वरिष्ठ साहित्यकार आशा सिंह जी की लेखनी गंभीर विषय उठाती रही है । फिर चाहें उनकी बहु चर्चित पुस्तक ‘सिताबोबाई’ हो या “सिन्हा बंधु” । जेलर की डायरी के पन्ने पर आधारित उनकी शृंखला आप पहले भी अटूट बंधन में पढ़ चुके हैं । इस बार पढिए माँ और ममता के विविध प्रसंगों को सहेजती उनकी उनकी सामाजिक मार्मिक कहानी “बिटिया” । प्रस्तुत है इस धारावाहिक कहानी का पहल दूसरा भाग –
वरिष्ठ साहित्यकार आशा सिंह की धारावाहिक कहानी बिटिया -भाग दो
पहला भाग यहाँ से पढ़ें – वरिष्ठ साहित्यकार आशा सिंह की धरवाहिक कहानी -बिटिया भाग 1
इतनी जल्द बाज़ी में लिया निर्णय मुझे चुभने लगा।रूमा ने मुझे ख़ामोश रहने को कह दिया ।
पद और प्रतिष्ठा ने रुमा का दिमाग़ ख़राब कर दिया ।अक्सर अपने पति विनोद से भी लड़ लेती।ज़रा सा भी विनोद माँ के कमरे में जाते और लौट कर अपने कमरे में आते,कमरा रणभूमि में तबदील हो जाता ।युद्ध में अधिकतर रूमा विजयी रहती।विनोद हथियार डाल देते।अक्सर अपनी विजय गाथा मुझे फ़ोन पर सुनाती।
एकाध बार मैंने समझाने की कोशिश की-इडियट तू अपनी कलम चलाया कर।अपना पसंदीदा जुमला उछाल देती ।
एक बार मैं माँ जी से मिली- माँ जी दो रसोई क्यों ।
उन्होंने कहा- बेटी मैं मांस मछली नहीं खाती।निरामिष हूँ ।एक रसोई में कलछी चम्मच मिल सकते हैं ।बर्तन में भी छूत लग सकती है ।
मैं इस निष्कर्ष पर पहुँची कि अधिकतर मनमुटाव का कारण रसोई ही है।
मेरे घर की गर्मी बढ़ाने का काम मेरी क़लम ने किया ।अम्मा जी और दीदी को मेरा पत्रकार होना सही नहीं लगता ।घर से बाहर निकल लोगों का इंटरव्यू लेती हैं,घटनाओं पर लिखती हैं ।अम्मा जी को भड़काने का काम दीदी का था ।यहाँ पैसों का गर्व था ।
पहले जीजा जी भी नौकरी पेशा थे,अचानक दिमाग़ में फ़िल्म जगत का कीड़ा कुलबुलाया।उसी समय श्वसुर जी रिटायर हुए ।अच्छा ख़ासा फंड मिला,जीजा जी उधार के नाम पर लेकर चले गए ।
एक्टर तो नहीं बन सके,पर फ़िल्म निर्माता बन सके,पहली ही पिक्चर हिट रही ।बस लक्ष्मी जी की कृपा बरसने लगी।फ़िल्म के साथ होटल व्यवसाय शुरू कर दिया ।फ़ैक्टरी भी लगा दी।तीनों बेटों को अलग अलग व्यवसाय दे दिए ।
रजनीश ने मैटालर्जिकल में डिग्री ली,और आयुध निर्माणी कानपुर में कार्य करने लगे ।बेहद सरल और शांत प्रकृति के थे।अपने काम को हंस कर बताते-बस लोहा पिघलाकर कर कर ढाल दिया ।फर्नेस का तापमान 1600 डिग्री सेल्सियस होता ।
उस पिघले लोहे को तोप के रूप में ढाला जाता ।टैंक की मज़बूती के लिए तैयार किया जाता ।देश अलग अलग आर्डिनेंस फ़ैक्ट्री इन सामारिक उपकरणों को बनाती।पर वे हंस कर स्वंय को लुहार बताते ।
उन्हें मेरे काम करने पर एतराज़ नहीं था,बल्कि बढ़ावा देते,जो अम्मा जी को पसंद नहीं था ।एक बार एक प्रतिष्ठित नेता का इंटरव्यू होना था,जिस पत्रकार को लेना था,वह नहीं आया,लिहाज़ा संपादक जी ने मुझे साक्षात्कार करने के लिए कहा ।मैं उनका बहुत सम्मान करती थी,सो आज्ञापालन किया ।दूसरे दिन पेपर में फ़ोटो छप गई ।बाबू जी जो शांत रहते थे,नाराज़ हुए ।आग में घी डालने का काम जीजा जी और दीदी ने किया ।
रजनीश भी कोपभाजन का शिकार हुए ।कहा गया कि-बहू अपना काम छोड़े या घर ।
रजनीश ने मेरा साथ दिया और सरकारी आवास ले लिया आवास क्या अंग्रेजों के टाईम पर बना बंगला था ।आगे लान पीछे गृह वाटिका और दो सर्वेंट क्वाटर,जिसमें एक में गोपाल और दूसरे में कन्हैया ।।रूमा ने बहुत तारीफ़ की,वाह सही निर्णय लिया ।
घर छोड़ने के बाद भी रजनीश रोज़ शाम को बाबू जी से मिलने जाते,घर का सामान लाते।
बेटा रवींद्र तो बाबा दादी के सानिध्य में रहा।मुझसे दूर होने लगा।बाद में स्कूल के मित्र,और कालेज के मित्रों का साथ हो गया ।
