केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए,
उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए।
मैथली शरण गुप्त
नीम करौली बाबा के जीवन, जिसमें संघर्ष और भक्ति का समावेश है पर बनी फिल्म हनुमान अंश बरसों बाद एक ऐसी फिल्म के रूप में सामने आई है जिसने सिनेमाई गणित को बदल दिया है। आज के शोर-शराबे भरे गीत संगीत, हिंसा, जिसमें भाषाई हिंसा भी शामिल है के बीच सार्थक प्रेरणादायक सिनेमा क्या होता है यह फिल्म हमें बताती है। अगर कहा जाए कि यह फिल्म एक भाव, रस छंद से युक्त कविता है जिसे मन से नहीं आत्म से सुनते हैं तो अतिशयोक्ति न होगा ।
हनुमान अंश- एक नजर
माँ की मृत्यु से आहत एक बच्चा यह सुनकर कि उसकी माँ राम के पास चली गईं हैं। राम की तलाश में निकल पड़ता है। देश भर में अपनी भटकते हुए उसकी आध्यात्मिक यात्रा आकार लेती है। इसी दौरान उसे पता चलता है कि राम के पास तो हनुमान के माध्यम से पहुंचा जा सकता है । और धीरे- धीरे वह हनुमान के प्रति अगाध भक्ति में लीन होता जाता है।
मोटे तौर पर इसे भक्ति की शक्ति कह तो सकते हैं पर अगर हम इसे केवल चमत्कार और भक्ति की दो भुजाओं पर टिकाकर कर देखेंगे तो बहुत कुछ खो देंगें। इसमें बहुत कुछ ऐसा है जो हमें भीतर से शांत कर देता है। वक्त रुक जाता है और हम पाने और खोने का अजीब सा अहसास लेकर घर लौटते हैं। दरअसल यहाँ सिनेमा हॉल के अंदर हमारे नकली जीवन और नकली सुखों की दौड़ की परतें छिल जाती हैं। हम किसी नमकीन समुद्र को पाने के लोभ में दौड़ते हुए अपने भीतर का क्या मीठा सा खोए दे रहे हैं। प्रकृति और पुरुष के इस खेल में यही ज्ञान तो अभीष्ट है।
फिल्म की खास बातों को इंगित करूँ तो – “भूखों को भोजन कराओ और सबसे प्रेम करो” एक छोटा सा उपदेश फिल्म के मूल में हैं । यह फिल्म लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग में फोकस और एकनिष्ठता को भी रेखांकित करती है। सांप वाले प्रसंग में फिल्म बताती है कि प्रारबद्ध को उचित कर्म से बदला भी जा सकता है मुझे एक खास बात और लगी कि छोटी उम्र में विवाह की स्मृति कराने पर ब्रह्मचारी बाबा अपनी पत्नी के प्रति अन्याय को समझते हुए गृहस्थ आश्रम को भी निभाते हैं । मुक्ति के मार्ग में पत्नियों को पीछे छोड़ आगे बढ़ जाने वालों के लिए बाबा गृहस्थ कर्तव्य के प्रति एक उचित रास्ता दिखाते हैं। जहां वे पत्नी को विश्वास में लेकर ध्यान मार्ग में आगे बढ़ते हैं। एक दृश्य में वे अपने द्वारा बनाई गई हनुमान जी की मूर्ति को भी जमीन के मालिक द्वारा लोभ-लाभ की आशंका से वहीं छोड़ ये कहते हुए आगे बढ़ जाते हैं कि “मूर्ति तो मन में है।” हर कामना से मुक्त और सिद्धियों के प्रति अनासक्त भाव ही मोक्ष का द्वार हैं ।
सिनेमेटोग्राफी का जिक्र करूँ तो यह 1900 के आस -पास का दशक जीवंत कर देती है। लोक संस्कृति, लोक संवाद, और भजन ऐसे कि इस फिल्म के भजनों को सुनने के बाद और भजन मन पर चढ़ ही नहीं रहे हैं । कारण उनका लोक से जुड़ाव है वे हमारे गाँव-चौपालों में गाए जाने वाले भजनों की तरह ही हैं।
अंत में यही कहूँगी कि बाबा के किरदार को जीवंत करती शोभिनव सत्य की आँखों में सरलता और करुणा की हल्की सी नमी… वाकई इस फिल्म ने चमत्कार किया है। हमें उन जड़ों से जोड़ा है जो भारतीय मानस का वैशिष्ट्य रहीं हैं। आत्म-मंथन और आत्म खोज से बड़ा और क्या चमत्कार हो सकता है भला ।
वंदना बाजपेयी

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