जुदाई में प्रयुक्त
ऋतु , जब धरती भी शीत ऋतु में पहना हुआ स्वेत कफ़न उतार कर हरित वस्त्र धारण करती
है| समस्त वसुंधरा सुनहरे पीले पुष्पों के
आभूषणों से खुद का श्रृंगार कर लेती है तो मन मयूर कैसे न नाचे | आदिकाल से वसंत
ऋतु प्रेम की ऋतु के रूप में मनाई जाती रही है | मौसम भी इन मानवीय भावों को
उकसाता है | नृत्य का गीत का अनुराग का एक आल्हादित या उन्मादित करने वाला वातावरण
बन जाता है | प्रेम गीतों की स्वर लहरियां हवा में गूँजने लगती हैं | इसी बीच में आता है प्रेम का आयातित
त्यौहार “वैलेंटाइन डे “ | प्रेम के लिए प्राण देने वाले एक संत की शहादत दुनिया
भर के प्रेमियों में मन में अपने प्रेम को अभिवक्त करने का , उसे खुल कर स्वीकार
करने का एक साहस दे गयी | कुछ लोग इसे नए
ज़माने का प्रेम कह कर संबोधित करते हैं | पर अगर वास्तव में प्रेम है तो वह प्रेम
एक भाव है , एक मिठास जो नए या पुराने
ज़माने की नहीं होती | जो सदा से थी है और रहेगी | कहने सुनने का अभिव्यक्ति का
माध्यम भले ही बदला हो पर प्रेम की यह सरिता अनवरत बहती रहेगी और हृदयों को सींचती
रहेगी |
कहीं यह दर्शाता है जिसे हम प्रेम कहते हैं प्रेम की परिभाषा उससे कहीं अलग ,कहीं अनूठी होगी | हम सब ने अपने जीवन में प्रेम किया है या मात्र उसका स्पर्श किया है या हम सब प्रेम की पहली पायदान
पर ही खड़े हैं | कहना मुश्किल है |
का बुखार सर पर चढ़ा रहता है | रसायन कम होते ही बुखार उतर जाता है | विवाह भी एक
व्यवस्था है | जहाँ लेने और देने का व्यापार है | तुम मुझे ये ये ये दोगे तो मैं तुम्हे वो वो वो दूँगी | तभी तो विवाह में मंत्रोच्चार द्वारा ऊर्जा को बाँध कर मन को बाँधा जाता है | इसमें जन्म –जन्मान्तर का बंधन विकल्प रहित करने की व्यवस्था रही है | जिससे समाज सुचारू रूप से चलता रहे |
परन्तु यहाँ भी देने और लेने की तुला में पलड़े बराबर न होने पर विरोध उत्पन्न होता
है | एक शोषित व् एक शोषक बन जाता है | प्रेम के बंधन में प्रेम कब खत्म हो जाता
है और बस बंधन ही रह जाता है | पता ही नहीं चलता | मुझे महादेवी वर्मा की
पंक्तियाँ बरबस याद आ जाती हैं …
आकर्षण क्षीण होने लगता है | आस –पास वालों की नज़र में विद्रोह करते वक्त जो हीरो बनने
की भावना थी वो समाप्त होने लगती है | साथी के दोष दिखने लगते है | प्रेम अदालतों
के चक्कर लगाने लगता है |प्रेम , जिसको समझने में ऋषि मुनियों ने अपना पूरा जीवन
लगा दिया | जिसको पाने वाले अँगुलियों पर गिने जा सकते हैं| वो प्रेम किसी मेकडोनाल्ड के रेस्ट्रोंन में बैठ कर बर्गर खाते हुए आई लव यू कहने जितना हल्का तो नहीं हो सकता | पर हमने इसे हल्का
समझ रखा है |हल्का बना रखा है |
सकता है बस गिर सकता है | ये गिरना मामूली गिरना नहीं है | यह गिरना मैं का गिरना
है , अहंकार का गिरना है | थोडा सा मिटना है ताकि दूसरे के लिए स्थान खाली हो सके
| जहाँ मेरा कुछ न रहे जो कुछ है सो तेरा का भाव उत्पन्न हो जाए | हमारे देश में
जितने भक्त हुए हैं उनके आगे दास लगाने की परंपरा रही है जैसे सूरदास , तुलसी दास
