हमें पढने में आनद  आने लगा।  गणित वही  थी फोर्मुले भी वही थे पर दूसरी शिक्षिका ने उसे इतना सुगम बना दिया कि कक्षा  के हर बच्चे के समझ में आ जाये।  पर यह काम वही कर सकता है जो किसी विचार  को आत्मसात करे ,मथे और सरल बना कर प्रस्तुत करे।  कठिन बात को सरल बना कर कह देना कठिन काम है। ………. जो इस कठिन काम को कर पायेगा वही लोकप्रिय होगा ,साहित्य भी इससे अछूता नही है।
                                                 उदहारण के तौर पर मैं तुलसी कृत मानस कि बात करना चाहूंगी।  राम कथा कितने लोगों ने लिखी पर मानस ही लोकप्रिय है …. क्यों ? साहित्य के पुरोधा जानते हैं कि मानस को वह साहित्यिक दृष्टि से किसी भी प्रकार से कम नहीं आंक  सकते।  भाषा सौन्दर्य ,भाव ,अलंकार , और हर  पंक्ति में छिपा दर्शन अपने आप में अनूठा है। पर मानस आज भी लोकप्रिय है शायद सृष्टि  के अंत तक रहे क्योकि कठिन दर्शन को राम कथा के माध्यम से  सरल भाषा में जन -जन तक पहुंचाती है।  प्रेमचंद्र को ही ले कितने कठिन और गूढ़ चरित्रों को वो सुगमता से रचते हैं।  उनका एक -एक पात्र मन में उतरता है।  रंगभूमि में गहरा दर्शन सरलता से कह दिया है।  “निराशा  कि पराकाष्ठा वैराग्य है ” एक वाक्य में पूरा दर्शन है।  पर प्रेमचंद्र अद्रितीय हैं उनका स्थान कोई नहीं ले सकता न साहित्य जगत में न लोकप्रियता के  जगत में । 
                                                          अक्सर जब साहित्य पर बहस होती है तो लोग फिल्मों तक पहुचते हैं। ……… और कदाचित गलत भी नहीं है। एक विधा  दूसरी विधा से जुडी होती है । पहले फिल्मों में भी कला और व्यावसायिक के रूप में बटवारा हुआ करता था।  कला फिल्में आम जनता से दूर हुआ करती थी कहा जाता था ” उनका क्लास अलग है “कई लोग अपने को उस क्लास में सिद्ध करने के लिए जबरदस्ती ३ घंटे बर्बाद करते थे । जबकि आम जनता में धरणा  थी कि ” अगर एक कप चाय आधे घंटे में पी जाए तो वो कला फिल्म और आधे मिनट में पी जाए तो व्यावसायिक। पर आज यह वर्गिकरण  खत्म हो चुका है …क्यों ?  उत्तर स्पष्ट है तथाकथित कला फिल्मों के निर्माताओ को लगा कि इस तरह से वो अपनी बात आम जनता तक नहीं पहुचा पा रहे हैं ……….  आज उसका अच्छा रूप सामने देखने को मिल रहा है जहाँ यह बैरियर खत्म हो गए हैं……गहरी बात जनता तक आसानी से पहुचाई जा रही है। ……यही फिल्मों का उदेश्य है।  उदहारण के तौर पर मैं आमिर खान कि “तारे जमी पर “देना चाहूंगी जहाँ एक विशेष रोग से पीड़ित बच्चे कि समस्या को आसानी से जनता तक पहुचाया । माता -पिता ने अपने बच्चों कि समस्या को समझा।  स्कूलो में सेमीनार हुए ,व्यापक तौर यह समझा गया कि बच्चा अगर पढ़ाई  में पिछड़  रहा है तो  कोई शारिक कारण भी हो सकता है । फिल्म अपने व्यावसायिक और सामाजिक दोनों उदेश्यों में सफल हुई ,लोकप्रिय हुई।अजय देवगन की एक फिल्म ने “डिफ्यूस्ड पर्सनालिटी डिसऑर्डर “नामक मानसिक बीमारी से जूझती  स्त्री की समस्या से आम जनता को अवगत कराया है।   अभी हाल में प्रदर्शित NH 24 ………ऑनर किलिंग के गंभीर मुद्दे को उठाती है…..
                                                          कुछ लोग कुतर्क करने में फ़िल्मी गानो “शीला की जवानी  “मुन्नी
बदनाम हुई,आदि गानो की लोकप्रियता का हवाला देकर आम जनता की समझ और लोकप्रियता पर प्रश्न चिन्ह लागाते हैं।  पर मैं इन्हे मात्र टंग ट्विस्टर मानती हूँ ………या थोड़ी देर के लिए मन समुद्र में आया ज्वार ,ये लोकप्रिय तो हैं पर टिकते  नहीं ………क्योंकि इसमें गहरी बात नहीं है  तभी तो शीला की जवानी  की जगह मुन्नी ले लेती है ,मुन्नी की जगह “फेविकोल से “लेता है व् उसकी जगह “माँ का फोन आया “………  कोई टिकता नहीं है …… आया कुछ दिन खूब बजा और गया पर “ये जिंदगी के मेले ,दुनिया में काम न होंगे अफ़सोस हम न् होंगे “२ ) जिंदगी कैसी है पहेली हाय ,सजन रे झूठ मत बोलो  …. इन सब में गहरा दर्शन है सरल भाषा में छिपा हुआ।मेरे विचार से आम पाठक समझदार है ………स्वाद बदलने की तरह थोड़ी देर उसे कोई चीज प्रभावित कर सकती है पर कालजयी व लोकप्रिय वही रचना होती है जिसमे जिसमें दुरुहता को त्याग कर जनता के मनोभावों को आम भाषा में सुगम बना कर पाठकों तक पहुचाया हो। 
                                                        वैसे जहाँ तक मैं समझती हूँ लोकप्रिय और गहन ये शब्द भी बनाए गए शब्द है …. पुस्तक खरीदते समय पाठक को इससे  कोई मतलब नहीं होता पाठक  ,वो खरीदता है जो उसे रुचता है ,जो उसे झकझोरता है।  अकसर साहित्यकार आम समझ को दोष देते हैं।  पर जीवन केवल साहित्य नहीं है। जीवन के नियम हर जगह सामान रूप से लागू होते हैं। आज हम सब मोबाइल कंप्यूटर इस्तेमाल करते हैं। कितने लोग उन वैज्ञानिक सिधान्तों  को जानते हैं जिन पर ये काम करते हैं। ………पर उन्हीं दुरूह सिधान्तों का सरलीकरण हमारे हाथ में मोबाइल के रूप में है ………  जो जन -उपयोगी है इसलिए लोकप्रिय है।  ये शब्द गढे  हुए शब्द हैं न इनका विद्वता से प्रयोजन है न लोकप्रियता से ………अगर इन शब्दों का कोई प्रयोग है तो मात्र अहम् तुष्टिकरण।        


