लखनऊ
मच जाये:-
बनायी तभी से अपने सेवकों सूर्य, वायु, चन्द्रमा, ग्रह, पर्यावरण, प्रकृति आदि को अपने द्वारा रचित मानव जाति की सेवा के लिए
नियुक्त किया। सृष्टि का गतिचक्र एक सुनियोजित विधि व्यवस्था के आधार पर चल रहा
है। ब्रह्ममाण्ड में अवस्थित विभिन्न नीहारिकाएं ग्रह-नक्षत्रादि परस्पर सहकार-संतुलन
के सहारे निरन्तर परिभ्रमण विचरण करते रहते हैं। अपना भू-लोक सौर मंडल के वृहत
परिवार का एक सदस्य है। सारे परिजन एक सूत्र में आबद्ध हैं। वे अपनी-अपनी कक्षाओं
में घूमते तथा सूर्य की परिक्रमा करते हैं। सूर्य स्वयं अपने परिवार के ग्रह
उपग्रह के साथ महासूर्य की परिक्रमा करता है। इतने सब कुछ जटिल क्रम होते हुए भी
सौर, ग्रह, नक्षत्र एक दूसरे के साथ न केवल बंधे हुए हैं वरन् परस्पर अति महत्वपूर्ण
आदान-प्रदान भी करते हैं। इस सृष्टि का रचनाकार परमात्मा कभी अवकाश नहीं लेता है
तथा उसके सेवक सूर्य अपनी किरणों
के द्वारा संसार को रोशनी तथा ऊर्जा से भरने के
लिए सदैव बिना थके अपना कार्य करता रहता है। वायु निरन्तर बहते हुए सभी को सांसों
के द्वारा जीवन प्रदान करती है।
है:-
उनके अवतार राम, कृष्ण, बुद्ध, अब्राहम, मुसा, महावीर, जरस्थु, ईसा, मोहम्मद, नानक, बहाउल्लाह भी जीवन पर्यन्त बिना छुट्टी लिए मानव जाति के उद्धार के लिए कार्य
करते रहे। जब-जब धर्म की हानि होती है तब-तब परमात्मा मानव जाति के दुखों को दूर
करके उनके जीवन में हर्ष, आनन्द, स्वास्थ्य, सुख, समृद्धि भरने के लिए संसार के सबसे पवित्रतम हृदय वाले मानव की आत्मा में
अवतरित होता है। परमात्मा ने अपने संदेश वाहक के रूप में राम, कृष्ण, बुद्ध, अब्राहम, मुसा, महावीर, जरस्थु, ईसा, मोहम्मद, नानक, बहाउल्लाह को युग युग में
अपने मानव कल्याण के कार्य के लिए चुना है।
की तरह संसार में किसी माँ की कोख से होता है। अवतारों का शरीर भी मनुष्य की तरह
ही हाड़-मांस के बने होते हैं तथा इनकी देह भी नाशवान होती है। वे जीवन-पर्यन्त
परमात्मा की इच्छा के लिए जीते हुए भौतिक शरीर को त्याग कर परमात्मा के लोक में
चले जाते हैं। संसार से जाने के पूर्व ये अवतार मानव जाति के मार्गदर्शन के लिए
पवित्र पुस्तकंे जैसे गीता, त्रिपटक, बाईबिल, कुरान, गुरू ग्रन्थ साहिब, किताबे अकदस दे जाते हैं। अवतारों की एकमात्र इच्छा परमात्मा का सेवक बनकर
दुखों तथा कष्टों से घिरी मानव जाति को कल्याण, विकास, प्रकाश, ज्ञान तथा मुक्ति की राह दिखाना होता है। ये अवतार
अपनी मजबूत आत्मा के बल से भारी कष्ट उठाकर मानव जाति के जीवन में अपनी शिक्षाओं
के द्वारा सुख, समृद्धि, यश तथा आनन्द भरकर जीवन यात्रा को सफल बनाते हैं। अवतारों के पास मानव जाति को
सुखी बनाने के लिए परमपिता परमात्मा से प्राप्त विचार, मार्गदर्शन तथा प्रेरणा का
खजाना होता है। परमात्मा के द्वारा
