सुपरिचित और चर्चित लेखक संजीव पालीवाल जी और प्रिय मीनाक्षी चौधरी द्वारा लिखित “सम्पा- विश्वास धैर्य की अनूठी दास्तान” पढ़ने के बाद सम्पा के साहस से प्रभावित हुए बिना नहीं रहा जा सकता। गाँव की भोली-भाली सम्पा की शक्ति उसका जुनून और संकल्प रहे। इसी संकल्प शक्ति के कारण वह सोमालिया के समुद्री लुटेरों के द्वारा उसके पति के जहाज को (जिसमें उसके पति काम करते थे) बंधक बना लिए जाने पर हिम्मत नहीं हारती है और गाँव से दिल्ली, राजनैतिक गलियारों, मीडिया, खाप पंचायतों का ही नहीं पाकिस्तान के शासन-प्रशासन का भी सहयोग लेते हुए वह आखिरकार अपने पति को मुक्त कराने में सफल होती है ।
कलयुग की सावित्री सी सम्पा की प्रेरणादायक यह कथा एक अजनबी नंबर से पति के जहाज के बंधक बनाए जाने के फोन आने से लेकर प्रथम मिलन की पुरानी स्मृतियों , जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों, विश्वासघातों और वर्तमान के संघर्षों के मध्य आवागमन के बारीक धागों से बुनी गयी हैं।
संयोग ये रहा कि विमोचन में सम्पा से मिलने और किताब पढ़ने के बाद प्रथम उद्गार मुक्तक छंद में कुछ इस तरह फूटे कि स्वयं एक कविता हो गए । हालांकि मैंने सम्पा की समीक्षा भी लिखी है। इसलिए ये कविता निजी फ़ाइल में दब सी गई । कुछ खोजते हुए जब यह पुनः हाथ लगी तो लगा कि इसे मुक्त कर देना चाहिए।
वंदना बाजपेयी
तो आइए गुजरते हैं सम्पा के जीवन से –
एक सुकोमल नार की ‘सम्पा’ सुनाती है कथा
एक कविता का वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करें – सम्पा की काव्य प्रस्तुति

एक सुकोमल नार की ‘सम्पा’ सुनाती है कथा
सत्य से संकल्प से की दूर जिसने हर व्यथा
रह न जाए अनसुनी इतिहास के अँधियार में
रच रही है आप को तिथिवार में ढलकर यथा-
भय भरा संदेश आया था उसे दूरभाष पर
प्रण हुआ तत्क्षण मुखर, पर प्रीत के विश्वास पर
पाँव कोमल, राह का कुछ भी पता था ही नहीं
इक भरोसा दे रहा था, आत्मबल आभास पर
तोड़ने को हौसले थीं हरहराती आँधियाँ
फूल तोड़े शाख से और तोड़ डाली डालियाँ
एक त्रिया मासूम पर लेकर इरादे चल पड़ी
हारती-गिरती, बुनती विगत की जालियाँ
थे प्रणय के दिन मुखर जो, शूल बन मन में चुभे
कंदरा में स्मृति की, फिर पूर्व के पन्ने खुले
औचक मिलन वो राह में, सद्भावना की कोंपलें
चाहना की सुरसुरी, अहसास कुछ जलते-बुझे
डगमगाया मन अबोला, पर समय की तान पर
अंकुरण था प्रीत का, आफत लगी या जान पर
प्रेम में कब पूछते हैं पद-प्रतिष्ठा, दोष गुण
विश्वास मन की पूंजियाँ, भ्रम एक धब्बा मान पर
पर पिता ने दोष देखा, रूप रंग व्यवहार में
एक ये ही था मिला, तुझको अखिल संसार में
मानिनी ने पर सुनाया, फैसला अपना अटल
मैं वरूँगी तो उसी को प्राण प्रण अभिसार में
हाय! पाया था जिसे, हठ योग कर-कर के जटिल
आन संकट में घिरा, प्रारबद्ध के पंजे कुटिल
थी खबर जलदस्युओं ने, बंधक बनाया पोत को
मांग थी धन की विपुल, छोड़ने को प्रिय कपिल
घाव कच्चे पूर्व के तत्काल स्मृति में उभर
विश्वास रथ का टूटना मन में हुआ फिर से मुखर
माफ कर के भूल को उसने चुना पथ साथ का
पा के अवसर कौन जाने प्रेम हो फिर से प्रखर
जानती ये भी नहीं कि पोत का क्या नाम था
पीय के विश्वास पर, विश्वास का ही भाम था
ले अटल निर्णय छुड़ाकर लाएगी वो एक दिन
चल पड़ी, फिर कंटकों का पाथ के क्या काम था
दफ्तरों से दफ्तरों, चल राजधानी में सगर
यूं अनथक पाट डाली गाँव, गलियां और नगर
हाथ जोड़े, मिन्नते की, चिल्लाई भी वो जोर से
जूँ न रेंगी कान पर, इस बधिर शासन के मगर
मंजूर न था हाथ पर धर हाथ रखकर बैठ जाना
सुख-दुख के साथ का था अग्नि से वादा निभाना
लोग जोड़े मीटिंगें की, मीडिया से भी मिली
ले शिशु को गोद भटकी, त्याग भोजन घर ठिकाना
जा रहा था पर फिसलता, मुठ्ठियों से रेत सा
हा! समय की कालिमा में कुछ न दिखता श्वेत सा
फिर पसारे पाँव उसने भी पड़ोसी देश तक
दर्द दुख ने भेद मेटे, कंध दे निकेत सा

कानून की भी अड़चनों ने फिर झुकाया शीश हर
उड़ चला आदेश, तत्क्षण लगा मनुष्यता के पर
था असंभव जो कभी संभव हुआ यूं शान से
लौट आया फिर रवि, छोड़कर के मृत्यु घर
सावित्री और सत्यवान की थी सुनी हमने कथा,
पति प्राण लेकर लौट आई, पार कर हर भव-व्यथा
दोहरायी गाथा सतयुगी फिर से कलि काल ने
सावित्री सम्पा बनी, जीवंत की अनुपम प्रथा
कह रही सम्पा कथा, यह सत्य अब तुम जान लो
काम कुछ मुश्किल नहीं है हृदय में गर ठान लो
शक्ति काया में नहीं, होती छिपी संघर्ष में
हौसलों से है बनी, सबला सदा यह मान लो
गर इरादे नेक हों तो प्राण भय टिकता कहाँ
पुष्प खिलते तोड़कर के प्रस्तरों को भी यहाँ
ये कथाएँ फिर पलटकर कह रहीं तुझसे यही
शक्ति का आह्वान कर जय-जय करेगा फिर जहां
जय-जय करेगा फिर जहां
वंदना बाजपेयी

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