हेड लाइंस में क्या लिखा है “दोस्ती में नहीं कोई सीमा “क्या बात है ?अब हमारे देश
के मुखिया नेता बरसों पुराने सीमा विवाद मिटा देंगे | एक नए युग की शुरुआत होगी |
के बगल में| माशाल्लाह नज़र ना लग जाए ……… डैशिंग ,स्मार्ट ,हैं ना | वो सूट…अगेन वाओ …. आखिरकार दिखा ही दिया पूरी दुनियाँ को हम
भारतीय भी महंगे कपडे पहन सकते हैं केवल वो ही नहीं | सच्ची! गर्व से गर्दन तन गयी
|
तो भले हम अपन उतरी पूरा में रहे पर ईहाँ ?सोचा था बेटा बहुरिया के नगीच रहिये तो
कुछ नीक लागे | कुछ तो सेवा मिले …. ई से ज्यादा तो हम बुढ़ापा में कर लेत हैं | ई तो हमार अपमान है | अब तो हमें वापस
जाए का है …. इहाँ न रुकिए |
में बात करती हूँ |
दादी किसका घर धूप में कर दें ?मई जून का
महीना तड़प कर रह जाएगा हा हा हा …….
मम्मी हमका बस दाल उबाल के दे रही हैं | सब्जी का पूछो तो काहत है “इहे बना है “का
चाहत का है की हम यहाँ ना रुकी | अब बूढ़े बच्चे एक समान | बुढ़ापा में जुबान का
स्वाद बिगड़ जात है लागत है कुछ चटपटा ,तीखा खा ले तो भूख खुल जाए |
के बनाई दे | जरा नीक लागे ,तो रोटी चले | एइसन तो थाली देख के उठ जाए का मन करता
है | ईमा भी कामचोरी करत है ,ई से ज्यादा तो हम अभी ई उम्र में बनाय सकत हैं | (पल्ले से सुबकते हुए आँसूं पोचते हुए
) हम ईहाँ न रुकिहें |
दाल और रोटी| पहले तो बनती थी न आप के
पसंद की सब्जियां ?

हाँ पहले तो सब पूँछ –पूँछ कर बनावत थी “ अम्मा का खइयों ? पर अगर अब
इहे बन रहा है तो ……….. चलो हमका छोड़ो | तुम बच्चन की तो चढ़ती उम्र है ,इहे
खायेंगे तो शरीर में मजबूती कैसे रहिये |
बनने का समय है ये …. सब डॉक्टर के ईहाँ चढ़ाव का है का ?
आसमान पर हैं ?
तो रूतबा पैसा बढ़ा होई |
एअरपोर्ट जाना था तो अपनी औकात से ऊपर सूट सिलवा
लिया | उसके लिए बैंक से पैसे निकलवा लिए |अब मम्मी भी क्या करे ? मकान का
किराया ,हमारी पढाई ,ये तो रोकी नहीं जा सकती | हैं ना दादी |
|
जैसे कपडा निचोड़े हो | का सबकी गयी है का ?
काटी गयी |आप चिंता ना करो ,आज माँ अपने कंगन बेंच कर बिल भर देंगी |शाम तक आ
जाएगी |
लोगों से मिलने दूसरे शहरों में जा रहे हैं | कहते हैं कि इस तरह आने –जाने से
,रिश्ते सुधरने से घर को फायदा होगा | उसी में ट्रेन का टिकट व् नए कपडे –लत्तों
का खर्चा बढ़ जाता है |अभी कानपुर रोहित
अंकल के घर गए हैं |
,बाबू –मुन्ना भाई का नारा लगात –लगात हमरे घर का कुआ पर अपना कब्ज़ा कर लीन्ह |
पानी को तरस गयी | तब तुम्हार दादाजी उधर ले के दूसरा कुआ खुदाए रहे | उस उधार का ब्याज पाटत पाटत जवानी निकल गयी |ऊ के यहाँ
मुन्ना गया है ………. बैंक से पैसा
निकाल के | ( चिंतित होकर ) हे शिव ! शिव ! शिव |
आप टेन्स न हो |खबरे सुनो |
बिटिया ,मुखिया चाहे घर का हो या देश का उकी पहली जिम्मेवारी घर -देश की है | नाही
तो खाने के लाले पड़िए ,बिज़ली न मिलिहे और घर की बहूँ –बेटियन के गहने बिकिहे | बाहर की वाहवाही से का होत है | ई से अच्छा है सादा कपडा पहनो ,घर देश पर
धयान दो , वो निखारिहे , तो यश मिलिहे तब दूसर लोग आइहिये रिश्ता सुधारन की खातिर | तब मन भी खुश हुइए और नाक भी ऊंची
रहिये | कुछ रूककर ………. मुन्ना को तो हम समझाई लेबे पर देश के मुखिया को कौन
समझाई ?
वंदना बाजपेई
