темп на довгому трейловому підйомі

वरिष्ठ साहित्यकार आशा सिंह की धारावाहिक कहानी- बिटिया भाग -3

वरिष्ठ साहित्यकार आशा सिंह जी की लेखनी गंभीर विषय उठाती रही है । फिर चाहें उनकी बहु चर्चित पुस्तक ‘सिताबोबाई’ हो या “सिन्हा बंधु” । जेलर की डायरी के पन्ने पर आधारित उनकी शृंखला आप पहले भी अटूट बंधन में पढ़ चुके हैं । इस बार पढिए माँ और ममता के विविध प्रसंगों को सहेजती उनकी उनकी सामाजिक मार्मिक कहानी “बिटिया” ।

वरिष्ठ साहित्यकार आशा सिंह की धरवाहिक कहानी -बिटिया भाग 1

वरिष्ठ साहित्यकार आशा सिंह की धारावाहिक कहानी बिटिया -भाग दो

 

प्रस्तुत है इस धारावाहिक कहानी का  तीसरा भाग –

 

 

हम जबलपुर आ गये।रवींद्र वहीं सेंट्रल स्कूल में पढ़ने लगा ।

उसके बाद भोपाल से इंजीनियरिंग की,और जर्मनी चला गया ।

वहाँ से सूचना मिली कि एमिली नाम की जर्मन युवती से विवाह कर लिया ।

पतिदेव बहुत गरजते रहे,बाद में बहुत रोये ।एक बार तो पूछ लिया होता,मैं मना नहीं करता ।अपने इकलौते बेटे के विवाह में शामिल न हो सका ।शायद हम लोगों का जर्मनी भेजने का फ़ैसला ग़लत था ।पता नहीं क्यों विदेश के जाल में जकड़े हुए हैं ।

उन्होंने इस चोट को हृदय पर ले लिया,कुछ दिन बाद हृदयघात से चले गए ।

रवींद्र अपनी पत्नी के साथ आया,बेहद लंबी थी ।हम लोगों में भाषा की समस्या थी ।वह अपनी भाषा में सांत्वना देने की कोशिश करती।रिश्तेदार अलग कानाफूसी करते,निरुपाय मैंने रवींद्र को जाने के लिए कहा,मैं बाद में आ जाऊँगी ।

जीवन में सूनापन छा गया ।कभी-कभी रवींद्र का फ़ोन आ जाता- माँ हमारे पास आ जाइए ।

एकाध बार गई पर जल्द लौट आई ।हमेशा कहती- जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीसिये।

जबलपुर में ही रजनीश छोटा सा आवास बनवा गये थे,कमरे कम खुली जगह अधिक।ढेर सारे पौधों के बीच ज़िंदगी चल रही थी ।अपना कालम लिख कर संपादक जी को ई मेल कर देती ।अब तो जाना भी नहीं पड़ता,कितनी सुविधा उपलब्ध हो गई ।

सब अपनी दुनिया में मग्न,कभी भूले भटके किसी का फ़ोन आ जाता।एक दिन रजनीश की बड़ी बहन का फोन आ गया-भरे स्वर में बोलीं-छोटे पोते का विवाह है,भाई तो नहीं रहे,तुम ही भात लेकर आ जाना ।

चलो किसी ने तो याद किया ।

बहुत दिनों बाद साड़ियों की दुकानों का रूख किया ।याद ही नहीं आ रहा था,किसी से पूछ कर पहले शिवम् साड़ी भंडार पहुँची,दो साड़ियाँ ली।

रूमा कहती थी – एक ही दुकान पर पर न बैठ ज़ाया करो।दो चार दुकानें देखो।सो मंगल दीप पर पहुँच कर बनारसी साड़ी ली।अपनी बहू को साड़ी पहनाने का अरमान दिल में रह गया ।शायद उसकी लंबाई की साड़ी न मिलती।

 

शीश महल से उनकी तीनों बहुओं के लिए साड़ियाँ लीं।नववधू के लिए सोने की चेन जिसमें हीरे का पेंडेंट लगा था,लिया ।अपने लिए हल्की काटन कीं साड़ी ली।मैं हमेशा काटन ही पहनती हूँ ।पहले दीदी के लिए भी सोचा,पर वे लोग बड़े हैं सो शिफ़ॉन की हल्के रंग की ले ली।इतनी शापिंग में थक गई,पता नहीं कैसे लोग दिन भर करते हैं ।बाक़ी लोगों को शगुन डाल कर लिफ़ाफ़े दे दूँगी ।कमी बेशी तो मुंबई जाकर दीदी से पूछ कर कर दूँगी।

 

आख़िर मुंबई (बाम्बे) हैं।मुंबई का पहला नामकरण पुर्तगालियों ने किया था ‘ बोम बहिया ‘जिसका अर्थ है ,जिसका अर्थ था,अच्छी खाड़ी ।यहाँ का गहरा तट बड़े जहाज़ों को भी भूमि के क़रीब आने देता जो मालवाहक जहाज़ों के लिए बहुत लाभदायक था।

