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अपनी-अपनी आस


शशि बंसल
भोपाल ।
लघुकथा )
सुनो जी ! इस
बार नए साल की पार्टी के लिए मुझे हीरों का हार चाहिए ही चाहिए ।पूरी कॉलोनी में
एक मैं ही हूँ
, जिसके पास एक भी ढंग का हार नहीं ।”
जब तुमने
निर्णय ले ही लिया है तो कोई इनकार कर सकता है भला ।सोच तो मैं भी रहा था
, नई गाड़ी लेने की । तीन साल से एक ही गाड़ी
चलाते-चलाते बोर हो गया हूँ । “

तो खरीद
लीजिये न ।”



अरे हाँ ! घर
में क्या नोटों का पेड़ लगा है
? फिर, पिछले महीने हमने जो फार्म-हाउस खरीदा था , उसकी किश्त भी तो भरनी है ।” बगीचे की ओर
बढ़ते हुए वह निराश भाव से बोले ।

हूँ……। हम
कब तक ऐसे ही आस को मार – मारकर जिएँगे
, कभी सोचा है
आपने
? ” वह भी
पीछे-पीछे चल पड़ी
, और क्षुब्ध हो साथ की कुर्सी पर बैठ गई
।तभी उनके कानों से एक आवाज़ टकराई ।




आजे देसी घी
री रोटी अन्ने मूँग री दाल खाई ने आवी रियू हूँ । दो बार हाथ धोई लीदा
, अबार तक खुसबू आयी री है … साची , मजो आवी गयो ।नरा दिना बाद देसी घी की आस पूरन
हुई …….। ” बगल में बन रहे नए बँगले पर मजदूर की आकांक्षा सुन दोनों की
महत्त्वाकांक्षी नज़रें मिलते ही झुक गईं ।


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