में पुष्टि हो गयी कि उसने ज़हर खाया है और पुलिस सबके कहने पर सुनयना को पकड कर ले
गयी सभी को यही लगा कि सुनयना की वजह से अविनाश ने खुदकुशी की है । मगर कोई सुनयना
ने तो ज़हर दिया नहीं था इसलिए पुलिस उसे हिरासत में ज्यादा दिन रख नहीं पायी ।
सुनयना के घरवाले उसे अपने घर ले गए और किसी तरह मामले को रफ़ा दफ़ा किया गया और
सबको यही लगा सुनयना गुनहगार है जबकि असलियत सात पर्दों में कैद छटपटा रही थी बाहर
आने को क्योंकि पोस्टमार्टम में एक तथ्य और उजागर हुआ था जिसे सबसे छुपा लिया गया
था मगर सुनयना चुप बैठने वालों में से नहीं थी वहीं उसके घरवालों ने उसी बिनाह पर
सुनयना को मुक्त करवा लिया था उन लोगों से वरना तो जाने वो बेगुनाह उस गुनाह की
सजा भुगतती जो उसने किया नहीं था और बल्कि तब तक भुगत भी रही थी एक ऐसा जीवन जीकर
जिसे शायद ही कोई लडकी स्वीकार कर पाये और इस तरह जी पाये जैसे उसने जीया था ।
इतने कम दिनों में सभी को अपना बना लेना क्या इतना आसान होता है ? हर किसी के दिल में जगह बना लेना जबकि आज के वक्त में
लोग अपनों को नहीं जान पाते इतने से दिनों में उसने तो जैसे एक अलग संसार ही खडा
कर लिया था अपने लिए । ये सब यूँ ही संभव नहीं हुआ था बल्कि सुनयना के त्याग और
तपस्या का फ़ल था और अब वो उसे बेकार नहीं जाने देना चाहती थी इसलिए उसने अपने तरीके
से सच्चाई सामने लाने की कोशिशें शुरु कर दीं ताकि कम से कम जिन लोगों के दिलों
में उसने स्थान बनाया था वो तो कम से कम उसे नफ़रत से याद न करें ।
दिन मैं इस्कॉन मंदिर गयी थी वहीं अचानक सुनयना से मिलना हो गया तो गले लगकर भरभरा
कर रो पडी और मुझे समझ नहीं आ रहा था कि इसे क्या कहूँ क्योंकि तब तक मैं भी यही
मानती थी कि इसके कारण एक हँसता खेलता परिवार बर्बादी के कगार पर पहुँच गया मगर
उसने कसम देकर मुझे रोका और कहा , क्या
मौसी आप जानना नहीं चाहेंगी सच क्या था ?
शब्दों ने मेरे पाँव जकड लिए , दूसरी
ओर उत्सुकता
के पंछी भी कुलबुलाने लगे क्योंकि जिस दृढता से उस दिन वो सबके आगे बोल रही थी तो
लगता था कि जो दिख रहा है उसके पीछे भी जरूर कोई ऐसी कहानी है जो सबसे छुपाई जा
रही है इसलिए मैं रुक गयी जानने क्योंकि कभी भी एक पक्ष सुनने पर कोई फ़ैसला सही
नहीं होता । दोनों पक्षों को मौका तो मिलना चाहिए अपनी सफ़ाई देने का और मैं बैठ
गयी वहीँ मंदिर में एक कोने में उसके साथ जाकर ।
कहो , सुनयना , क्या कहना चाहती हो ? मैं
भी जानना चाहती हूँ आखिर ऐसा हुआ क्या जो तुमने ये कदम उठाया ?