बाद में पुर्तगाल ने अंग्रेजों को यह दहेज में दे दिया ।अंग्रेजों ने नया नाम रखा-बाम्बे।संभवत

माँ मुम्बा देवी के मराठी नाम “मुम्बा आई”की तर्ज़ पर सोचा गया ।फ़िलहाल महानगर है,अलग शान बान है।

यह बात मेरे पक्ष में थी कि जबलपुर से मुंबई की सीधी हवाई यात्रा थी ।आने जाने की टिकट ले ली,जल्द ही लौट आऊँगी ।

वैसे भी महिलाओं की भीड़ में घबराहट होती।केवल साड़ियों और गहने पर चर्चा चलती,चर्चा क्या चांव चांव।

एक बोल बैठी- यह साड़ी तों तुमने बिट्टू के ब्याह में पहनी थी ।साड़ी दुबारा पहनने वाली का मुँह शर्म से लाल हो गया ।

बाक़ी सब भी कहने लगी,अब तो वीडियो में सब दिखाई देता है ।अधिकतर महिलाओं की बहुमूल्य राय थी-हर फ़ंक्शन में नयी ड्रेस होनी चाहिए ।

फिर एक दूसरे के गहनों पर गहन आलोचना होती है ।

ये कान के बुंदे कब लिए,हार अच्छा है ।

उस महफ़िल मेरे जैसे लोग नहीं बैठ सकते थे ।

एयरपोर्ट पर भतीजा आ गया,सो उसकी शानदार कार से कोठी पहुँच गई।मुंबई में इतनी बड़ी कोठी संपन्नता का बखान कर रही थी ।दीदी जो अस्सी वर्ष की हो चुकी थी,बड़े प्रेम से मिली।

अपनी बहुओं से परिचय कराया,मैंने सबको उनकी साड़ियाँ दी,औपचारिक रूप से धन्यवाद दिया गया-दरअसल मेंहदी का कार्य क्रम चल रहा है,आप भी हरे रंग की साड़ी पहन नीचे आ जाइए ।

मैंने मन ही मन सोचा कि दुकानों से ढूँढ कर लाई थी,किसी ने देखा तक नहीं ।नीचे गैराज से गाड़ियों को हटा कर सजा दिया गया था,जहां महिलाओं और बच्चों का शोर था ।कुछ गाने वाली ढोलक पर गा रही थी ।बाक़ी सब थिरक रहीं थीं ।मैं वहाँ कैसे पहुँचती।सफ़र की थकान भी थी।

दीदी अपनी कोठी दिखाने लगीं।तीन फ़्लोर अलग अलग बेटों के है,सबको देखा,शानदार प्रदर्शन था ।मेरी आँखों ने ताड़ लिया,सारे फ़्लोर की रसोई अलग अलग थी ।

दीदी के सामने वाह वाह कर रही थी,क्योंकि वे जल्दी लौटने पर नाखुश थीं ।मुझे तो एक घंटा काटना मुश्किल लग रहा था ।

लिफ़्ट से सबसे ऊपर पहुँचे,वहाँ बड़ा कमरा और टेरेस गार्डन था।मनुहार करती हुई बोलीं-यहीं हमारे साथ रूकना ।मेरा सामान वहीं मँगवा लिया ।

बाथरूम साथ में ही है,देखो सीनियर सिटीज़न के लिए सबराड भी लगी हुई है ।मुखमंडल पर गर्व की छाया थी।

मेरा हाथ पकड़ कर सब दिखाया,वाक़ई बहुत सुंदर था ।

हम बाहर आ गए,उन्हें हठात् याद आया कि बत्ती जली छोड़ आई हैं,मेरा हाथ छोड़ कर जल्दी से अंदर गयीं,और अचानक फिसल गई ।चीख सुनकर सारे लोग पहुँच गए,मैं अपराधियों की भाँति कोने में खड़ी थी।

क्या हुआ क्या हुआ,शोर मच गया ।

दीदी को आनन-फ़ानन में अस्पताल पहुँचाया गया,मैं सिर झुकाए साथ रही।

वहाँ पता चला कि कूल्हे की हड्डी टूट गई है,आपरेशन होगा ।

सबके चेहरे पर हवाईयां उड़ने लगी ।बारात निकलने का समय हो गया था ।

मैं साहस कर आगे बढ़ी-सबको जाने के लिए कहा,मैं अस्पताल में रहूँगी ।

शायद सब यही सुनने की प्रतीक्षा कर रहे थे ।

एक भतीजे ने पूछा-मामी आप अकेले सब देख लेंगी ।

अरे अस्पताल तो आना जाना पड़ता है ।तुम लोग निकलो,बारात की निकासी करो।हाँ कन्या पक्ष को भी कोई सूचना नहीं देना ।दो दिन बाद तो घर आ ही जाओगे ।मैं हूँ ना।