                                                                           अंत में मैं यही कहूँगी  साहित्यकार वही होता है जिसे मन भावों की गहरी समझ हो वह उन्हें पकड़ता हो,तो फिर अपने मन की इक्षा उस से कैसे छिपी रह सकती है। वो विद्वान है बखूबी जानता है की उसे क्या करना है ………….  उसे ऐसा साहित्य गढ़ना है जो आलोचकों की दृष्टि  से खरा उतरता हो ,पांडित्य का प्रदर्शन हो…….. जाहिर है वह  दुरूह होगा सुगम नहीं ,पुरूस्कार दिला सकता है पर पाठकों को स्वीकार नहीं होगा ……….तो फिर निराशा या कुंठा कैसी ? अगर साहित्यकार चाहता है की वो ऐसा कुछ लिखे जो तुरंत जन -जन की जुबान पर चढ़ जाए………. जाहिर है वो लोकप्रिय होगा समुद्र के ज्वार की तरह आएगा और भाटे  की तरह उतर  जाएगा ………. तो पांडित्य प्रदर्शन न कर पाने का क्षोभ  कैसा ? और अगर साहित्यकार ने विचारों को इतना पी लिया है ,भावों की गहराइयों से शब्दों को इतना माँझ लिया है ,अंतस में इतना डूब चुका है ……… तो वो गंभीर से गंभीर बात को सरल सुगम बना देगा ………. वही साहित्य लोकप्रिय होगा वही कालजयी होगा।  जिंदगी आप की है ,फैसला भी आप का होना  चाहिए …………. साहित्य विवाद की जगह नहीं है इसे अखाड़ा न बनाये …………किसी एक चीज को ंपकडा जाए………. बल्कि स्वयं को इतना मांझा जाए जहाँ ये सारे विवादों की दीवारे ही गिर जाए ………….जो साहित्य रचा जाए वो सरल भी हो और गंभीर भी जिसमें विद्वता भी झलके और जान चेतना भी।  मेरे विचार से वही लोकप्रिय  साहित्य कालजयी होगा। 






वंदना बाजपेई




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