लघुकथा संगोष्ठी -क्षितिज :कहानी का शोर उसकी सबसे बड़ी बाधा है।

लघुकथा एक ऐसी विधा है जिसमे शिल्प के साथ ही कथानक का होना जरूरी है क्योंकि यह कथानक ही भाव और संवेदना को पाठक तक ले जाता है। कथानक की संवेदना तीव्रता से पाठक तक पहुंचना भी जरूरी है लेकिन इसके लिए पाठकों पर विश्वास करते हुए बहुत धैर्य की जरूरत है। कथानक ना तो बहुत वर्णनात्मक हो और ना ही कथा का अंत बहुत खुला हुआ हो। सांकेतिक कथा विशिष्ठ प्रभाव छोड़ती है। क्षितिज की लघुकथा गोष्ठी में अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार सूर्यकांत नागर जी ने पढ़ी गई लघुकथाओं पर बात करते हुए कहा कि हर विधा के कुछ नियम होते हैं जिन्हें मानना जरूरी होता है लघुकथा में कल्पनाशीलता और कला का समावेशी होना बेहद जरूरी है। लघुकथा में कुछ अनकहा रह जाये जिसे पाठक आसानी से पकड़ ले यह कला लघुकथा लेखक में होनी चाहिए।
क्षितिज संस्था सन 1977 से लघुकथाओं पर काम कर रही है और लघुकथाओ  पर पत्रिका का प्रकाशन कर रही है। उस समय इंदौर के लघुकथाकार सायकिल पर इन गोष्ठियों में शामिल होने आते थे। क्षितिज के शुरूआती दिनों से जुड़े कई लघुकथाकार आज की इस गोष्ठी में शामिल हुए हैं और साथ ही नई पीढ़ी के भी कई लघुकथाकार इसमें सहभागिता कर रहे हैं यह गर्व का विषय है। कार्यक्रम का आगाज़ करते हुए क्षितिज के अध्यक्ष सतीश राठी जी ने यह बात कही और सबका स्वागत किया। 
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ व्यंग्यकार जवाहर चौधरी ने कहा लघुकथा से पहला परिचय चंदामामा की लघुकहानियों के माध्यम से हुआ था जिन्हें बहुत चाव से पढ़ा जाता था। जब लघुकथा विधा अपने शैशवकाल में थी तब इन्हीं कथाओं की स्मृति इन्हें रचने की राह दिखाती थी। 
रविवार को अहिल्या केंद्रीय पुस्तकालय में हुए कार्यक्रम में डॉक्टर रमेश चंद्र , अशोक शर्मा भारती , पुरुषोत्तम दुबे , सतीश राठी, योगेंद्र नाथ शुक्ल , अश्विनी कुमार दुबे , ब्रजेश कानूनगो , वेद हिमांशु ,  कविता वर्मा , अंतरा करवड़े , डॉक्टर दीपा व्यास , विनीता शर्मा , डॉ अखिलेश शर्मा, सुरेश बजाज,शारदा गुप्ता,कृष्णकांत निलोसे सहित शहर के अठारह लघुकथाकारों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। सभी ने अपनी दो दो रचनाएँ सुनाई। 
रचनाओं पर चर्चा हुए श्री सुरेश उपाध्याय ने उनमे मौजूद सूक्ष्म निरीक्षण और उनकी सुघड़ता की सराहना की। तो प्रदीप कान्त ने निरीक्षण को सशक्त रूप से विधा में बदलने की कला को इंगित किया। 
प्रदीप मिश्र ने चुनिंदा लघुकथाओं पर बात करते हुए उनकी भविष्य दृष्टी , स्ट्रोक , काव्यात्मकता , व्यंग्यात्मकता और भाषा शिल्प को इंगित किया। नंदकिशोर बर्वे ने लघुकथा की गागर में सागर भरने को श्रमसाध्य कार्य निरूपित किया। जलेस अध्यक्ष रजनीरमण शर्मा ने अपने निरीक्षण को सही समय पर प्रस्तुत करने की जरूरत पर जोर दिया और कहा लघुकथाओं में बड़ी बड़ी कहानियाँ समाहित होती हैं इन्हें आज के समय के तीखेपन और शिद्दत के साथ दर्ज करें। 
कार्यक्रम के दौरान स्वर्गीय सतीश दुबे और एन. उन्नी जी को लघुकथा में उनकी पारंगतता के लिए याद किया गया। अंत में अशोक शर्मा भारती ने आभार व्यक्त किया। 
रपट
कविता वर्मा
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