जीवन में दुःख व कष्ट मिलना प्रभु की असीम कृपा है

प्रदीप कुमार सिंह, शैक्षिक एवं वैश्विक चिन्तक
1. प्रभु के इस विश्वस्त सेवक का नाम है- दुःख:- 
            प्रभु जब किसी को अपना मानते
हैं
, उसे गहराइयों से प्यार करते हैं तो उसे अपना सबसे भरोसेमंद सेवक प्रदान करते हैं
और उसे कहते हैं कि तुम हमेशा मेरे प्रिय के साथ रहो
, उसका दामन कभी न छोड़ो। कहीं
ऐसा न हो कि हमारा प्रिय भक्त अकेला रहकर संसार की चमक-दमक से भ्रमित हो जाए
,
ओछे आकर्षण की
भूलभुलैयों में भटक जाए अथवा फिर सुख-भोगों की कँटीली झाड़ियों में अटक जाए। प्रभु
के इस विश्वस्त सेवक का नाम है- दुःख। सचमुच वह ईश्वर के भक्त के साथ छाया की तरह
लगा रहता है।
’’

2. निस्संदेह यह दुःख ही ईश्वरीय अपनत्व की कसौटी है:-
            ज्यों ही जीवन में दुःख का
आगमन होता है
, चेतना ईश्वरोन्मुखी होने लगती है। दुःख का हर पल हृदय की गहराइयों में संसार
की यथार्थता
, इसकी असारता एवं निस्सारता की अनुभूति कराता है। इन्हीं क्षणों में सत्य की
सघन अनुभूति होती है कि मेरे अपने
, कितने पराए हैं। जिन सगे-संबंधियों, मित्रों-परिजनों, कुटुंबियों-रिश्तेदारों को
हमें अपना कहने और मानने मंे गर्व की अनुभूति होती थी
, दुःख के सघन होते ही उनके
परायेपन का सच एक के बाद एक उजागर होने लगता है। इन्हीं पलों में ईश्वर की याद
विकल करती है
, ईश्वरीय प्रेम अंकुरित होता है। प्रभु के प्रति अपनत्व सघन होने लगता है।’’
3. दुःख तथा कष्ट में मानवीय संवेदना का समुचित विकास होता है:-   
            ‘‘प्रभु का विश्वस्त सेवक दुःख
अपने साथ न रहे तो अंतरात्मा पर कषाय-कल्मष की परतें चढ़ती जाती हैं। अहंकार का
विषधर समूची चेतना को ही डस लेता है। आत्मा के प्रकाश के अभाव में प्रवृत्तियों
एवं कृत्यों में पाप और अनाचार की बाढ़ आ जाती है। सत् और असत् का विवेक जाता रहता
है। जीवन सघन अँधेरे और घने कुहासे से घिर जाता है। इन अँधेरों की मूच्र्छा में वह
संसार के छद्म जाल को अपना समझने लगता है और प्रभु के शाश्वत मृदुल प्रेेम को
पराया और तब प्रभु अपने प्रिय को उबारने के लिए उसे अपनाने के लिए अपने सबसे
भरोसेमंद सेवक दुःख को उसके पास भेजते हैं।
’’
4. दुःखों को प्रभु के अपनत्व की कसौटी समझकर स्वीकार करना चाहिए:-     
            ‘‘जिनके लिए दुःख सहना कठिन है,
उनके लिए भगवान को
अपना बताना भी कठिन है। ईश्वर के साथ संबंध जोड़ने का अर्थ है- जीवन को आदर्शों की
जटिल परीक्षाओं में झोंक देना। प्रभु के प्रति अपनी श्रद्धा को हर दिन आग में
तपाते हुए उसकी आभा को नित नए ढंग से प्रदीप्त रखना पड़ता है। तभी तो भगवान को अपना
बनाने वाले भक्त उनसे अनवरत दुःखों का 
वरदान माँगते हैं। कुुुंती
, मीरा, राबिया, तुकाराम, नानक, ईसा, बुद्ध, एमर्सन, थोरो आदि दुनिया के हर कोने रहने वाले परमात्मा के भक्तों ने अपने जीवन में
आने वाले प्रचंड दुःखों को प्रभु के अपनत्व की कसौटी समझकर स्वीकार किया और
हँसते-हँसते सहन किया। प्रभु ने जिनको अपनाया
, जिन्होंने प्रभु को अपनाया, उन सबके हृदयों से यही स्वर
गूँजे हैं कि ईश्वरभक्ति एवं आदर्शों के लिए कष्ट सहना
, यही दो हाथ हैं, जिन्हें जोड़कर
भगवत्प्रार्थना का प्रयोजन सही अर्थों में पूरा हो पाता है।
’’
5. हम स्वयं ही अपने मित्र और स्वयं ही अपने शत्रु हैं:-  

            हमें अपनी सहायता के लिए
दूसरों के सामने गिड़गिड़ाना नहीं चाहिए
; क्योंकि यथार्थ में किसी मंे भी इतनी शक्ति नहीं है,
जो हमारी सहायता कर
सके। हमें किसी कष्ट के लिए दूसरों पर दोषारोपण नहीं करना चाहिए
; क्योंकि यथार्थ में कोई भी
हमें दुःख नहीं पहुँचा सकता। हम स्वयं ही अपने मित्र और स्वयं ही अपने शत्रु है।
अपना दृष्टिकोण हम जिस क्षण भी बदल देंगे तो दूसरे ही क्षण यह भय के भूत अंतरिक्ष
में तिरोहित हो जाएँगे। हबडे़ से बड़ा दुःख आने पर घबराना नहीं चाहिए वरन् सबसे
पहले अपने से कहना चाहिए कि मैं इसे स्वीकार करता हूं। स्वीकार करते ही वह दुःख
छोटा हो जायेगा। स्वीकार करने के बाद उसका हल भी आसानी से निकल आता है। में जीवन में
इस संकटमोचन मंत्र को अपनाना चाहिए कि तुझे (हमारे अंदर स्थित प्रभु) लगे जो अच्छा
,
वही मेरी इच्छा। 

 तेजज्ञान फाउण्डेशन, पुणे द्वारा आयोजित शिविरों का विवरण 



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