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शिक्षक दिवस पर विशेष :मैं जानता था बेटी….( संस्मरण )

    
डॉ . भारती वर्मा ‘बौड़ाई ‘
  ये तब की बात है जब मैं पांचवीं कक्षा में पढ़ती थी। एक सप्ताह में संस्कृत विषय के नौ पीरियड हुआ करते थे। मध्याह्न के तीन पीरियड में संस्कृत के गुरु जी सबकी लिखाई अच्छी हो, इसके लिए वे पुस्तक का एक पूरा पाठ लिखवा कर देखा करते थे। कक्षा के कुछ छात्र तो इस अंतिम पीरियड में भाग जाते, कुछ अधूरा पाठ लिख कर दिखाते थे। मेरी लिखाई अच्छी थी। मैं पूरा पथ लिखती, दिखाती और सदा वेरी गुड पाती थी। उन शैतान विद्यार्थियों की देखा-देखी मैंने भी लिखाई के पीरियड में आधा पाठ लिख कर दिखाना आरंभ किया और गुरु

जी पूर्ववत वेरी गुड देकर शाबाशी देते रहे, हस्ताक्षर करते रहे। मन में एक कचोट सी उठती थी कि मैं उनसे झूठ बोल रही हूँ। एक दिन कॉपी दिखाते समय मुझसे रहा नहीं गया और कॉपी में उनके गुड लिखने से पहले ही मैं बोल उठी–गुरु जी मुझे गुड़ मत दीजिए, मैंने पाठ पूरा नहीं लिखा है। तो वे बहुत प्यार से बोले–मैं जानता था बेटी, और ये जानता था कि अपनी इस गलती को तुम स्वयं अनुभव करोगी और आकर मुझे बताओगी, क्योंकि कक्षा के जिन शैतान  विद्यार्थियों के साथ आलस्य व झूठ के जिस रास्ते पर तुमने कदम रखा,वह रास्ता तो तुम्हारा है ही नहीं। इसलिए तुम्हें गुड-वेरी गुड़ देने में मुझे कभी संकोच नहीं हुआ। तुम अपने रास्ते पर लौट आई हो…तो अब देखना, जीवन में फिर कभी भी तुम ऐसे लोगों का साथ नहीं करोगी।
    संस्कृत के गुरु जी के मुझ पर किये उस विश्वास की आभा ने मुझमे सही और गलत पहचानने की जो क्षमता मुझमे विकसित की, उसके कारण ही मैं आज भी गलत लोगों के साथ से दूर हूँ। इसके लिए जीवन भर मैं उन गुरु जी की ऋणी रहूँगी।


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डॉ.भारती वर्मा बौड़ाई
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