सोचती हूँ कि रूमा को चिड़चिड़ापन हम लोगों ने दिया ।पहले घर में अवहेलना झेली,बाद में स्कूल कालेज में ।पता नहीं कैसे उससे मेरा लगाव हो गया ।मैं उसके लिए सबसे लड़ती।
अक्सर सहेलियों के व्यंग्य बाण चुभने लगते।
अरे यह कैसा नाम रूमा
दूसरी उत्तर देता-अरे मम्मी को अस्पताल जाने से पहले रूम में टपक गई होगी,सो नाम रूमा ही रख दिया ।
मैं सबसे लड़ती-नाम में क्या रखा है ।
एक ने कहा-हाँ चमची,नाम शायद रूपा रखा गया होगा,हो सकता है स्पेंलिंग मिस्टेक हो गई ।
सब खी खी कर हँसने लगी ।
एक क्लास में पाँच प्रतिशत बच्चे पढ़ने में होशियार,पाँच प्रतिशत फिसड्डी,शेष औसत होते हैं ।
रूमा पहले पाँच प्रतिशत में थी।
यह तो नहीं कहूँगी कि बदसूरत थी,पर होंठ बहुत मोटे,ऊपर से आँखों पर मोटा चश्मा ।सजने संवरने का शौक़ नहीं,बस किताबें,जिन पर क़ायदे से जिल्द चढ़ी होती,साफ़ सुथरी कापियाँ,और साथ में मैं ।
वह मुझे सबसे बहस करते देख मुझे रोकती-मैं जैसी भी हूँ,ठीक हूँ,तुझे अच्छी लगती हूँ,काफ़ी है।वैसे भी मुझे भीड़ अच्छी नहीं लगती ।
मैं सबको चिढ़ाने के लिए कहती- देख लेना,उसका दुल्हा सबसे सुंदर होगा ।
हुआ भी यही,विनोद को देखकर कुछ ने मुझे चुटकी काटी।
उसने रूप पर कुशाग्रता का आवरण चढ़ा लिया
पी एम टी में टाप करके।पेपर में फ़ोटो छपी।
मैं तो नहीं आई पर उसके लिए ख़ुश थी।मैंने विज्ञान छोड़ कर कला ले लिया,और पत्रकारिता में डिप्लोमा प्राप्त किया ।
तब तक वह शहर की मशहूर गायनी(स्त्री रोग विशेषज्ञ) बन चुकी थी,और मैं समाचार पत्र में कालम लिखने लगी।दोनों अपने घर में मीठे नमकीन रिश्ते के साथ थे।उसके पति विनोद के पिता बिजली विभाग में साधारण कर्मचारी थे,पर सपनों की ऊँचाई अधिक थी।अपने एक मात्र पुत्र का विवाह रूमा के साथ कर दिया ।विनोद ने पिता की आज्ञा मानकर चुपचाप विवाह कर लिया,कन्या को देखा तक नहीं,बहुत बेमेल जोड़ी थी।
अब रूमा का गर्व और बढ़ गया,वह समझ गयी थी कि पैसा सर्वोपरि है ।
रोज़ झगड़े बढ़ गये।दीवारों से बात बाहर निकलने लगी।बाहर स्टाफ़ कनफुसिया करने लगा।मैंने अपनी तरफ़ से कोशिश की,पर उत्तर मिला,रजनीश भी अलग हुए ।
आख़िर उसने अमेरिका जाने का विचार कर लिया ।मुझसे बोली-विदेश में सब अपने काम से काम रखते हैं ।कोई काना फूसी नहीं,न कोई झांका ताकी।एक बड़े अस्पताल में काम मिल गया ।विनोद इसी शर्त पर जाने के लिए तैयार हुए कि पापा मम्मी भी साथ जायेगे।
दूर की सोच कर रूमा मान गई।सब चले गए,कुछ दिन चिट्ठी आती रही,बाद में बंद हो गई ।वहीं दो पुत्रों की माँ बनी।अब सास ससुर बहुत काम आये।उसके ड्यूटी पर जाने के बाद बच्चों की देख भाल वहाँ करते ।
एक बार लिखा-भारत में तो राजा बनकर रहते थे ।यहाँ राजा प्रजा सब बराबर है ।सुबह उठकर घर की सफ़ाई,खाना स्वंय करो।फिर लंबी दूरी तक कार चलाकर जाओ।दो लाइन लिख देती हूँ,वहीं बहुत है।
अरे विनोद जी मदद करते होंगे ।
ओह,काम बढ़ाते हैं,बस कार पर चढ़ी बर्फ़ हटा देते हैं ।घर से ही आफिस का काम करते हैं या सोते हैं ।
बस एक आराम है,मरीज़ बस बारह देखने पड़ते हैं ।सिस्टर भी प्रशिक्षित हैं ।
मैंने लिखा -फूल और काँटे ।
मेरे समाचारपत्र के मालिक ने जबलपुर में ब्रांच खोलने की सोची ।मुझे भी वहीं जाना पड़ता,सो मैंने त्याग पत्र देना चाहा।
रजनीश ने समझाया- वहाँ भी चार आर्डिनेंस फ़ैक्ट्री हैं,गन कैरिज फ़ैक्टरी में मेरा तबादला हो जायेगा ।
जीवन में लिहाज़ा हम जबलपुर आ गये।रवींद्र वहीं सेंट्रल स्कूल में पढ़ने लगा ।
आशा सिंह

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