, आज सारी दुनिया के लिए मैं ही गुनहगार बना दी गयी मगर यदि आप सत्य जानतीं तो कभी ऐसा न कहतीं बल्कि उस
पूरे परिवार से घृणा करतीं ऐसे लोग समाज पर बोझ हुआ करते हैं मगर जाने इनके झूठ
कैसे परवान चढ जाया करते हैं और एक स्त्री के सच भी जाने किन कब्रों में दफ़न कर
दिये जाते हैं कि वो सच कहना भी चाहे तो उसे झूठ का लिबास पहना दिया जाता है और
कलंकित सिद्ध कर दिया जाता है ।
, जिस दिन मैने डोली से नीचे पाँव रखा उस दिन मुझे लग
रहा था संसार की सबसे खुशनसीब स्त्री हूँ मैं मगर मुझे नहीं पता था कि ईश्वर ने
मुझे रूप देकर मेरी नसीब से मेरा सबसे बडा सुख ही मुझसे छीन लिया है । जाने किस
कलम से विधाता ने मेरा भाग्य लिखा था जब सुहागरात को मुझे पता चला कि अविनाश
नपुंसक हैं । यूँ लगा जैसे आस्माँ में जितनी बिजली है वो सब एक साथ मुझ पर गिर पडी
हो । मैने उनसे पूछा , आप जानते थे ये
सत्य तो क्यों मेरा जीवन बर्बाद किया ? आपको शादी करनी ही नहीं
चाहिए थी ?
सही कह रही हो मगर घरवालों के दबाव के कारण मुझे ऐसा करना पडा । उनका कहना था तुम
ऐसे अकेले कैसे सारी ज़िन्दगी गुजारोगे ?
कोई
ऐसा भी तो हो जो हमारे बाद तुम्हारा साथ दे , तुम्हें समझे तुम्हारे दुख
सुख में तुम्हारे काम आए और
जहाँ तक वो बात है तो एक बार शादी हो जाए तो कौन स्त्री अपने मुख से ऐसी बातें
कहती है । मैने उनसे कहा भी कि मैं किसी को धोखा नहीं देना चाहता बल्कि इस तरह तो
मैं किसी का जीवन ही बर्बाद कर दूँगा बल्कि उसकी जगह किसी बेसहारा को जीवनसाथी बना
लूँ जो मेरी तरह ही हो तो उनका कहना था कि ऐसा मिलना कहाँ संभव है और आज कोई
इश्तिहार नहीं दिये जाते कि ‘एक नपुंसक के लिए दूसरे नपुंसक साथी की आवश्यकता है ताकि दोनो एक दूसरे का सहारा बन जीवन बिता सकें’ और फिर हम उसे
सब सुख देंगे तो क्यों नहीं निर्वाह करेगी आजकल की लडकियों को और चाहिए ही क्या
होता है जहाँ पैसा देखती हैं खिंची चली आती हैं क्योंकि उन्हें सब सुख सुविधायें
चाहिये होती हैं और वो तुम उसे मुहैया करवाओगे ही तो वो इन बातों को इग्नोर कर
देती हैं । मेरे मना करने पर मुझे अपनी कसम और प्यार का वास्ता देकर जबरदस्ती मेरी
शादी तुमसे करवा दी है मगर मेरी तरफ़ से तुम स्वतंत्र हो सुनयना चाहो तो आज और अभी
इसी वक्त मुझे छोडकर जा सकती हो ।
मैं एक – एक शब्द के साथ अंगारों पर लोटती रही ,
मुझे
समझ नहीं आ रहा था इन हालात में मुझे क्या
करना चाहिए ? मैं रोती रही
सिसकती रही और सुबह का इंतज़ार करती रही । सुबह होते ही इनकी माँ मेरे पास आयीं और
बोलीं , देख
बहू , तू
सारा सच तो जान ही गयी होगी , बेटी
तुझे हम कोई तकलीफ़ नहीं होने देंगे , तुझे पूरी स्वतंत्रता होगी
अपने मन मर्ज़ी से जीने की , जो
चाहे
करने की जैसे अपने घर में करती थी मगर ये सच किसी से मत कहना वरना समाज में हमारी
कोई इज्जत नहीं रह जाएगी । हम ही जानते हैं हमने कैसे दिल पर पत्थर रखकर ये शादी
की है ताकि अविनाश को हमारे बाद कोई तो हो जिसे वो अपना कह सके और हाथ जोडकर मेरे
पैरों पर गिर गयीं और मैं भौंचक सी रह गयी । ये क्या कर रही हैं आप माँजी , ऐसा करके मुझे शर्मिन्दा मत करिए । मैं तो आपकी
बेटी जैसी हूँ मेरे पैरों में मत गिरिए ।
बेटी मुझे हो सके तो माफ़ कर दे । पुत्रमोह में मैने तेरे जीवन की आहुति दे दी है
ईश्वर मुझे कभी माफ़ नहीं करेगा , तू एक माँ के
दिल को यदि समझती है तो तू ये सच किसी से नहीं कहेगी।
असमंजस में छोड वो रोती बिलखती चली गयीं और मैं किंकर्तव्यविमूढ सी बैठी रही ये
सोचते मुझे क्या करना चाहिए ?