सब हिदायत और मोबाइल नंबर देकर चले गये ।दीदी को अंदर सघन कक्ष (आई सी यू)में ले ज़ाया गया,वहाँ पेन किलर् इंजेक्शन देकर सुला दिया गया ।

मैं चुपचाप बाहर बेंच पर बैठ गई।सिस्टर ने सहानुभूतिपूर्वक कहा-अभी डा रूमा आ जायेंगीं,वे आर्थोपीडिक्स सर्जन हैं ।मरीज़ उनके हाथ में इधर से गया,उधर से चलता हुआ आया।

डा रूमा माथा झनझना उठा ,क्योंकि यह नाम बहुत कम सुनने में आता है ।

मेरी रूमा तो हज़ारों मील दूर अमेरिका में थी ।उसके तो दोनों बेटे ही हैं ।दोनों ही डाक्टर ।

रूमा नाम पर उसका कितना मज़ाक़ बनता।

मैं सोच में डूबी रही,अचानक बेहद खूबसूरत डाक्टर मेरे समक्ष थी ।उसके एप्रन पर डा रूमा की नेम प्लेट थी ।

उसने बड़ी गर्मजोशी से मुझसे बात की-आंटी आप फ़्रिक न कीजिए,कल ही आपरेशन हो जाएगा और दो दिन बाद घर जा सकती हैं ।

एक दम अनूठी,कोई घमंड नहीं,शायद मेरी उम्र का लिहाज़ किया,यह भी अनुभव किया कि मरीज़ के साथ केवल मैं ही थी।

अंदर जाकर मरीज़ को देखा,बाहर आ कर सांत्वना दी-ज़्यादा बड़ा फ़्रैक्चर नहीं है,कल सुबह ही पहला आपरेशन लगवा देती हूँ ।दो दिन बाद डिस्चार्ज कर दिया जायेगा ।

अचानक पूछ बैठी-आंटी,आप मुंबई की नहीं लगतीं,क्या बाहर से आई हैं ।

हाँ बेटा,मैं इनके पोते की शादी में जबलपुरसे  शामिल होने आई थी अब फँस गयी।

 

ओह आंटी चीयर अप।

हाँ,जब डा रूमा आपके साथ है-एक युवा डाक्टर ने कहा ।

आंटी,ये डा प्रबोध हैं,मेडिसिन में हैं ।

आगे भी बतायें कि हम लोग इंगैज्ड हैं ।जल्द शादी करने वाले हैं ।

डा प्रबोध काफ़ी बातूनी लगे-चलिए मैडम,आपको घर छोड़ दूँ ।

आप को पता है कि पापा आये होंगे ।

पता नहीं क्यों मुझे अपने से लगे।दोनों की नोक झोंक अच्छी लग रही थी ।

आशा सिंह

आशा सिंह

यह भी पढ़ें –

हनुमान अंश- एक नजर

6 कथाकार 6 कहानियाँ – बदलते समय की दस्तक 

विशोका- समय को फलांग कर तथ्यों का आकलन करती वैचारिक कृति

भीतर बहुत भीतर- विवेक मिश्र की कहानी पर प्रतिक्रिया

आपको वरिष्ठ साहित्यकार आशा सिंह जी की धारावाहिक कहानी बिटिया का तीसरा भाग कैसा लगा ? हमें अपनी प्रतिक्रिया से अवश्य अवगत कराए ।अगर आपको हमारा काम पसंद आता है तो अटूट बंधन साइट को सबसक्रीब कारेब व अटूट बंधन फ़ेसबुक पेज को लाइक करें । आपका छोटा सा सहयोग हमें बेहतर काम करने की प्रेरणा देगा ।

Share on Social Media

Leave a Comment

error:

जिस तरह एक स्वस्थ रिश्ते की नींव आपसी विश्वास और समझदारी पर टिकी होती है, उसी तरह परिवार की आर्थिक सेहत के लिए भी सूचित और सतर्क फ़ैसले ज़रूरी हैं। डिजिटल युग में नए-नए वित्तीय विकल्प लगातार उभर रहे हैं, और जो लोग इनकी बारीकियों को समझना चाहते हैं, वे अक्सर bitcoin sázení जैसे विषयों पर विस्तृत जानकारी पढ़ते हैं। हालाँकि, यह कभी न भूलें कि सट्टेबाज़ी में हमेशा जोखिम शामिल होता है और इसे कभी भी आय या पैसा कमाने के भरोसेमंद साधन के रूप में नहीं देखना चाहिए — बेहतर यही है कि ऐसे विकल्पों में केवल उतना ही शामिल हों, जितना आप खोने का खर्च उठा सकते हैं, और ज़रूरत पड़ने पर किसी जानकार से सलाह ज़रूर लें।