| जहाँ व्यक्ति सहज ही दास बन जाता है | पर दास बनना इतना स्वाभाविक नहीं हैं | खुद पर दूसरे का
पूर्ण अधिकार स्थापित करने के लिए अहंकार का समूल नाश जरूरी है | प्रेम मिटने की
प्रक्रिया है बनने की नहीं | इसी लिए पीड़ा दायक है , कष्टप्रद है | इस मिटने के
बाद ही आनंद मिलता है जहाँ दो हैं ही नहीं | बस एक है | राधा और कृष्ण की तरह | दर्द के एक आग के दरिया को पार करने के बाद ही यह संभव है |
मुश्किल है | रंगों का विज्ञान हमें समझाता है की रंग वस्तुओं में नहीं प्रकाश में
होता है | हमें जो वस्तु जिस रंग की दिखाई देती है वह उस रंग को छोडती है | बाकी सब रंगों को अपने पास रख लेती है केवल उस रंग को छोडती है | कोई वस्तु हरी दिखाई देती है वो बाकी सारे रंग अवशोषित ( अपने अन्दर समाहित ) कर लेती है और जो रंग परावर्तित ( छोडती ) है हमें उस रंग की दिखाई पड़ती है | नीली वस्तु नीला रंग , लाल वास्तु लाल रंग का त्याग करती है | अगर यही सिद्धांत चिर
नूतन चिर शाश्वत राधा –कृष्ण के प्रेम पर लगाये तो राधा का रंग श्वेत है वो कृष्ण मय हैं वो अपने जीवन में हर रंग का त्याग कर देती हैं | पूर्ण समर्पित प्रेमिका जिसके जीवन में सिर्फ कृष्ण हैं और कोई रंग नहीं | हर रंग उनसे टकराकर लौट जाता है| कोई रंग असर नहीं डालता | कृष्ण स्याम हैं वो हर रंग अपनाते हैं | अच्छा बुरा , दुखी , सुखी | इसलिए वो ईश्वर हैं | शायद
यही प्रेम का रंग है | या सब कुछ छोड़ दो , या सब को अपना लो | दोनों में मैं
टूटेगा ही टूटेगा | या मेरे अन्दर सब या सब के अन्दर मैं | प्रेम जब जब व्यक्ति से
समष्टि की ओर बढा | प्रेम विशाल हो गया |
प्रेम राधा हो गया , प्रेम श्याम हो गया | प्रेम ईश्वर हो गया |
चिल्लाते हैं | चाहते सब हैं | देता कोई नहीं | सब भिखारी हों तो दे कौन | यह आभाव निरंतर बढ़ता जा रहा है | इसलिए हर कोई दुखी है | उसे लगता है उसके जीवन में कंमी है | आभाव है | कोई विरला ही उसे पा पाता है | जो पा लेता है वह न केवल स्वयं तृप्त होता है बल्कि छलकाता भी है |
हैं | प्रेम एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है | दो उर्जाओ का एक हो जाना एक न्यूक्लीयर फ्यूजन , एक
विस्फोट | बहुत कुछ टूटना तब नया बनना |
प्रेम की पहली पर्त बहुत लुहावनी होती है | जिसकी ओर व्यक्ति आकर्षित होता है | दूसरी बहुत सख्त होती है | जिस पर कदम रखते ही व्यक्ति वापस पलट जाता है | सहन नहीं कर पाता है | पल –पल पीड़ा बढती है | तभी तो मीरा चेतावनी देती हैं,” नगर ढिंढोरा पीटती प्रीत न करियो कोय “| और
सच्चे प्रेमी के उसे पार करते ही पूर्ण आनंद की स्थिति आ जाती है | जहाँ प्रेमी और प्रेमिका में एकात्म भाव स्थापित हो जाता है | जहाँ खोना और पाना मूल्यहीन हो जाता है | तभी कृष्ण की मृत्यु का समाचार सुन कर राधा हंसते हुए कहती हैं ,” पगले कृष्ण गए कहाँ हैं , वो कहाँ जा सकते हैं … वो तो पत्ते –पत्ते में हैं , पुष्प –पुष्प पर हैं , कण –कण में हैं |
धूमिल हो जाएगा |
समष्टि की और चलेगा | प्रेम विशाल होगा | प्रेम अमर होगा |