तो मेरे परिवार में यदि ये बात किसी को पता चलती तो एक पल न छोडते बेशक बहुत
ज्यादा पैसे वाले नहीं हैं मगर अपनी बेटी का जीवन बर्बाद होते तो नहीं देख सकते थे
मगर मुझे उनके साथ अपनी छोटी बहनों की भी चिंता होने लगी । कल को मैं यदि वापस चली
गयी तो लोग क्या कहेंगे ? कौन मेरी बहनों
का कल को हाथ थामेगा ? जितनी
जुबान होंगी उतनी ही बातें बनेंगी मगर कोई जल्दी से इस सच को नहीं स्वीकारेगा और
आखिर कितना पैसा लगा है मेरी शादी में । अब पापा फिर से एक नए सिरे से मेरी
ज़िन्दगी को आकार देना चाहेंगे और फिर इतना पैसा लगायेंगे तो कैसे संभव होगा बाकी
दोनों बहनों का ब्याह ? मैं अपने
परिवार और उसके भविष्य के लिए बेचैन हो गयी और उसी में मैने ये निर्णय लिया कि अगर
मेरा जीवन बर्बाद हो गया है तो कम से कम अपनी बहनों और अपने परिवार को तो उस दोजख
में न धकेलूँ इसलिए मैने अपनी किस्मत से समझौता करने की ठान ली और मुख
पर जरा सा भी गिला शिकवा न लाते हुए ज़िन्दगी जीने लगी। अविनाश तो मेरे इस त्याग से
जैसे बेमोल बिक गए । मैं जो कहती वो हर वक्त करने को तैयार रहते । मेरी छोटी से
छोटी बात का ऐसे ख्याल रखते कि मुझे अहसास नहीं होता कि मेरे पास एक शरीर भी है
जिसकी भी कोई जरूरतें होती हैं ।
एक ढर्रे पर चलने लगी थी मैं अपनी किस्मत के लिखे को स्वीकार लिया था मगर मुझे
नहीं पता था कि किस्मत अभी मेरे साथ और खेल खेलने वाली है जो मैं स्वप्न में भी
नहीं सोच सकती थी एक दिन वो हुआ ।
सो रही थी तभी मुझे अपने शरीर पर किसी हाथ के रेंगने का अहसास हुआ तो देखा मेरी
साडी पैरों से उघडी पडी है और मेरा श्वसुर मेरे पैरों पर हाथ फ़ेर रहा है , मैं उसे धकियाते हुए चीखती हुयी खडी हुयी तो सब लोग
आ गए कमरे में और मैं रो पडी सब बतलाते हुए तो मेरी सास
बोली , अरे तो क्या हुआ , तुझे भी तो जरूरत महसूस
होती होगी किसी मर्द की । पिघले सीसे से उसके शब्द मेरे कानों में गिरे और मैं
हैरान हो उसे देखने लगी भूल गयी कुछ पल को कि मेरे साथ अभी क्या घटा है । मैं
हैरान थी देखकर कि एक औरत होकर वो इस तरह की बात कह रही थी , अपने
आदमी को दूसरी औरत के पास बेझिझक भेज रही थी । मुझे उस दिन अपने निर्णय पर बेहद
पछतावा हुआ जब सास ने कहा कि आस पास वाले पूछते हैं कब खुशखबरी सुना रही हो तो
मुझे चुप रह जाना पडता है । सच किसी से कह नहीं सकती और जो सब चाहते हैं वो हो
नहीं सकता इसलिए हमने सोचा घर की बात घर में ही रहेगी और सबकी जुबान भी
बंद हो जाएगी । बस एक बार तू इनके साथ सम्बन्ध बना ले । ओह मौसी , मैं बता नहीं सकती उस एक पल में मैं कितनी मौत मर
गयी , जिन्हें
पिता तुल्य स्थान दिया हो उनके साथ ऐसा संबंध मैं सोच भी नहीं सकती थी । उस दिन
