प्रिंट या डिजिटल मीडिया -कौन है भविष्य का नम्बर वन

प्रिंट मीडिया या डिजिटल मीडिया -कौन है भविष्य का नम्बर वन
                  प्रिंट
मीडिया डिजिटल मीडिया में भविष्य किसका बेहतर है ? जब ये प्रश्न मुझसे किया गया तो
मुझे लगा मैं अपने बचपन में पहुँच गयी हूँ और मुझसे पूछा  जा रहा है कि बताओ तुम्हें कौन ज्यादा अच्छा
लगता है … पापा या मम्मी | जब मम्मी कहती तो लगता पापा भी तो अच्छे है और जब
पापा कहती तो लगता तो … अरे नहीं नहीं … भला मम्मी को कैसे छोड़ा जा सकता है |
हम लोग जो प्रिंट मीडिया के युग में पैदा हुए डिजिटल मीडिया के युग में लेखन
में  आगे बढे | उन सब के लिए ये प्रश्न बड़ा
दुविधा में डालने वाला है | इसलिए इसकी विस्तृत एनालिसिस करने का मन बनाया |


डिजिटल मीडिया –ज्ञान का भंडार वो भी मुफ्त

                           आज
से ३० साल पहले क्या किसी ने सोंचा था की हम गणित के एक सवाल में उलझ जाए और झट से
कोई उत्तर बता दे , खाना बना रहे हों और इस सब्जी में मेथी डालनी है या जीरा एक
मिनट में कोई बता दे , रंगोली के डिजाइन हो या मेहँदी के या विज्ञानं और साहित्य की
तरह – तरह की जानकारी जब जी चाहे हमें मिल जाए |शायद तब ये एक परिकथा की तरह ही
लगता पर आज ये सबसे बड़ा सच है | डिजिटल मीडिया यानि आपका लैपटॉप , मोबाइल , पी. सी
जो आपको दुनिया भर के ज्ञान से घर बैठे – बैठे ही जोड़ देता है | उस्ससे मिलने वाले
लाभों के लिए हम जितनी बार भी धन्यवाद देंगें कम ही होगा |


                                
                          जी
हां !  डिजिटल मीडिया की बात करे तो ये
ज्ञान का भंडार  है वो भी मुफ्त में | आपसे
बस एक क्लिक की दूरी पर | जिसके पास आपकी हर समस्या का जवाब है | खाना बनाने की
रेसीपी , दादी माँ के नुस्खे से लेकर विश्व की श्रेष्ठतम पुस्तके  उपलबद्ध हैं | वो भी मुफ्त |

डिजिटेलाइज़ेशन के इस दौर में इन्टरनेट बहुत सस्ता हो गया है | जिस
कारण आम आदमी भी अच्छे से अच्छी किताबें लेख आदि पढ़ सकता है |


मोबाइल पूरी  लाइब्रेरी बन
चुका है | आप कहीं भी जाए आप के साथ आपकी पूरी लाइब्रेरी साथ रहेगी | आप का लगेज
भी नहीं बढेगा | जब सुविधा हो निकाला और पढ़ लिया | यानि की जिंदगी लेस लगेज मोर कम्फर्ट
के सिद्धांत पर चल पडी है |


बढती आबादी और छोटे होते घरों के दौर में हम ज्यादा से ज्यादा
प्रिंटेड पुस्तके अपने घर में नहीं रख सकते | चाहते न कहते हुए भी हमे पुस्तकें
हटानी पड़ती हैं या लाइब्रेरी में देनी पड़ती हैं | ऐसे में डिजिटल होम लाइब्रेरी
सारी समस्याओं के समाधान के रूप में नज़र आती है |

डिजिटल मीडिया पर हर आम और खास व्यक्ति अपने विचार व्यक्त कर सकता है
| इससे हमें बहुत सारे विचार पढने को मिल जाते हैं | ब्लॉगिंग के जरिये हर व्यक्ति
अपने विचारों को सब तक पहुंचा सकते हैं | ब्लॉग में विभिन्न तरह की जानकारी साझा
कर सकते हैं व् प्राप्त कर सकते हैं |

बहुत सी पुरानी दुर्लभ किताबें जिन्हें रीप्रिंट करना संभव नहीं है
उन्हें स्कैन कर के डिजिटल मीडिया पर आसानी से प्रिंट किया जा सकता है | यानी हम  अपनी धरोहर को न सिर्फ सुरक्षित कर सकते हैं बल्कि जन – जन तक पहुंचा भी सकते हैं
|

आज का युवा जो सोशल साइट्स की वजह से ज्यादातर ऑनलाइन रहता है वो वहां
से समय निकाल कर कुछ और भी पढ़ लेता है | भले ही वो किताब उठाने की जहमत न करे |
शायद इस कारण लोगों की रीडिंग हेबिट बढ़ी है |


                                      ऐसा लगता
तो है की भविष्य का मीडिया डिजिटल मीडिया ही है … क्योंकि ये सस्ता है सुलभ है
और जगह भी नहीं घेरता | तो क्यों न ये सबके दिल में जगह बना ले |


