जनरेशन गैप -वृद्ध होते बच्चों पर तानाकशी से बचे माता -पिता

जनरेशन गैप -वृद्ध होते बच्चों पर तानाकशी से बचे माता -पिता
अभी हाल में एक फिल्म आई थी “१०२ नॉट आउट ” | जिसमें एक बुजुर्ग पुत्र व् उसके बुजुर्ग पिता के रिश्ते को दर्शाया गया है | फिल्म का विषय अलग था , पर यहाँ मैं बात कर रही हूँ उस घर की जहाँ दो बुजुर्ग रहते हैं | एक बेटा जो वृद्धावस्था की शुरुआत पर खड़ा है व् उसके माता -पिता जो अति वृद्ध हैं | भारतीय संस्कार कहते हैं किब्च्चों को माता -पिता की सेवा करनी चाहिए | माता -पिता की सेवा ना कर पाने वाले बच्चे एक नैतिक दवाब में रहते हैं | पर जब बच्चे खुद वृद्ध वस्था में हों और माता -पिता व् समाज उनसे युवा बच्चों के सामान सेवा की मांग करें

जनरेशन गैप -वृद्ध होते बच्चों पर तानाकशी से बचे माता -पिता



इस विषय पर लेख लिखने का एक विशेष कारण है | दरअसल अभी कुछ दिन पहले हॉस्पिटल में जाना हुआ | वहाँ एक बुजुर्ग दंपत्ति (८० के आसपास ) भी अपने बेटे के साथ आये हुए थे | उनका रूटीन चेक -अप होना था | डॉक्टर ने यूँही पूछ लिया ,” माताजी इस बार काफी दिन बाद आयीं | ” वो कुछ बोलतीं इससे पहले उनके पति बोलने लगे ,” क्या करें आजकल के लड़कों के पास समय कहाँ है हम बुजुर्गों के लिए , बस अपने काम और बीबी बच्चों से मतलब है , इस उम्र में हालत बिगड़ते देर थोड़ी ही ना लगती है , पर बच्चों का क्या है ? अब हमारी जरूरत कहाँ है ?
खैर पति -पत्नी का रेगुलर चेक अप करने के बाद माँ ने बेटे से कहा , ” तुम भी बी पी नपवा लो | बेटे ने कहा नहीं मैं बिलकुल ठीक हूँ | डॉक्टर बोला , ” नपवा लीजिये आप भी तो पचास पार कर चुके हैं | डॉक्टर ने नापना शुरू किया बीपी 160/240को पार कर रहा था | डॉक्टर ने कहा , ” अरे इन्हें तुरंत एडमिट करो , इ.सी जी लो , फिर माता -पिटा से बोले , ” अच्छा है चेक करा लिया वर्ना कुछ भी हो सकता था |

अक्सर ४० -से ६० के बीच में जब बीमारियाँ दबे पाँव दस्तक देतीं हैं, तब पारिवारिक दायित्वों के बीच में लोग अरे हम तो ठीक हैं कह कर अपने स्वास्थ्य को अनदेखा करते हैं | अचानक से मामला बिगड़ता है और कई बार जान भी चली जाती है | सबको रूटीन चेक अप कराते रहना चाहिए ताकि बिमारी शुरू में ही पकड़ में आ सके |

साथ ही उनके पिता द्वारा शुरू में बोली गयी बात ( जोकि आम घरों में कही जाने वाली बात है)में मुझे बीनू भटनागर दी के लेख समकालीन साहित्य कुछ विसंगतियाँ की याद आ गयी | लेख का अंश यथावत दे रही हूँ …

“जिस समय माता पता की उम्र८० के आस पास होगी तो उनकी संतान की आयु भी पचास के लगभग होगी इस समय वह इंसान घर दफ्तर और परिवार की इतनी जिम्मेदारियों में घिरा होगा कि वह माता पिता को पर्याप्त समय नहीं दे पायेगा। अब हमारे साहित्यकार माता पिता के अहसान गिनायेंगे कि तुम्हे उन्होने उंगली पकड़ कर चलना सिखाया वगैरह….. अब उनका वक़्त है……….।हर बेटे या बेटी को अपने माता पिता की सुख सुविधा चिकित्सा के साधन जुटाने चाहिये ,अपनी समर्थ्य के अनुसार चाहें माता पिता के पास पैसा हो या न हो।बुजुर्गों को भी पहले से ही बढ़ती उम्र के लिये ख़ुद को तैयार करना चाहिये। वह अपने बुढ़ापे में अकेलेपन से कैसे निपटेंगे क्योंकि बच्चों को और जवान होते हुए पोते पोती को उनके पास बैठने की फुर्सत नहीं होगी। यह सच्चाई यदि बुज़ुर्ग स्वीकार लें तो उन्हे किसी से कोई शिकायत नहीं होगी।”


इसी विषय पर कहानी मक्कर लिखी थी | जिसमें बुजुर्ग माता -पिता द्वारा बहु की कमजोरी को बीमारी ना मान कर मक्कर ( बिमारी का नाटक) समझा जाता है | अपने जीवन में कितने केस मैंने ऐसे देखे हैं जहाँ वृद्ध माता -पिता ताने मार -मार कर ऐसा माहौल बना देते हैं जहाँ बच्चों का डॉक्टर को खुद को दिखने का मन भी खत्म हो जाता हैं | ऐसे में कई बार बीमारियाँ अपने उग्र रूप में सामने आती हैं | तन मजबूरन वृद्ध लोगों को भी सेवा की मात्रा से समझौता करना पड़ता है | मेरा भी विचार है कि बुजुर्गों को भी समझना चाहिए कि वृद्धावस्था की शुरुआत में पहुंचे हुए बच्चे उनकी वैसी सेवा नहीं कर सकते जैसी युवा बच्चे कर सकते हैं | इसलिए व्यर्थ में ताने मार -मार कर खुद का और परिवार का तनाव नहीं बढ़ाना चाहिये |

क्योंकि परिवार में सब स्वस्थ रहे खुश रहे यही तो हम चाहते हैं |

वंदना बाजपेयी
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filed under:generation gap, health issues, criticism
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