नियुक्त सभी अवतारों ने मानव जाति के जीवन को सुखी बनाने के लिए कार्य किया और कभी
भी छुट्टी नहीं ली।
से प्रेरणा लेकर संसार के महापुरूष भी जीवन-पर्यन्त बिना छुट्टी लिए मानव जाति की
एकता, खुशहाली, समृद्धि, विकास तथा न्याय के लिए कार्य करते रहे। महात्मा गांधी, पं0 जवाहर लाल नेहरू, डा0 अम्बेडकर, डा0 राधाकृष्णन, अब्राहम लिंकन, एडीशन, आइंस्टीन, मदर टेरेसा, ग्राहम बेल, मेरी क्यूरी, न्यूटन, आर्य भट्ट, जैम्स बाट, विनोबा भावे जैसे अनेक
साधारण व्यक्ति महान इसलिए बने क्योंकि उन्होंने मानव जाति के कल्याण के कार्य से
कभी छुट्टी नहीं ली। वे पूरे मनोयोग से मानव कल्याण संबंधी कार्य में लगे रहते थे।
महापुरूषों ने अपने परिवारों का भरण पोषण भी भली प्रकार किया। वे भी साधारण लोगों
की तरह खाते, पीते, सोते आदि सभी दिनचर्याऐं करते थे लेकिन अपने जीवन का उद्देश्य एक पल के लिए भी
नहीं भूलते थे। यदि ये महापुरूष कार्य से अवकाश लेते तो मानव जाति की इतनी
महत्वपूर्ण सेवा तथा समाजोपयोगी नई-नई खोजें न कर पाते। परमात्मा की नौकरी करने
वालों को अंतिम सांस तक अवकाश प्राप्त नहीं होता है। शरीर बूढ़ा होकर कमजोर हो सकता
है लेकिन आत्मा तथा मस्तिष्क कभी बूढ़े नहीं होते हैं।
कार्य करते हैं:-
मनुष्य एक सामाजिक
प्राणी है तथा मनुष्य एक आध्यात्मिक प्राणी है। मनुष्य के जीवन में भौतिकता,
सामाजिकता तथा
आध्यात्मिकता का संतुलन जरूरी है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने घर-परिवार के सदस्यों
की शिक्षा, स्वास्थ्य, कैरियर, मुकदमें, नाते-रिश्तेदारी आदि के प्रति अपने कत्र्तव्यों को निभाना पड़ता है। साथ ही
इससे आगे बढ़कर परमात्मा द्वारा निर्मित समाज की बेहतरी की चिन्ता भी करना चाहिए।
संतुलित व्यक्ति अपने घर के कत्र्तव्यों को भली प्रकार पूरा करते हुए अपनी नौकरी
तथा व्यवसाय से जुड़े कत्र्तव्यों को भी बड़े ही सुन्दर ढंग से पूरा करते हैं। प्रभु
की राह पर चलते हुए नौकरी या व्यवसाय करने वाले लोगों के लिए अन्य लोगों के मन में
काफी विश्वास तथा सम्मान की भावना होती है जिसके कारण प्रभु की राह पर चलने वाले
इन लोगों का भौतिक, सामाजिक तथा आर्थिक लाभ तथा यश भी अन्य की तुलना में काफी अधिक हो जाता है।
लेकिन बेईमानी से नौकरी तथा व्यवसाय करने वालों की भौतिक, सामाजिक तथा आर्थिक समृद्धि
तथा लोकप्रियता बिना नींव के मकान की तरह होती है।
समाज, जाति तथा राष्ट्र उन्नति
करता है जो कड़ी मेहनत तथा ईमानदारी से निरन्तर अपनी नौकरी या व्यवसाय करता है।
इसके विपरीत जो ज्यादा छुट्टी तथा ज्यादा आराम करते हैं वे पिछड़ जाते हैं। कई लोग
तो अपने शरीर के साथ ही मस्तिष्क को छुट्टी दे देते हैं। ये लोग दफ्तर या दुकान
में पूरे दिलो-दिमाग से कार्य नहीं करते हंै। समाज में आये दिन हो रही दुर्घटनाओं
