तोहफा (लघुकथा)

तोहफा (लघुकथा)



“सुनो, आजकल तुम बहुत कमजोर होती जा रही हो क्या बात है? और तुम्हारा दूध का गिलास कहां है?”- राजेश रात को दूध पीते हुए पत्नी सीमा से बोला।
“आपको तो ऐसे ही लग रहा है बताओ मैं कहाँ से कमजोर लग रही हूँ? और मेरा दूध रसोई में रखा है सारा काम निपटाकर बाद में पी लूँगी।”- सीमा खड़ी होकर अपना फिगर दिखाते हुए बोली। फिर वो अपने कामों में व्यस्त हो गई।






राजेश थोड़ी देर बाद पानी पीने रसोई में गया तो देखा दूध तो कहीं रखा ही नहीं है। कुछ शंका सी हुई तो सीमा के पीछे जाकर खड़ा होकर बोला- “जानू,अभी तक दूध क्यों नहीं पीया। देखो, तुम अपना बिल्कुल भी ख्याल नहीं रखती हो।”
“बोला तो था। काम खत्म करके पी लूँगी।”- सीमा ने फिर वही बात दोहरा दी।






अब तो सब क्लीयर हो गया। जब दूध है ही नहीं तो पीएगी क्या? ‘डेली के डेली तो दूध के पैसे लेती है फिर दूध पूरा क्यों नहीं लाती है? क्या मेरी मेहनत की कमाई में से पैसे चुरा-चुराकर अपने मायके तो नहीं भेजती है? मैं
तो इस पर इतना विश्वास करता हूँ और ये उसका नाजायज फायदा उठा रही है।
अबतक पता नहीं क्या-क्या किया होगा?’ सीमा के एक झूठ ने कई सवाल खड़े कर दिए थे।








राजेश को अब उस पर विश्वास करना मुश्किल हो रहा था। अब वो उसे इग्नोर करने लगा। ना ढंग से बात करता और ना ही करीब ही आता था।
आज जब ऑफिस से आया तो दरवाजे पर खड़ी सीमा ने हाथों से रास्ता बंद कर दिया।
“सुनो जी, पहले आँखें बंद करो फिर अंदर आना।”
“क्या कह रही हो? मुझे नहीं आँखें बंद करनी। तुम रास्ते से हट  जाओ।”
“नहीं, आपको मेरी कसम है आँखें बंद करो।”
राजीव ने अनमने मन से आँखें बंद कर ली तो सीमा उसका हाथ पकड़ कर अंदर ले गई। और बोली-“अब आँखें खोल सकते हो।”






राजेश ने आँखें खोली तो देखा उसकी मनपसंद बाइक आँखों के सामने खड़ी थी।






बाइक की चाबी राजेश के हाथों में देते हुए सीमा बोली- ” आपको शादी की सालगिरह मुबारक हो। मुझसे आपकी ऑफिस आने-जाने की परेशानी देखी नहीं जाती थी इसलिए मैंने एक-एक पैसा इकट्ठा किया ताकि आपको शादी की सालगिरह पर यह तोहफा दे सकूँ।”




सीमा का तोहफा देखकर राजेश की आँखें भर आईं। उसे अपनी सोच पर घृणा और सीमा पर गर्व महसूस हो रहा था।




-विनोद खनगवाल

लेखक





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