ब्रह्मवादिनी की प्रथम राष्ट्रीय संगोष्ठी में हुए विमर्श के मत्त्वपूर्ण सत्र

 

“कीरति भनिति भूति भलि सोई।

सुरसरि सम सब कहँ हित होई॥”

तुलसीदास

साहित्य वही है जिसमें सबका हित हो। कविता, कहानी, लेख किसी विधा के नाम भले ही हों पर इनका मूल उद्देश्य इनके माध्यम से समाज में मानवीय मूल्यों का बीजारोपण है। एक स्वस्थ समाज के निर्माण हेतु समय-समय पर विमर्श होते रहे हैं। ऐसे ही विमर्श स्वर को लेकर आई है “ब्रह्मवादिनी सेंटर फॉर इंडिक स्टडीज”। जिसकी फाउन्डर हैं सुपरिचित साहित्यकार सोनाली मिश्रा।

 

दिनांक 23 मई 26 को इसके विमर्श की शृंखला का शुभारंभ साहित्य अकादमी के कॉन्फ्रेंस हॉल में एक तीन स्त्रीय वैचारिक गोष्ठी के माध्यम से हुआ। जिसे वरिष्ठ व विषय के प्रति गंभीर वक्ताओं ने अपनी सहभागिता से महत्वपूर्ण बना दिया। साहित्यिक संस्था कस्तूरी व देवी महोत्सव संस्थान के सहायोजन में हुए इस कार्यक्रम में देश के जाने माने साहित्यकारों ने भाग लिया।

 

पहले सत्र : महिला साहित्य की सतत धारा का संचालन करते हुए सोनाली मिश्रा ने कई महत्वपूर्ण बिंदुओं को उठाया। प्रश्न -उत्तर के माध्यम से चली इस शृंखला में वैज्ञानिक शिक्षाविद व सामाजिक कार्यकर्ता ज्योति चौथाईवाला ने अपने वक्तव्य में कहा कि भारतीय साहित्य में महिलाओं का योगदान तो वैदिक काल से है। उन्होंने ऋषिकाओं के उदाहरण दिए जिन्होंने विवाह के मंत्रों की रचना की। वरिष्ठ व्यंग्यकार अर्चना चतुर्वेदी ने मंडन मिश्र और आदि शंकराचार्य के बीच हुए ऐतिहासिक शास्त्रार्थ में मंडन मिश्र की पत्नी भारती देवी के मध्यस्थ बनाए जाने की बात का जिक्र करते हुए कहा कि दो विद्वानों के बीच एक की पत्नी को निर्णायक बना देना इस बात का प्रमाण है कि साहित्य में स्त्रियों को सदा से मान -सम्मान मिलता रहा है। मुख्य रूप से उन्होंने अपने वक्तव्य को पिछले दशक में आए महिला लेखन पर केंद्रित करते हुए कहा कि आज स्त्री रचनाकार देह विमर्श के चालू फॉर्मूले से हटकर निरंतर  नए और सार्थक विषयों पर लिख रहीं हैं। ये स्त्री मेधा के प्रस्फुटन का युग है। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रेरणा मल्होत्रा  ने कहा कि पुरुष की बारहवीं पसली से उत्पन्न स्त्री के बरक्स वेदों में पहले ही स्त्री पुरुष को चने के दाने के दो भागों के बराबर बताया है। अपने वक्तव्य को वेदों से लेकर अभी तक के साहित्य पर अपनी पैनी दृष्टि से सार्थक किया।

दूसरे सत्र : साहित्य की भारतीय अवधारणा का संचालन युवा साहित्य एवां कला अध्येता विशाल ने किया । शिक्षाविद वेद प्रकाश वत्स जी ने भारतीय साहित्य के महत्वपूर्ण बिदुओं  पर अपनी बात रखी। कथाकार अलका सिन्हा जी ने आज के रील कल्चर और अटेन्शन स्पैन की कमी को गहन और गंभीर साहित्य के अध्ययन के लिए खतरा बताया। चिंतक व शिक्षाविद वंदना झा जी ने बोली-बानी से समृद्ध होती भाषा का स्वागत करते हुए मिथिला की कई लोकोक्तियों से चर्चा को रोचक बना दिया।

तीसरा सत्र : साहित्य बनाम पुरस्कृत साहित्य का संचालन किया युवा साहित्यकार प्रेरणा कश्यप ने। चर्चा के दौरान साहित्यकार इंदुशेखर तत्पुरुष जी ने पुरस्कारों में विचारधाराओं और मठों की भूमिका पर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि पुरस्कार से लेखक का उन्नयन होता है पर साहित्य का हो यह जरूरी नहीं। वरिष्ठ कवि समीक्षक राजेश्वर वशिष्ठ जी ने आजकल हर किसी ने नाम पर दिए जाने वाले आम पुरस्कारों की बढ़ती हुई संख्या पर खेद व्यक्त करते हुए कहा कि इससे कम अच्छी रचनाएँ चर्चा में आ जाती हैं जो पाठक के साहित्य से विमुख होने का कारण भी बन सकती हैं। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्राचार्या शिक्षाविद रमा शर्मा जी ने कहा कि यत्र-तत्र पुरस्कार लेने की होड के स्थान पर नए लेखकों को पढ़ने पर ध्यान देना चाहिए। इससे उन्हें स्वयं अपनी रचना की स्थिति पता चलेगी।

धन्यवाद ज्ञापन के साथ यह कार्यक्रम समाप्त की घोषणा करते हुए सोनाली मिश्रा ने इस शृंखला को आगे जारी रखने की बात की।

रिपोर्ट : अटूट बंधन

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1 thought on “ब्रह्मवादिनी की प्रथम राष्ट्रीय संगोष्ठी में हुए विमर्श के मत्त्वपूर्ण सत्र”

  1. बहुत अच्छी रिपोर्ट है.
    शुभकामनायें.

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