का कारण कही न कही संबंधित विभाग के किसी अधिकारी या कर्मचारी द्वारा बरती गई
लापरवाही ही है। एक गीत की पंक्तियाँ हैं – एक झोली में फूल भरे हैं एक झोली में
काॅटे! कोई कारण होगा? अर्थात् एक झोली में सफलता तथा एक झोली में असफलता भरी है। इसके पीछे कारण
मस्तिष्क से कार्य लेना या मस्तिष्क को भी छुट्टी दे देना ही है। अतः हमें अपने मन
को सामाजिक उत्तरदायित्वों की तरफ मोड़ना चाहिए। यह परमात्मा के प्रति हमारा
उत्तरदायित्व भी है।
निर्धारित कार्य में गुणवत्ता आती है। कार्य के प्रति हमारी रूचि बढ़ती है। हमारे
गुणवत्ता से भरे कार्य से आफिस के अधिकारी खुश होते हैं। हमारे ऊपर अनावश्यक कार्य
का बोझ नहीं रहता है।
व्यवसाय में समय देने से अतिरिक्त आय होती है जिससे परिवार की आवश्यकतायें ठीक तरह
से पूरी होती हंै।
नेतृत्व की क्षमता तथा बुद्धि का विकास होता है। कार्य में निरन्तर पूरे मनोयोग से
लगे रहने से ऊँचा सोचने का स्वभाव विकसित होता है। तार्किक बुद्धि हो जाती है। काम
की बारीकियों से परिचय होता है। अनावश्यक छुट्टी न लेने से तन तथा मन स्वस्थ होता
है। विचारों में बिखराव नहीं वरन् विचार एकाग्र तथा व्यवस्थित होते हंै।
व्यवसाय से अनावश्यक रूप से छुट्टी लेने से किंकर्तव्यविमुणा हो जाता है। ऐसे
व्यक्ति का अपने निश्चित कार्य या व्यवसाय से ध्यान हट जाने के कारण समय कटना
मुश्किल हो जाता है। इस कारण से वह सिनेमा, नशे, गलत संगत आदि बेकार कार्यो में टाइम पास करने लगता
है। आगे चलकर उसे निराशा तथा आलस घेर लेती है। इस प्रकार निराश तथा आलसी व्यक्ति
जीवन में हाथों से काम करने के साथ ही साथ मस्तिष्क से सोचना भी बंद कर देता है और
जीते हुए मृत्यु जैसी अवस्था को प्राप्त करता है।
वाले व्यक्ति को उनके अधिकारी जिम्मेदारी से भरे कार्य देना बंद कर देते हैं।
महत्वपूर्ण कार्यो से वंचित हो जाने के कारण ऐसे व्यक्ति की कार्य कुशलता तथा
लोकप्रियता धीरे-धीरे घटने लगती है। आगे चलकर वह व्यक्ति अपनी लापरवाही के कारण
स्वयं कुंठा, निराशा तथा हताशा से घिर जाता है।
द्वारा अपनी आत्मा के विकास का अमूल्य अवसर भी खो देता है। इस प्रकार एक छोटी सी
अज्ञानता उसके भौतिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक विकास को रोक देती है।
को छुट्टी न लेने वालों की तुलना में कम वेतन की प्राप्ति होती है। आय कम होने से
परिवार में सम्मान घटता है।
कार्य के प्रति हमारी अरूचि बढ़ती है। हमारे गुणवत्ताविहीन तथा विलम्ब से कार्य को
पूरा करने से आफिस के अधिकारी तथा ग्राहक असंतुष्ट तथा नाराज रहते हैं।
नहीं निपटने से कार्य का बोझ दिन प्रतिदिन बढ़ता जाता है। कार्य का बोझ बढ़ने से
सदैव तनाव बना रहता है। तनावपूर्ण जीवन जीने से अनेक रोग घेर लेते हैं।
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