प्रिंट मीडिया – बस हारता दिख रहा है


                       डिजिटल
मीडिया के पक्ष में इतने सारे विचार पढ़ कर आपको लग रहा होगा प्रिंट मीडिया हार रहा
है यानी डिजिटल मीडिया उसे पीछे छोड़ देगा | अगर आप भी ऐसा सोंच रहे हैं तो आप गलत
हैं क्योंकि ये हम नहीं आंकड़े कहते हैं | डिजिटल मीडिया के आने के बाद भी हजारों किताबें
रोज छप रही हैं | या यूँ कहें कि पहले से ज्यादा छप रही हैं | नयी – नयी मैगजींस
व् प्रकाशन हाउस अस्तित्व में आ रहे हैं | अगर वास्तव में प्रिंट मीडिया
अस्तित्वहीन होने जा रहा है तो क्या ऐसा हो सकता है की कोई लाखों का खर्चा करने का
जोखिम उठाये | निश्चित तौर पर ये खामखयाली ही है की प्रिंट मीडिया खतरे में है |
आखिर सस्ता सुलभ व् कम जगह घेरने वाले डिजिटल मीडिया के आ जाने पर भी प्रिंट मीडिया
खतरे में क्यों नहीं आया ….


किताबों से एक तरह से हमारी बॉन्डिंग  होती है |किताब आप महसूस करते हैं | अपनी
लाइब्रेरी में सजाते हैं | वो एक तरह का प्यार का अटूट बंधन होता है | जिसका स्थान
कोई नहीं ले सकता | कई लोगों की तो किताबों से इतनी दीवानगी होती है की उनकी किताब
कोई छू भी नहीं सकता | ये बात डिजिटल लाइब्रेरी में कहा |


कितने लोग ऐसे हैं जो मिनट – मिनट पर खबरे डिजिटल मीडिया से प्राप्त
करते रहते हैं फिर भी उन्हें सुबह के अखबार का  बेचैनी से इंतज़ार होता हैं | सबह के अखबार से एक
ख़ास जुड़ाव जो होता है | और भावना का स्थान कोई ले सकता है भला ?

सर्दियों के दिन हो और धूप में कुछ पढना कहते हो तो मोबाइल तो बिलकुल
साथ नहीं देता | ऐसे में किताब ही तारणहार का काम करती है |

आपने कुछ पढ़ा आपको बहुत पसंद आया तो आप किताब को उपहार के रूप में भी
दे सकते हैं | ये उपहार लेने वाले और देने वाले दोनों के दिल के करीब होता है |अब
ई बुक का तो बस लिंक ही भेज सकते हैं |

एक सच्चाई ये भी है की फ्री की चीज का महत्व कम होता है …. अब ,
पानी और हवा को ही देख लीजिये | हमारा ध्यान तब गया जब प्रदूष्ण  जान लेने लग गया | वही  बात डिजिटल मीडिया पर लागू है बहुत कुछ उपल ब्द्द
है पर कल पढ़ लेंगे में बात आगे खिसकती ही जाती है |और  किताब जिसे हम चुन कर खरीद कर लाते हैं उसे पढ़े
बिना दिल कहाँ मानता है |


प्रिंट मीडिया के पक्ष में एक बात और है |वो है क्लिक का पढने से
रिलेशन … याद करिए जब हम बच्चे थे और हमारे सामने बहुत सारे खिलौने पड़े हो तो
क्या हम किसी एक खिलौने से खेलते थे | कभी एक पकड़ा तो कभी दूसरा | यही हाल ऑनलाइन
पाठक का है …किसी को टाइटल अच्छा लगा किसी को फोटो और  कर दी क्लिक  शुरू की दो चार लाइन बाँध नहीं पायी तो चल दिए
दूसरी वेबसाइट पर … इतना उपलब्द्ध है तो इंतज़ार क्यों करे | कई बार तो बहुत सारा
समय इस क्लिका – क्लिकी में चला जाता है |

प्रिंट मीडिया या डिजिटल मीडिया -कौन साबित हुआ भविष्य का नम्बर वन 

               अंत में इस
विवेचना का यही निष्कर्ष निकलता है | डिजिटल मीडिया हो या प्रिंट मीडिया दोनों
ज्ञान बांटने का काम कर रहे हैं |और मुझ जैसे सुधि पाठक के दोनों हाथों में लड्डू
है | हम बहुत कुछ डिजिटल मीडिया पर पढ़ सकते हैं और जो मन को बहुत भाये उए किताब के
रूप में खरीद कर अपनी निजी लाइब्रेरी की शोभा  भी बढा  सकते हैं | मुझे किसी के भविष्य पर कोई खतरा नज़र
आता दिखाई नहीं दे रहा है | फिलहाल भविष्य में नबर वन कौन रहेगा इस प्रश्न को हम
भविष्य पर ही छोड़ देते हैं और अभी पढने का आनंद उठाते हैं |

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