अविनाश
घर में नहीं थे , मैने उन्हें
कहा कि यदि उन्हें ये सब पता चलेगा तो सोचिए कितने शर्मिन्दा होंगे आप सबके इस
कृत्य पर ? क्या
आपका यही प्रेम है अपने बेटे से कि उसकी ब्याहता पर कुदृष्टि रखो ?मैने
आज तक कुछ नहीं कहा चुप रही इसका ये मतलब नहीं कि आप सबकी सही गलत हर बात में
आपका साथ दूँगी । मैं ऐसा हर्गिज नहीं करूँगी । यदि ऐसी ही चाहत है तो कोई बच्चा
गोद ले लो उसे एक घर दे दो कम से कम एक तो नेक काम होगा मगर उनका कहना था उन्हें
तो अपना खून ही चाहिए । पराया तो पराया होता है और अपना अपना । ये कैसा अपनापन था
जहाँ अपना जो था वो ही अपना न था । अभी हमारी ये जिरह चल ही रही थी कि अविनाश आ
गये और जैसे ही उन्होने ये सब सुना तो उनकी तो जुबान पर ही जैसे लकवा मार गया और
सबने समझा वो भी यही चाहते हैं इसलिए जबरदस्ती उन्होने श्वसुर के साथ मुझे कमरे
में बंद कर दिया इधर जैसे ही ये संभले इन्होने प्रतिकार किया कि ये सब क्या कर रहे
हो तुम लोग । उस पर क्यों इतना अन्याय कर रहे हो ?
वैसे
ही तुम ने अपने प्यार का वास्ता देकर उसका जीवन बर्बाद कर दिया अब फिर क्यों उसे
ज़िन्दा ही चिता पर धकेल रहे हो । वो जैसे ही दरवाज़ा खोलने को आगे बढे मेरे देवर और जेठ ने उन्हें पकड लिया और दूसरे कमरे में बंद कर दिया इधर मैं
अपने श्वसुर से बचने के प्रयास कर रही थी उधर उनकी आवाज़े आ रही थीं कि
लूँगा । मैने ये तुम्हारे कमरे में रखी चूहे मारने की दवा खोज ली है ।
उनकी माँ बाहर से बोली , अविनाश हम जो
कर रहे हैं सबके भले के लिए ही कर रहे हैं और तू बेकार की धमकी न दे ।
मैं धमकी नहीं दे रहा सच कह रहा हूँ ।
बेटा मेरी उम्र यूँ ही नहीं गुजरी , तेरी
गीदड भभकियों में मैं नहीं आने वाली ।
थोडी देर तक जब उनकी कोई आवाज़ नहीं आयी तो इन लोगों को लगा कि कहीं सच में तो ………?
जैसे ही दरवाज़ा खोला उन्होने तो मेरा संसार लुट चुका था ।
ज़हर से शरीर नीला पडने लगा था इसलिए सुबह सारा दोष मेरे सिर मढ दिया गया ।
बताओ मौसी , इस सबमें मेरा
क्या दोष था ? क्या इस सबके
बाद कोई किसी पर उसके आँसुओं पर विश्वास कर सकेगा जैसा मेरी सास ने मेरे साथ किया ?
सबसे बडी त्रासदी है ?
स्त्री के लिए ?
की ओट में भविष्य को दाँव पर लगा मुस्कुराना दोष था ?
तुम ही बताओ मौसी ………
स्त्री होना दोष था या खूबसूरत होना या परिस्थितियों से समझौता करना ?
कह वो तो चली गयी मगर तब से आज तक उसके शब्द मेरे जेहन में हथौडों की तरह बज
रहे हैं ……… स्त्री के भाग्य में लिखे शून्य का विस्तार खोज रही हूँ तब से अब तक जीजी …………क्या है कोई जवाब तुम्हारे पास ?
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