रही है।
में हैजा फैल गया है, जिस कारण स्थिति गंभीर है। मैंने उसी समय वहां का रूख किया। पर झुग्गी में
घुसते ही मैं स्तब्ध रह गई। उससे पहले मैं कभी झुग्गी के अंदर नही गई थी। वहां
चारों तरफ गंदगी बिखरी थी। बच्चे गंदगी के पास ही खेल रहे थे। मैंने तत्काल किसी
के एक मेज मांगा और एक पेड़ नीचे बैठ गई। और तभी बीमारों का इलाज शुरू हो गया।
लगे, वहीं बाहर के कुछ लोगों ने भी मेरा साथ दिया। बहुत से लोगों ने मेरी मदद भी
की। मैंने उसी झुग्गी बस्ती में एक छोटे से कमरे में अपनी क्लीनिक खोली। कुछ दिनों
तक वहां काम करने के बाद मैंने खासकर वहां की औरतों की दशा सुधारने के लिए आशा
सोसाइटी की स्थापना की। मुझे लगा कि अगर मैं झुग्गी की महिलाओं के रहन-सहन और उनकी
सोच में बदलाव ला पाई, तो यह उनके लिए ज्यादा मददगार साबित होगा।
रूप में तैयार करना शुरू किया।
बेहतरी के बारे में कुछ पता नहीं था, उन्हें दूसरी महिलाओं और बच्चों को स्वस्थ रखने की
जिम्मेदारी देने, उन्हें साफ-सफाई का महत्व समझाने के लिए तैयार करने में वक्त लगना ही था।
लेकिन मैंने यह भी पाया कि खुद को बदलने के मामले में महिलाएं पुरूषों की तुलना
में आगे थीं और उनमें सामूहिकता की भावना ज्यादा मजबूत थी। एक महिला को कोई जानकारी
दी जाती, तो कुछ ही समय में सारी औरतों को इस बारे में पता चल जाता था। मैंने उन्हें
पौष्टिक भोजन, साफ-सफाई, खुले में शौच की आदत छोड़ने और बच्चों के टीकाकरण के बारे में समझाया।
लगा। झुग्गियों की स्थिति सुधरने लगी। आज हर झुग्गी बस्ती में एक आशा सोसाइटी है,
जहां एक क्लीनिक है।
इन क्लीनिकों में डाॅक्टर और प्रशिक्षित नर्स तो हैं ही कुछ क्लीनिकों में एक्स-रे
और ईसीजी की भी व्यवस्था है। आशा सोसाइटी महिलाओं के लिए छह महीने का प्रशिक्षण
कार्यक्रम चलाती है। इसके बाद उन्हें एक मेडिकल बाॅक्स दिया जाता है। फिर ये
महिलाएं झुग्गी-बस्तियों में जाकर महिलाओं को स्वास्थ्य और साफ-सफाई के बारे में
बताती हैं।
झुग्गी-बस्तियों में नवजात मृत्यु दर तो घटी ही है, प्रसव के समय माताओं की मृत्यु के मामले भी न के
बराबर रह गए हैं। हालांकि झुग्गियों में मेरा प्रवेश वहां के अनेक पुरूषों को
अच्छा नहीं लगा। उन्हें महसूस हुआ कि यह लेडी डाॅक्टर उनकी पुरूष सत्ता को चुनौती
देने आई है। पुरूषों की यह वर्चस्ववादी भावना अभी खत्म नही हुई।
जहां के मर्दाें का
शिक्षा और आधुनिक सोच से बहुत कम रिश्ता है। पर मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है।
आज मैं दिल्ली की करीब साठ झुग्गी-बस्तियों में घूमती हूं। वहां के पांच लाख से
अधिक मरीज मेरी देख-रेख में ठीक हुए हैं। अब झुग्गियों में रहने वाले लोगों का जीवन
स्तर सुधरा है और उनकी आय भी बढ़ी है।


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